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कोई संविधान की धर्म ग्रंथ की तरह से पूजा करता है तो कोई उसको तिरस्कृत करता है। इस पूजा और तिरस्कार के बीच में ढेर सारे लोग जो फंसे हुए हैं, उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने संविधान को पढ़ा तक नहीं है…

भारतीय संविधान पर बता रहे हैं पेशे से अधिवक्ता राकेश कुमार गुप्ता

सबसे पहले यह समझा जाए कि आखिर संविधान क्या होता है? सरल भाषा में यह कहा जा सकता है कि संविधान किसी भी देश की मौलिक विधियों का वह समुच्चय है जो किसी देश की सरकार, उसके विभिन्न संस्थाओं और उनके बीच शक्तियों का वितरण एवं उनके आपसी संबंध, उनके अधिकार एवं कर्तव्य आदि का निरूपण करता है।

किसी देश का जनसमुदाय और उसके तंत्र के बीच के संबंध सरकारों एवं सरकार की विभिन्न संस्थाओं की दी गई शक्तियों एवं उनकी सीमाओं, विभिन्न विधियों के मूल सिद्धांत तथा साथ ही साथ किसी देश के सामान्य राष्ट्रीय, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति भी होता है।

कुल मिलाकर किसी देश का संविधान किसी देश के सत्ता एवं समाज संचालन की कुंजी होता है। यह वह मूल सिद्धांत ग्रंथ होता है जिसके आधार पर किसी देश की सरकारों और संस्थाओं तथा जनमानस से उनके आपसी अंतर संबंधों को परिभाषित एवं संचालित किया जाता है। आज के लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के समय में किसी के भीतर संविधान की सर्वोच्चता स्थापित है।

संविधान किसी देश की ऐसी मूल विधि होती है जिसके अधीन एवं संगति में ही उस देश की तमाम सारी विधियां आती हैं और किसी भी विधि के उसके विरुद्ध जाने की दशा में वह निष्प्रभावी ही समझी जाती है। हर हालत में संविधान की सर्वोच्चता बरकरार रहती है। एक लोकतांत्रिक संविधान के बारे में यह माना जाता है कि वह किसी राष्ट्र के भीतर रह रहे समस्त जन समुदाय के आकांक्षाओं इच्छाओं और समाज की अभिव्यक्ति है तथा इसी समझ से बने सिद्धांत के आधार पर वे अपने देश और समाज का संचालन करना चाहते हैं।

आइए भारतीय संविधान को साथ-साथ थोड़ा समझने का प्रयास करते हैं। भारत के संविधान को लेकर हमारे समाज में बहुत भी भ्रम की स्थिति है। भारतीय संविधान और भारतीय लोकतंत्र के प्रति समाज के विभिन्न तबकों एवं समुदायों के लोग अलग-अलग तरीके से प्रतिक्रिया देते हैं। कोई संविधान की धर्म ग्रंथ की तरह से पूजा करता है तो कोई उसको तिरस्कृत करता है। इस पूजा और तिरस्कार के बीच में ढेर सारे लोग जो फंसे हुए हैं, उनमें बहुसंख्या ऐसे लोगों की है जिन्होंने संविधान को पढ़ा तक नहीं है। उसके मर्म को समझना तो बहुत दूर की बात है। ज्यादातर अपनी बनी बनाई धारणाओं से प्रस्थान करते हुए संविधान की पूजा से लेकर संविधान को खारिज करने तक जाते हैं।

बहुत कम लोग ऐसे हैं जो संविधान के मर्म को समझ कर उसको अपने जीवन और समाज में अंगीकार करने के यत्न में लगे हुए हैं और एक अच्छी तादाद ऐसे लोगों की है जो अपने पुरानी समाज व्यवस्था के हिसाब से बने हुए विशेष अधिकारों को ना छोड़ना पड़े इसके लिए संविधान की गलत व्याख्या करते हुए ज्यादातर अप्रत्यक्ष और कभी कभी प्रत्यक्ष रूप से संविधान को खारिज करने में लगे हुए हैं। आखिर क्या है यह संविधान इसमें कौन सी बातें कही गई हैं?

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भारतीय संविधान के बारे में सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संविधान समस्त भारत के जन की ओर से स्वयं को ही आत्म अर्पित किया गया है। इस प्रकार भारतीय संविधान का स्रोत भारत का जन समुदाय है। अतः भारत का संविधान राष्ट्र की सर्वोच्च विधि होते हुए भी समस्त जन समुदायों के हितों इच्छाओं और आकांक्षाओं के अधीन है यही इसकी सीमा भी है और यही इसकी सामर्थ्य भी।

इस प्रकार इस सर्वोच्च दस्तावेज में जन समुदाय की ओर से निरंतर और सतत इसमें संवर्धन और परिष्करण की संभावना भी विद्यमान है। भारतीय संविधान में निहित भारतीय राष्ट्र के निर्माण हेतु मुख्य आधारस्तंभ आखिर क्या हैं? संविधान के अनुसार भारतीय राष्ट्र का मूल चरित्र संप्रभुता, पंथनिरपेक्षता और एक लोकतांत्रिक गणराज्य का है जो अपने नागरिकों को के लिए सामाजिक आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय को सुनिश्चित करने की घोषणा करता है।

वाक्, अभिव्यक्ति, धर्म मत इत्यादि को अपनाने की स्वतंत्रता की घोषणा करता है। यह राष्ट्र इसके साथ ही साथ इसके नागरिकों के मध्य आपसी भाईचारा पर आधारित एक समाज के निर्माण की घोषणा करता है, जिसमें बहुविध बहुरूप लोगों के मध्य एक समावेशी संस्कृति का विकास हो।

अब सवाल यह भी है कि क्या यह राष्ट्र बन चुका है या बनने की प्रक्रिया में है? निश्चित रूप से इस संविधान के प्रवृत्त होने के समय तक भारत एक राष्ट्र के रूप में इसके राष्ट्र निर्माताओं के मन मस्तिष्क उनकी संकल्पनाओं उनकी इच्छाओं आकांक्षाओं और उनके सपनों में बसता था, जिसको जमीन पर साकार करने की व्यवस्था भारत का संविधान करता है। इस बात को सुनिश्चित करता है कैसे भारत के राष्ट्रीय आंदोलन के नायकों की इच्छाओं आकांक्षाओं संकल्पनाओं और सपनों के भारत राष्ट्र को एक साकार रूप दिया जा सकता है और हां, उसी तिथि से या यूं कह लीजिए कि पूरे राष्ट्रीय आंदोलन के दरमियान से ही भारत के एक राष्ट्र होने की प्रक्रिया जारी है जो सतत है अनवरत है।

भारत को एक राष्ट्र के रूप में निर्मित और विकसित कैसे किया जाएगा और उसमें उसके नागरिकों की क्या भूमिका होगी यह संविधान के अनुच्छेद 51ए में वर्णित नागरिकों के मूल कर्तव्य में दिया गया है। उनमें से कुछ महत्वपूर्ण मूल कर्तव्य हैं, पहला भारत के सभी नागरिक भारत के संविधान उसके आदर्शों एवं उसकी संस्थाओं का सम्मान करेंगे एवं उसका पालन करेंगे राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करेंगे आपसी भाईचारा पर आधारित एक समाज का निर्माण करेंगे। साइंटिफिक टेंपर, शोध एवं अनुसंधान की प्रवृत्ति का विकास करेंगे इत्यादि।

(राकेश कुमार गुप्ता इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील और जनज्वार के विधि सलाहकार हैं। अब वे जनज्वार पर लगातार संविधान के बारे में लिखेंगे।)

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