Last Update On : 05 11 2018 12:17:56 PM

अध्ययन कहता है सही खबरों से अधिक झूठी खबरों को लोग अधिक फॉलो कर रहे हैं और ऐसी खबरें तेजी से फैलती हैं….

वरिष्ठ लेखक महेंद्र पाण्डेय की टिप्पणी

हर कोई चाहता है कि वह जो भी कहे उसे ज्यादातर लोग मानें, इसी तरह सभी राजनीतिक पार्टियां बहुमत के साथ सत्ता में आना चाहती हैं। पर यह अबूझ पहेली है कि कितने प्रतिशत लोगों तक पहुंच कर और उन्हें अपनी बात मनवाकर बहुमत पाया जा सकता है।

अनेक समाज विज्ञानी समय समय पर इस सन्दर्भ में अपनी राय देते रहे हैं, और यह प्रतिशत का आंकड़ा 10 से 40 प्रतिशत के बीच बताया गया है। कुछ समय पहले प्रतिष्ठित जर्नल, साइंस, में प्रकाशित एक शोधपत्र के अनुसार किसी भी भीड़ में यदि आप 25 प्रतिशत लोगों से अपनी बात मनवाने में कामयाब होते हैं तब आप की राय बहुमत में बदल जायेगी

इस अध्ययन को अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ़ पेनसिलवेनिया के समाज वैज्ञानिक डामों सेन्टोला ने किया है। अध्ययन के लिए उन्होंने 200-200 लोगों का दल बनाया और हरेक दल को एक अनजान आदमी/महिला की तस्वीर दिखाकर उसका नाम रखने को कहा गया। पहली बार सबने अलग-अलग नाम दिया। फिर सबको वह नाम दिखाए गए।

दूसरे राउंड में 14 प्रतिशत लोगों ने उस तस्वीर को एक ही नाम दिया, तीसरे राउंड में 31 प्रतिशत लोगों ने एक ही नाम दिया। इसी तरह सातवें-आठवें राउंड तक जाने-अनजाने अधिकतर लोगों ने उस चित्र का नाम एक ही दिया। डामों सेन्टोला का निष्कर्ष है, बस 25 प्रतिशत लोगों को आप अपनी बात से सहमत कर लीजिये फिर आपकी राय बहुमत में होगी। निश्चित तौर पर यह अध्ययन दुनिया भर की राजनीतिक पार्टियों के लिए बड़े काम का है, क्यों कि हरेक पार्टी बहुमत चाहती है जिससे सत्ता पर काबिज हुआ जा सके।

पर राजनीतिक पार्टियों के मतलब का यही एकलौता अध्ययन नहीं है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी का तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन के बारे में विरोधी राय सभी जानते हैं। हाल में एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि सत्ता में बैठे लोगों द्वारा प्रचारित झूठ अधिकतर जनता सच मानती है, और फिर वैज्ञानिक कितने भी तथ्य देकर तापमान वृद्धि को साबित करें, जनता आपनी राय नहीं बदलती। हालांकि यह अध्ययन तापमान बृद्धि के मामले में किया गया था पर यह निष्कर्ष हरेक मामले में दुनिया भर में सटीक बैठता है।

हाल में एक वैज्ञानिक अध्ययन से भी यह स्पष्ट होता है कि झूठी खबरें जल्दी और ज्यादा लोगों तक पहुंचती हैं। यह अध्ययन सोरौश वोसौघी की अगुवाई में वैज्ञानिकों के एक दल ने किया है। सोरौश वोसौघी एक डाटा साइंटिस्ट हैं और कैंब्रिज स्थित मस्सचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी में कार्यरत हैं। वर्ष 2013 में अमेरिका के बोस्टन मैराथन के दौरान बम फैके गए थे, जिसमें अनेक लोग घायल हुए थे और कुछ मारे भी गए थे।

उस दौरान सोरौश वोसौघी उसी संस्थान में शोध कर रहे थे और सोशल मीडिया, विशेष तौर पर ट्विटर पर, इससे सम्बंधित हरेक समाचार पर ध्यान दे रहे थे। कुछ दिनों बाद ही उन्हें स्पष्ट हो गया कि सही खबरों से अधिक झूठी खबरों को लोग अधिक फॉलो कर रहे हैं और ऐसी खबरें तेजी से फैलती हैं।

इंग्लैंड में किये गए एक ऐसे ही दूसरे अध्ययन में पाया गया कि सोशल मीडिया पर लोग स्वयं झूठी खबरें भेजते हैं। इस अध्ययन में 13 लोंगो के एक दल में पहले सदस्य को ट्विटर पर एक सही खबर भेजी गयी। उसी खबर को पढ़कर इसे अपने शब्दों में फिर से लिखकर दूसरे को भेजना था, दूसरा इसी तरह तीसरे को, इसी तरह 13वें सदस्य तक खबर जानी थी।

देखा गया कि छठे सदस्य तक आते आते सही खबर लगभग गलत हो चुकी थी। छठे सदस्य को एक बार फिर सही खबर भेजी गयी और पांचवे सदस्य द्वारा परिवर्तित खबर भी। हैरानी की बात यह थी कि हरेक समूह में छठे सदस्य ने सही खबर के बदले परिवर्तित खबर को प्रमुख मानते हुए इसे आगे भेजा। लगभग हरेक बार अंतिम खबर में सही खबर के कोई तथ्य नहीं मिले।

इन सारे अध्ययनों को एक साथ जोड़कर देखिये, झूठी खबरें तेजी से अधिक लोगों के पास पहुंचती हैं, उस पर लोग यकीन ज्यादा करते हैं और समर्थक अधिक होते हैं। इसका सीधा सा मतलब है, जितना अधिक झूठ बोलेंगे उतने अधिक समर्थक आपके पास होंगे।

सरसरी तौर पर यह तथ्य एक मजाक लग सकता है, पर आज अधिकतर देशों में ऐसा ही हो रहा है। हाल में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित एक वर्किंग पेपर के अनुसार दुनिया में कम से कम 34 देशों की सरकारे, जिनमे अमेरिका और भारत शामिल हैं, सोशल मीडिया पर अरबों रुपये खर्च कर रही हैं जिससे उनके गलत और भ्रामक विचार अधिक लोगों तक पहुंचें।

इनके समर्थकों की संख्या बढे। इस रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि अपने पक्ष में झूठी खबरें फैलाने वाली ऐसी सरकारें झूठी खबरें दबाने का नाटक भी खूब करती हैं। ऐसी सरकारें झूठी खबरें ऐसी खबरों को मानती है जिसमें उसका विरोध किया गया हो।

इतना तो तय है कि वर्तमान में झूठ से ही सत्ता पर काबिज हुआ जा सकता है, और अधिकतर देशों का उदाहरण हमारे सामने है।