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विकासशील देशों की स्थिति पहले की तुलना में कई गुना मजबूत हो गयी है। इसके विपरीत अमेरिका और ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी देश गहरे आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं…

अभिषेक आज़ाद

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस साल ‘वर्ल्ड इकनोमिक फोरम’ की बैठक में हिस्सा नहीं लिया है। अमेरिका ने शीत युद्ध के दौरान परमाणु निरस्त्रीकरण के लिए रूस के साथ हुई ‘आईएनएफ़’ संधि को स्थगित कर दिया है। पर्यावरण की कई संधियों को मानने से इंकार कर दिया है। चीन के स्टील और एल्यूमिनियम आयात पर टैरिफ लगा दिया। अमेरिका और चीन के बीच’ ट्रेड वॉर’ गहराता जा रहा है। अपनी पुरानी साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की नीति का अनुसरण करते हुए वेनेजुएला में विपक्ष के नेता ‘गोइदो’ को समर्थन दिया है।

अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में शक्ति संतुलन बदल रहा है। आज की दुनिया को एक ध्रुवीय नहीं कहा जा सकता। विकसित और विकासशील देशों के बीच की खाई कम हो रही है। कई विकसित देश आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं। यूरोप के देशों की अधिकतम विकास दर 2 से 3 प्रतिशत है, जबकि कई विकासशील देशों की विकास दर 2 अंकों (दहाई) तक भी पहुंची है।

अब साम्राज्यवादी देशों के लिए तीसरी दुनिया के विकासशील देशों पर अपनी मर्ज़ी चलाना मुश्किल हो रहा है। विकासशील देशों की स्थिति पहले की तुलना में कई गुना मजबूत हो गयी है। इसके विपरीत अमेरिका और ब्रिटेन जैसे साम्राज्यवादी देश गहरे आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं। ब्रिटेन ब्रेक्ज़िट के दलदल में फंसा हुआ है, उसे समझ नहीं आ रहा कि कैसे बाहर निकलें।

अमेरिका के नेतृत्व में विकसित साम्राज्यवादी देशों ने अपने हितों को साधने के लिए विकासशील देशों पर स्वतंत्र व्यापार संधियाँ थोपी। किसी भी तरह के संरक्षणवाद या व्यापार नियंत्रण के प्रयासों का विरोध करने के लिए GATT और WTO जैसे संगठन बनाए। विकासशील देशों की अल्पविकसित अर्थव्यवस्थाओं पर वैश्वीकरण थोपा और उन्हें विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं से स्वतंत्र व्यापार के नाम पर प्रतियोगिता करने के लिए मजबूर किया। एक लम्बे समय तक सबकुछ उसकी मर्ज़ी के हिसाब से चलता रहा।

विकासशील देश विकसित देशों को कच्चे माल का निर्यात करते थे और विकसित देशों से बने हुए पक्के माल का आयात करते थे। इस पूरी प्रक्रिया में साम्राज्यवादी देशों के पूँजीपति वर्ग ने एक मोटा मुनाफा बनाया, किन्तु अब परिस्थितियां बदल गई हैं। विकासशील देश भी बने हुए पक्के माल का निर्यात करने लगे हैं।

विकसित देशों का घरेलू बाजार विकासशील देशों में बने हुए पक्के माल से भरा हुआ है। आज विकसित देशों को विकासशील देशों से कड़ी टक्कर मिल रही है। उनका पूंजीपति वर्ग विकासशील देशों के सस्ते माल का मुकाबला करने में पूरी तरह से असमर्थ है।

वह देश जो पूरी दुनिया को वैश्वीकरण की शिक्षा देता था और संरक्षणवाद का कड़ा विरोध करता था जिसने GATT और WTO जैसे संगठन बनाए, आज वही खुद को अंतरराष्ट्रीय संगठनों और संधियों से बाहर निकाल रहा है, वैश्वीकरण को छोड़कर संरक्षणवाद की नीति अपना रहा है। आज अमेरिका अपने ही बनाए हुए GATT और WTO से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है।

उसे ऐसा लगता है कि अब वह इन संगठनों का सदस्य रहकर अपने साम्राज्यवादी हितों को पूरा नहीं कर सकता, क्योंकि इन संगठनों में तीसरी दुनिया के देशों की स्थिति काफी काफी मजबूत हो गयी है। अमेरिका अब इन संगठनों को मनमाने ढंग से अपने इशारे पर नहीं चला सकता। उसके बनाये हुए संगठन उसके नियंत्रण से बाहर निकल रहे हैं और वह अपनी ही चाल में घिरता जा रहा है। अब वह इन संगठनों से बाहर निकलकर मनमाने ढंग से संरक्षणवाद, टैरिफ और हस्तक्षेप की नीति अपनाकर अपने साम्राज्यवादी हितों को साधने की कोशिश करेगा।

ऐसे समय में जब अंतरराष्ट्रीय संगठनों में साम्राज्यवादी देशों की स्थिति कमजोर हो रही है, विकासशील देशों को अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिए। साम्राज्यवादी देशों को आसानी से निकलकर भागने नहीं देना चाहिए। अब वक्त आ गया है कि साम्राज्यवाद के शिकार देश अंतरराष्ट्रीय संगठनों का इस्तेमाल साम्राज्यवादी शोषण के खिलाफ करें।

इसे लोकतांत्रिक और मजबूत बनाने की माँग करें। अंतरराष्ट्रीय मंचों का बेहतर उपयोग किया जा सकता है। जब साम्राज्यवादी देश पीछे हट रहे हैं, विकासशील देशों को आगे बढ़ना चाहिए। उन्हें साम्राज्यवादी देशों के संरक्षणवादी कदमों का कड़ा विरोध करते हुए स्वतंत्र व्यापार की मांग पर अडिग रहना चाहिए।

(अभिषेक आज़ाद दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में शोधछात्र और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं।)

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