Last Update On : 31 08 2018 09:59:21 AM

आरएसएस का विचार अरब दुनिया के मुस्लिम ब्रदरहुड के उस विचार के ही समान है जो कहता है कि हर एक संस्था एक ही विचारधारा से संचालित होनी चाहिए और यह कि एक ख़ास विचारधारा को बाकी सभी विचारधाराओं का खात्मा कर देना चाहिए….

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पंत का विश्लेषण

ये बात तो माननी ही होगी कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी बड़ी बेबाक़ी से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) को घेरते हैं। दूसरे अनेक राजनीतिक दल चाहते हुए भी संघ को सीधे निशाने पर लेने से बचते हैं।

संघ पर दिए अपने बयानों के कारण राहुल गांधी की आलोचना भी हुयी है और उनके ख़िलाफ़ मानहानि का केस तक दाखिल किया गया है। लेकिन राहुल गांधी संघ की आलोचना का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं।

अभी 24 अगस्त को लन्दन स्थित इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज़ में श्रोताओं के सवालों का जवाब देते हुए उन्होंने संघ को अरब दुनिया के संगठन ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ जैसा बता डाला। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत के मिजाज़ को बदलने और भारत की सभी संस्थाओं पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है, आरएसएस का विचार अरब दुनिया के मुस्लिम ब्रदरहुड के उस विचार के ही समान है जो कहता है कि हर एक संस्था एक ही विचारधारा से संचालित होनी चाहिए और यह कि एक ख़ास विचारधारा को बाकी सभी विचारधाराओं का खात्मा कर देना चाहिए

संघ का पलटवार करना लाजिमी था। लिहाजा संघ के राजनीतिक घटक भारतीय जनता पार्टी ने राहुल को ‘सबसे बुद्धिमान मूर्ख और अपरिपक्व-अनभिज्ञ नेता’ तक कह डाला। हम इस बहस में नहीं पड़ना चाहते कि राहुल गांधी अपरिपक्व अथवा अनभिज्ञ है या नहीं। हम तो बस यह जानने की कोशिश करेंगे कि राहुल ने अगर मुस्लिम ब्रदर हुड और आरएसएस में समानता बताई है तो उसके पीछे ठोस आधार हैं या फिर मामला हवा-हवाई है? इसके लिए पूरी अरब दुनिया में पैर पसारे मुस्लिम ब्रदरहुड संगठन के बारे में भी थोड़ा-बहुत जान लेना ज़रूरी होगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड (इख्वान) की स्थापना 1928 में मिस्र के इस्माइलिया में हसन अल-बन्ना ने की थी। पेशे से स्कूली शिक्षक बन्ना इस्लामिक विद्वान थे और वो अरब को विदेशी शासन से आजाद कर इस्लाम के आदर्शों पर आधारित राजव्यवस्था कायम करना चाहते थे। ग़रीब लोगों के बीच अपनी पैठ और किये जा रहे सामाजिक कार्यों के चलते संगठन राजनीतिक रूप से बहुत जल्दी प्रभावी तथा लोकप्रिय हो गया और मिस्र के राष्ट्रवादी आंदोलन में भी हस्तक्षेप करने लगा।

मुस्लिम ब्रदरहुड के तौर-तरीकों ने अरबी दुनिया के दूसरे देशों में भी अपने समर्थक बनाये। इस संगठन की एक खासियत यह भी थी कि ये धुर कट्टरवादी नहीं था और इसे इस्लामी सिद्धांतों और आधुनिकता के मूल्यों के बीच संतुलन व सामंजस्य बनाने से कोई परहेज़ नहीं था। यही कारण है कि यह वर्तमान के अल-क़ायदा और आईएसआईएस सरीखे जिहादी कट्टरपंथी संगठनों से अलग था। इसे लोकतंत्र और राष्ट्र-राज्य से कोई परहेज़ नहीं था। और इसी के चलते इसे अरब देशों में लोकप्रियता भी मिली।

इस्लामी ब्रदरहुड का मुख्य दर्शन समाज में रहते हुए सामाजिक कार्यों के माध्यम से लोगों के बीच अपनी विचारधारा को फैलाना है। इस तरह से कुछ समय बाद इसे लोकतांत्रिक तरीकों से सरकारी संस्थानों पर क़ब्ज़ा करने और अंत में एक धर्म शासित राज्य स्थापित करने में मदद मिलेगी।

अगर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की हिंदुत्ववादी विचारधारा और प्राकृतिक आपदाओं के समय संघ कार्यकर्ताओं द्वारा मुस्तैदी से पीड़ितों की मदद करना और मोहल्ले-मोहल्ले शाखाओं और सरस्वती शिशु मंदिरों का जाल बिछा कर लोगों के बीच अपनी पैठ बनाने की ओर नज़र डालें तो ये तौर-तरीक़ा तो वही दिखाई देता है जो इस्लामिक ब्रदरहुड का है।

इस तरह से देखा जाए तो राहुल गांधी कुछ ग़लत नहीं कह रहे हैं।

कुछ और समानताएं गिनाते हुए उन्होंने बाद में एक न्यूज़ एजेंसी से कहा -“1920 के दशक के दौरान ही दोनों संगठनों की नींव पडी थी, दोनों ही संगठन चुनावी प्रक्रिया को सत्ता पर कब्ज़ा जमाने का माध्यम मानते हैं, अनवर सादात की ह्त्या के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था, और महात्मा गाँधी की ह्त्या के बाद आरएसएस पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया था। दोनों ही संगठनों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। इसलिए दोनों सगठनों के बीच बहुत अधिक समानताएं हैं।”

राहुल गाँधी ने तो केवल कुछ ही समानताएं बताईं हैं। अगर गौर किया जाए तो दोनों सगठनों के बीच बहुत सी समानताएं नज़र आने लगेंगी।

पहली समानता
मुस्लिम ब्रदरहुड और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नज़रिये और कार्य करने की शैली में आपको समानता नज़र आएगी। दोनों ही संगठन लोगों को बहुसंख्यक धार्मिक समूह के तर्ज़ पर लामबन्द करते हैं और इस प्रकार उस बहुसंख्यक धार्मिक समूह का वर्चस्व समाज और सरकार दोनों पर ही समान रूप से हासिल कर लेते हैं।

दूसरी समानता
मुस्लिम ब्रदरहुड गरीब तबके के बीच दान-कार्य और सहायता के माध्यम से राजनीतिक जमीन तैयार करने पर जोर देता है। लिहाज़ा 1928 में जब इसकी स्थापना हुई तो पूरे मिस्र में इसकी शाखाएं खोल दी गईं। हर शाखाओं को एक मस्जिद, स्कूल और खेल क्लब की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया। इससे संगठन की सदस्यता काफी तेजी से बढ़ी। 1925 में अपनी स्थापना के शुरआती दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का जोर लोगों को हिन्दू अनुशासन का पाठ पढ़ाकर उनका चरित्र निर्माण करना और हिन्दू समुदाय को संगठित कर हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना था।

इस दिशा में संघ ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान यूरोप के दक्षिणपंथी समूहों से बहुत कुछ सीखा था। धीरे-धीरे संघ ने एक बहुत बड़े हिन्दू संगठन का आकार ले लिया जिसकी बहुत सारी अनुषांगिक इकाइयां गठित की गयीं जिनका काम इसके वैचारिक सिद्धांतों को फैलाने के लिए देश के कोने-कोने में सरस्वती शिशु मंदिर नामक स्कूल खोलना, दान-संस्थाओं और क्लबों को चलाना था।

तीसरी समानता
दोनों ही संगठन समाज सेवा के बहाने अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार करते हैं। संघ शाखाओं और सरस्वती शिशु मंदिरों को अपना माध्यम बनाता है तो ब्रदरहुड स्कूलों और खेल-क्लबों को। दोनों ही अपनी विचार-धारा से पहले व्यक्ति के नज़रिए को बदलने की कोशिश करते हैं, फिर उसके माध्यम से परिवार के नज़रिये को और अंत में पूरे समाज के नज़रिये को।

चौथी समानता
धार्मिक अल्पसंख्यकों को लेकर दोनों का ही नज़रिया भी एक जैसा ही दिखाई देता है। दोनों संगठन अल्पसंख्यकों को कुछ ऐसे पेश करते हैं मानों कि उन्हें ज़्यादा सुविधाएँ दी जा रही हों, उनका तुष्टिकरण किया जा रहा हो और वे हैं कि बहुसंख्यक आबादी के लिए ख़तरा बने हुए हैं।

पांचवी समानता
संघ की तरह ही ब्रदरहुड भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के देश प्रेम और देश भक्ति पर सवाल उठाता रहता है। संघ की तरह ब्रदरहुड पर भी अल्पसंख्यकों से घृणा करने और उन्हें हिंसा का शिकार बनाने के आरोप लगते रहे हैं। यह भी देखने में आया है कि दोनों को ही ‘षड्यंत्र के सिंद्धांत’ से लगाव है।

छठी समानता
दोनों ही संगठनों पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि वे अल्पसंख्यकों के प्रति हिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए करते हैं। दोनों ही इन आरोपों को ख़ारिज भी करते हैं।

सातवीं समानता
एक और चीज़ जो इन्हें समान बनाती है वो है इनका लचीलापन। दोनों ही संगठन ज़रुरत के हिसाब से एक पल उदारवादियों और धर्म-निरपेक्ष ताकतों के साथ गठबंधन बना लेते हैं तो दूसरे पल प्रतिक्रियावादी ताकतों के साथ खड़े दिखते हैं। वे हिंसा का इस्तेमाल तो करते हैं लेकिन मुख्यधारा में खुद को स्वीकार करवाने के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ने की बात भी कहते हैं।

आठवीं समानता
दोनों ही संगठनों पर समय-समय पर प्रतिबंध लगाए गए हैं।

नवीं समानता
दोनों ही संगठन अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान की दुहाई देते हैं, लेकिन इनका असली मक़सद राज्य की सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं पर अपनी विचारधारा का कब्ज़ा करवाना होता है। इसके लिए वे अपना राजनीतिक मंच तैयार करते हैं। संघ खुद को एक सांस्कृतिक संगठन ज़रूर कहता है लेकिन सत्ता पर क़ब्ज़ा करने के लिए इसने सरदार पटेल को दिए आश्वासन को तोड़ते हुए एक राजनीतिक घटक जनसंघ की स्थापना की जो बाद में भारतीय जनता पार्टी के रूप में सामने आया और आज देश के लगभग दो तिहाई हिस्से में सत्ता पर क़ाबिज़ है और संघ के व्यक्ति ही लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं के शीर्ष पर क़ाबिज़ हैं।

इसी तरह मिश्र में 2011 तक धार्मिक समूहों के चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध था, लेकिन इसे ठेंगा दिखाने के लिए ब्रदरहुड ने ‘फ्रीडम एंड जस्टिस पार्टी’ के नाम से एक राजनीतिक मोर्चा खोल दिया। पहले तो कहा गया कि मोर्चा चुनाव नहीं लड़ेगा लेकिन बाद में वो मुकर गया और चुनाव लड़ा, जिसके चलते 2012 में ब्रदरहुड के मोहम्मद मोरसी मिश्र के राष्ट्रपति बने। लेकिन साल भर बाद ही व्यापक जन प्रतिरोध के चलते सेना ने उनका तख्ता पलट कर दिया।

जन प्रतिरोध न केवल आर्थिक मुद्दों को लेकर था, बल्कि इस बात पर भी था कि देश और सरकार का तेजी से इस्लामीकरण हो रहा है और सरकारी संस्थाओं पर मुस्लिम ब्रदरहुड का क़ब्ज़ा बढ़ता चला जा रहा है।

तो क्या भारत में भी संघ द्वारा किये जा रहे भगवाकरण के खिलाफ उभर रहे जन प्रतिरोध का नज़ारा 2019 में भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ जनादेश के रूप में सामने आ पायेगा?