Last Update On : 14 07 2018 11:49:31 AM

सरकार के गैरलोकतांत्रिक रवैये ने कश्मीर में 12 से 18 साल के हजारों विद्रोही नौजवानों की एक ऐसी फौज खड़ी कर दी है, जो हथियार मिलते ही आतंकवादी जमातों में शामिल हो जाएंगे। बच्चों पर मां—बाप का कंट्रोल ही नहीं है और वे टू नेशन थ्योरी के चक्र में फंसे हुए हैं…

जनज्वार, दिल्ली। जनज्वार डॉट कॉम और मासिक पत्रिका युवा संवाद के संयुक्त तत्वावधान में कश्मीर के वर्तमान हालातों को लेकर राजधानी दिल्ली के आईटीओ स्थित गांधी पीस फाउंडेशन में 11 जुलाई को एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।

‘कश्मीर के हालात : संभावनाएं और समाधान’ विषय से आयोजित इस कार्यक्रम में बतौर मुख्य वक्ता श्रीनगर में रहने वाले और कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू और जम्मू—कश्मीर के अनंतनाग जिले में पली—बढ़ीं टाइम्स आॅफ इंडिया की वरिष्ठ सहायक संपादक आरती टिक्कू सिंह मौजूद रहीं, जिन्होंने वहां के वर्तमान हालातों से लोगों को रू—ब—रू कराया। कुछ ऐसे सच भी बयां किए जो भारत सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े करते हैं।

श्रीनगर में रहने वाले और कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के अध्यक्ष संजय टिक्कू ने कहा कि कश्मीर के हालात तभी बदलेंगे जब भारत सरकार उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेगी जैसा वह बाकि राज्यों के साथ करती है। अगर हरियाणा में आरक्षण की मांग वाले जाट आंदोलन, भ्रष्ट और बलात्कारी राम रहीम के पक्ष उतरी हिंसक जनता के खिलाफ सरकार अपने नागरिक की तरह व्यवहार करती है, पत्थर के बदले पैलेट गन नहीं चलाती तो कश्मीर में पैलेट गन से बदनुमा दाग क्यों दे रही है।

संजय का बहुत साफ—साफ कहना था कि भारत सरकार के गैरलोकतांत्रिक रवैये ने कश्मीर में 12 से 18 साल के हजारों विद्रोही नौजवानों की एक ऐसी फौज खड़ी कर दी है, जो हथियार मिलते ही आतंकवादी जमातों में शामिल हो जाएंगे। ये बच्चों पर मां—बाप का कंट्रोल ही नहीं है और वे टू नेशन थ्योरी के चक्र में फंसे हुए हैं। मगर हमारी आर्मी द्वारा भी पत्थरबाजों का जवाब गोली से देना कहां वाजिब है।

वहीं सरकार हजारों की संख्या में मौजूद कश्मीरी अर्धविधवाओं के बारे में बात नहीं करती, गायब लोगों के बारे में कोई जानकारी नहीं जुटा पाती पर पत्थर चला रहे नौजवानों को गोलियों से भूनने की रणनीति पर बखूबी काम कर पाती है, आखिर क्यों?

संजय टिक्कू के अनुसार 1990 के दशक में कश्मीर में जब आतंकवाद का उभार हुआ तब भी इतने बुरे हालात नहीं थे, जैसे आज हैं। उस समय बच्चे फिर भी मां—बाप की बात सुन लिया करते थे, पर अब नहीं। सरकार की गलत नीतियों के कारण स्कूल—कॉलेज के छात्र—छात्राएं बड़ी संख्या में आतंकवादी मानसिकता से भर गए हैं और उन्हें लगता है कि भारत ने उनके लिए कोई अलग हालात नहीं छोड़े हैं। यह सच है कि वहां तमाम आतंकी संगठन युवाओं को प्रशिक्षित कर रहे हैं और मैं इसका गवाह भी हूं, मगर सवाल है कि हमारी आर्मी क्या कर रही है? क्या वह वहां कोई सकारात्मक रोल अदा कर रही है, मेरा जवाब है ना! कश्मीर में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार है, क्या पुलिस क्या प्रशासन और क्या सेना?

साथ ही टिक्कू ने कश्मीर में पंडितों के हालात पर बालते हुए कहा कि कश्मीर के बहुसंख्यकों ने कश्मीरी पंडितों को वहां से भगाया, जिसका परिणाम यह है कि जो कश्मीरी पंडित कभी सवा 3 लाख हुआ करते थे अब उनमें से कश्मीर में सिर्फ 808 परिवार बचे हैं जो 202 जगहों पर कैंपों में रह रहे हैं। कश्मीर को भारत सरकार आखिर समझती क्या है? यह सिर्फ कश्मीर में रह रहे 70 लाख मुस्लिमों का सवाल नहीं है, बल्कि देश के 30 करोड़ मुस्लिमों का सवाल है। भारत सरकार सिर्फ 3—4 लाख कश्मीरी पंडितों के बारे में सोचेगी तो हल निकलना असंभव है।

संजय टिक्कू कहते हैं मैं उन बचे-कुछ हज़ार कश्मीरी हिन्दुओं में से हैं, जो घाटी छोड़कर कहीं नहीं गए और न ही उनका इरादा कश्मीर छोड़ने का है। दशहरे जैसा त्यौहार घाटी में मनाकर संजय टिक्कू यह उम्मीद बंधाते हैं कि वहां के हालात बेहतर होंगे। कहते भी हैं कि मैं 2007 से लगातार दशहरे का आयोजन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति के तत्वावधान में करता आ रहा हूं, जिसमें करीब 30 हजार मुस्लिम भागीदारी करते हैं।

कार्यक्रम की दूसरी वक्ता टाइम्स आॅफ इंडिया की वरिष्ठ सहायक संपादक आरती टिक्कू सिंह ने अपनी बात रखते हुए कहा, जब मैं कश्मीर जाती हूं तो लोग मुझे पत्रकार से अलग कश्मीरी पंडित के नजरिए से आंकते हैं। 1990 में कश्मीर से विस्थापित बहुत सारे लोगों के साथ मेरा परिवार भी शामिल रहा। सही मायने में कश्मीर में जो हालात हैं मैं उसका प्रोडक्ट हूं। हालांकि यह सिर्फ पिछले 30 सालों के हालात नहीं बल्कि 70 सालों के हालात हैं जिन्होंने कश्मीर को सुलझने नहीं दिया। अब्दुल गनी कहते थे, असल में कश्मीर का मुद्दा और प्रोब्लम क्या है यही तय नहीं हो पाया, बल्कि अभी तक यह भी फैसला नहीं हो पाया कि कश्मीरी हिंदुस्तानी हैं या पाकिस्तानी। वही कनफ्यूजन आज भी कश्मीर की सड़कों पर नजर आ रही है। आज का कश्मीर कनफ्यूजन का प्रोडक्ट है। जब तक हिंदू—मुस्लिम, पार्टिशन की समस्या खत्म नहीं होगी, समाधान मुश्किल है।

कश्मीर की असल समस्या टू नेशन थ्योरी है। वहां सक्रिय तमाम आतंकी संगठन लोगों को यही बात समझा रहे हैं कि हिंदू—मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते। हिंदुस्तान सरकार की बात करें तो उसने पिछले 70 सालों में हिंसा, नफरत को बढ़ावा ही दिया है।

कश्मीर में निर्दोष लोगों की हत्या कर हिंदुस्तान सरकार ने टू नेशन थ्योरी को बढ़ावा ही दिया है। निहत्थे लोगों के हत्यारे आजाद हैं कुछ भी करने के लिए। देखा जाए तो कश्मीर की मेजोरिटी हिंसक नहीं, चंद लोगों ने पिछले 30 सालों से गनप्वाइंट पर सोसाइटी को रखा हुआ है।

पिछले 4—5 साल से तो वहां एक अलग ही मिलिटेंसी दिख रही है। मिलिटेंस में पले बढ़े 12—14 साल के बच्चे खलीफत की बात करते हैं। आतंकी संगठनों का लिटरेचर उन्हें सिखा रहा है कि चूंकि कश्मीर में मेजोरिटी में मुस्लिम हैं इसलिए इसे पाकिस्तान में शामिल किया जाए। भारत सरकार के पास बहुत सारे ऐसे मौके आए कि वह कश्मीर की समस्या को सुलझा सके। वहां आइडियोलॉजी की बड़ी लड़ाई है। इस दिन आतंक के प्रेशर में सॉल्यूशन निकलेगा उस दिन टू नेशन थ्योरी की जीत और हिंदुस्तान की हार होगी। एक्चुअली कश्मीर सिर्फ कश्मीर नहीं बल्कि पूरे देश की प्रोब्लम है।

देखा जाए तो कश्मीर की इस इमेज के लिए मीडिया भी बराबर का दोषी है। कश्मीर का आइकल गलत लोगों को मीडिया ने बनाया है अच्छे लोगों के बारे में मीडिया नहीं बताता। मीडिया कश्मीरी के सकारात्मक पक्ष को भी दिखाना शुरू करे।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए इतिहासकार दिलीप सिमियन ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के सवालों को जान—बूझकर दबा दिया जाता है। यहां सांप्रदायिकता को भी सांप्रदायिक तरीके से विश्लेषित किया जाता है। कश्मीरी पंडित प्रवासी नहीं हैं, बल्कि उन्हें उनकी जमीन से उखाड़कर भगाया गया है। साथ ही उन्होंने कहा कि वह कई बार ऐसे कार्यक्रमों की योजना बनाते रहे, लेकिन जेएनयू तक में कार्यक्रम की इजाजत नहीं मिली, जहां पूर्वग्रह से उपर उठकर संवाद हो। प्रोफेसर सि​मियन ने जनज्वार के इस कार्यक्रम के लिए धन्यवाद दिया कि जनज्वार पूर्वग्रह से उपर उठकर उन सवालों पर बात कर पाया जो सवाल किसी संप्रदाय या समुदाय के नहीं बल्कि कश्मीरियत के हैं।

कार्यक्रम में एनडीटीवी के सीनियर एडिटर हृदयेश जोशी ने कहा कि इस तरह के आयोजन उम्मीद बंधाते हैं कि देशभर के अलग—अलग सवालों और समस्याओं पर पहलकदमी होगी, और ऐसे ही कश्मीर समस्या का हल भी निकलेगा। उन्होंने कहा कि आज के समय में जो जिस जाति—धर्म और पेशे से आता है, वह ईमानदारी से अपनी बात रखे, वह वही होकर बोले जो वह है, न कि कोई आवरण धारण करे। आज जनज्वार का यही प्रयास रहा कि हम संवाद और सहज बहस की प्रकिया में जाएं, उम्मीद है कि आगे भी जनज्वार ऐसी कोशिशें करता रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन करते हुए ‘युवा संवाद’ पत्रिका के संपादक और ख्यात होम्योपैथिक जनचिकित्सक एके अरुण ने कहा कि इस कार्यक्रम को आयोजित करने का उद्देश्य कश्मीर के उन पहलुओं पर बातचीत करना है जो अनकही रह जाती हैं और मीडिया में नहीं आ पातीं। उन्होंने कहा कि हमेशा बहसें किसी न किसी ‘वाद’ की छत्रछाया में होती हैं, लेकिन यह अच्छा है कि हम लोग ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित कर पा रहे हैं, जहां पूर्वाग्रह का कोई स्थान नहीं है, यहां तथ्य और सत्य ही बहस की मूल अवधारणा बन रही है।

कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर वक्ताओं से जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल, शैक्षिक मसलों के विशेषज्ञ प्रेमपाल शर्मा, पत्रकार पीयूष पंत, मजदूरों के बीच काम कर रहे सुनील समेत तमाम लोगों ने सवाल पूछे।

कार्यक्रम में पूर्व आईपीएस वीएन राय, राजीव रंजन झा, विष्णु शर्मा, मोहम्मद शाहिद, अनुग्रह मिश्रा, दीपक चौरसिया, धर्मव्रत चौधरी, संतोष, अनिरूद्ध शर्मा, अभिषेक श्रीवास्तव, विश्वदीपक,, कमलेश कमल, अर्जुन पाल सिंह, तरुण शर्मा, आनंद मिश्रा, खालिद, जयप्रकाश समेत दर्जनों लोग मौजूद थे।