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सप्ताह की कविता में आज हिंदी के ख्यात कवि मदन कश्यप की कविताएं

जब समाजवाद के विनाश का ढिंढोरा पीटने के बाद राजनीति से ज्यादा साहित्य में पाला बदल धमा-चौकड़ी मची थी और साहित्यकार, आलोचक ब्रह्मराक्षसों के शरणागत हो रहे थे, काव्य-जगत में प्रेम और प्रकृति के छद्म चमत्कार सामने आ रहे थे; ऐसे समय में राजनीतिक भाषा की संवेदनशील दृढ़ता के साथ कविता में जमे रहना मदन कश्यप की पहचान है। जब वे लिख रहे होते हैं कि – ‘योरोप के सारे बूचड़खानों पर सौंदर्यशालाओं के बोर्ड लग गए हैं।’

तो वे रघुवीर सहाय की तरह ग्लोबलाइजेशन के योरोपीय, अमेरिकी षड्यंत्र का पर्दाफाश कर रहे होते हैं। योरोप शीर्षक कविता में – सहाय जी ने लिखा था –’टेबल पर गोश्त ही गोश्त, बस खाने का ढंग सभ्य है, काँटे चम्मच से।’

इस संदर्भ में जब हम खुलेपन के नाम पर पिछले वर्षों में बड़े पैमाने पर आयातित भोंड़ेपन पर निगाह डालें, तो पता चलेगा कि हम किस कदर फिर गुलामी की ओर बढ़ रहे हैं। और ऐसे समय में राजनीतिक संदर्भों वाली कविताओं की जरूरत और भी बढ़ जाती है। क्योंकि आतंक और विकृत सौंदर्यबोध का प्रभाव हमारी युवा पीढ़ी पर बढ़ता जा रहा है तभी तो अपनी शेखी के लिए चर्चित युवा कवि बद्रीनारायण लिखते हैं – ‘इस पूरी सदी में छाये रहे हत्यारे।’

जिस सदी का चौथाई हिस्सा वे प्रेमगीत लिखते गुजारते हैं, पुरस्कार व अनुदान प्राप्त करते हैं उसे हत्यारों की सदी कहते हैं। लेनिन, विवेकानंद, गाँधी, नेहरू, भगतसिंह, सुभाष, माओ और मंडेला की सदी के बारे में ऐसा कहना क्या हमारी सोच का दिवालियापन और राजनीतिक रूप से हमारे आतंकित होने को नहीं दर्शाता है। ऐसे समय जब बद्री अंधेरे से आतंकित रिरियाते लिख रहे होते हैं, ‘रोको। रोको…’ उसी समय मदन कश्यप रात के इस आतंक को चुनौती देते लिख रहे होते हैं –’वह पार कर लेगी रात और रास्ता भी कोई भी जंगल कविता का रास्ता नहीं रोक सकता।’

वे उसकी ताकत के प्रति आश्वस्त करते लिखते हैं कि -‘शब्द कोई डोडो नहीं कि मारते मारते आप मार ही डाले उन्हें। सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर मदन कश्यप की कविताओं को राजनीतिक कविताओं का संबोधन प्रदान किया जा सकता है, जैसे कि कभी धूमिल, गोरख पांडेय आदि को राजनीतिक रूप से प्रतिबद्ध कवि के रूप में पहचाना गया था।

जैसे आलोक धन्वा के यहाँ रेटारिक और संघर्ष के सौंदर्यबोध वाले पहलू को रेखांकित किया जा सकता है, अरुण कमल के यहाँ मध्यवर्गीय अंतद्वंद्वों की पहचान की जा सकती है, ज्ञानेंद्रपति के यहाँ सूक्ष्म विश्लेषणात्मक अंतर्दृष्टि को महसूस किया जा सकता है, निलय को लोक संवेदना को अभिव्यक्त करने वाला माना जा सकता है, उसी तरह मदन कश्यप को राजनीतिक-ऐतिहासिक निहितार्थों की प्रमुखता का कवि माना जा सकता है। आइए पढते हैं मदन कश्‍यप की कविताएं – कुमार मुकुल

बचे हुए शब्द
जितने शब्द आ पाते हैं कविता में
उससे कहीं ज्यादा छूट जाते हैं

बचे हुए शब्द छपछप करते रहते हैं
मेरी आत्मा के निकट बह रहे पनसोते में

बचे हुए शब्द
थल को
जल को
हवा को
अग्नि को
आकाश को
लगातार करते रहते हैं उद्वेलित

मैं इन्हें फाँसने की कोशिश करता हूँ
तो मुस्कुराकर कहते हैं
तिकड़म से नहीं लिखी जाती कविता
और मुझ पर छींटे उछालकर
चले जाते हैं दूर गहरे जल में

मैं जानता हूँ इन बचे हुए शब्दों में ही
बची रहेगी कविता!

रावण का पुतला
सूरज तो पूरब में उगता है
और पश्चिम में डूब जाता है
कितना मुश्किल है सूरज को
उत्तर से दक्षिण ले जाना

कुछ भी हो सकता है इसमें
अपहृत हो सकती है पत्नी
आहत हो सकता है भाई
कुछ भी हो सकता है इसमें

पर कितना आसान है उत्सव मनाना
रावण का पुतला जलाना!

विजेता की हँसी
विजेता हंस रहा है
बिल्‍कुल अपने पूर्वाधिकारी जैसी हंसी
ऐसे ही हंसते रहे होंगे
इतिहास के तमाम विजेता
ऐसे ही हंसे होंगे
एशिया की महान नगर सभ्‍यता में
काठ के घोड़े में छुपकर घुस आए
बर्बर यूनानी योद्धा
ऐसे ही हंसा होगा
बेबीलोन के तख्‍त पर बैठकर सिकंदर

ऐसा पहली बार तो हुआ नहीं
कि असभ्‍य निर्दयी लुटेरे
महान विजेता कहला रहे हैं
पहली बार तो नहीं
बेचैन हुई है सभ्‍यता
आहत हुई है संस्‍कृति
पहली बार तो नहीं
इतिहास से खेल रहे हैं
हथियारों से खेलने वाले!