Last Update On : 08 03 2018 11:04:00 AM

अगर स्त्री बुर्जुवा प्रसाधनों को त्याग करके अपनी देह को उसके जन्मना रूप में उजागर कर दे तो मरदानगी का दम भरने वालों के घुटने कांपने लगेंगे…

जयप्रकाश चौकसे

अमेरिका में महिलाओं को मत देने का अधिकार मिलने के उपलक्ष्य में महिला दिवस मनाया जाने लगा। यूरोप के देश भी अलग-अलग तिथियों पर महिला दिवस मनाते थे, परन्तु 1975 में यू.एन.ओ. ने तय किया कि सभी देश आठ मार्च को महिला दिवस के रूप में मनाएं।

इस उत्सव को मनाते हुए भी अनेक देशों में आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का नागरिक माना जाता है। पुरुष दृष्टिकोण में थोड़ा-सा अंतर आया है, परन्तु धार्मिक आख्यानों में महिला के साथ न्याय नहीं हुआ है।

संभवत: शिकार युग में ही समानता रही क्योंकि नारी का निशाना सटीक था और शरीर में ऊर्जा की भी कमी नहीं थी। जैसे-जैसे प्रगति होती गई, महिलाओं का शोषण भी बढ़ता गया। धार्मिक आख्यानों में ही गालव और माधवी की कथा का वर्णन है। गालव से गुरुदक्षिणा में आठ सौ श्वेत रंग के घोड़े मांगे गए। गालव ने ययाति से घोड़े मांगे। उसके पास अश्व नहीं थे तो उसने अपनी पुत्री माधवी उसे भेंट की, जिसे पुत्र देने का वरदान प्राप्त था। अत: पुत्र कामना हेतु एक राजा ने माधवी से विवाह किया और गालव को दो सौ घोड़े दिए।

माधवी ने राजा को पुत्र रत्न दिया और उसे अन्य राजा को ब्याहा गया। इस तरह माधवी ने एक-एक वर्ष के लिए चार राजाओं की पत्नी बनकर उन्हें पुत्र दिए और गालव घोड़े एकत्रित करता गया। गुरुदक्षिणा देने की मियाद पूरी होने पर गालव ने कुछ घोड़ों की कमी के एवज में माधवी गुरु को भेंट की।

गुरु ने कहा कि उन्हें पहले ही माधवी के बारे में जानकारी होती तो वे घोड़े मांगते ही नहीं। यह कथा उमाकांत मालवीय द्वारा शोधपरक किताब ‘टुकड़ा टुकड़ा औरत’ से ली गई है जिसे अनुभूति प्रकाशन, इलाहाबाद ने जारी किया था।

ग्वालियर में रहने वाले कवि पवन करण ने ‘स्त्री शतक’ संकलन में माधवी की तरह आख्यानों में हाशिये पर दर्ज शोषित स्त्रियों की वेदना पर कविताएं लिखी हैं। केशनी और वासंती गांधारी की सखियां थीं। मृदा वारणावर्त में अपने पांच पुत्रों के साथ जलकर मरने वाली भीलनी थी। रेवती बलराम की पत्नी थी।

ज्ञातव्य है कि बलराम श्रीकृष्ण के भाई थे परन्तु कुरुक्षेत्र से दूर रहे थे। द्रौपदी की मां सौत्रामणि की पीड़ा इस तरह अभिव्यक्त की है ‘आहुति से पुत्र चाहता राज्य, पहले ही कर चुका था मेरी कोख से शिखंडी होने की घोषणा’। पवन करण ने कर्ण की पत्नी वृशाली की व्यथा का भी वर्णन किया है। नयना धृतराष्ट्र की अंतरंग दासी थी जिससे युयुत्सु ने जन्म लिया था।

विश्व के तमाम आख्यानों में आपको दमित स्त्री पात्र मिल जाएंगे। पश्चिम के एक आख्यान में एक श्वसुर अपनी युवा विधवा बहू को नैतिकता के भाषण झाड़ता है, परन्तु हर रात वह स्वयं वेश्या के घर जाता है। एक दिन उसे सबक सिखाने के लिए बहु उस वेश्या की जगह घूंघट डालकर बैठ गई।

सारांश यह है कि सारे विश्व के आख्यानों में इस तरह नारी की व्यथाएं शामिल हैं। मौजूदा कालखंड में देश की राजधानी में एक कन्या के साथ की गई बर्बरता लंबे वक्त तक सुर्खियों में रही थी। सिमॉन द ब्यू ने अपनी किताब ‘सेकन्ड सेक्स’ में नारी वेदना का वर्णन किया है और हजार वर्ष के इतिहास का विवरण दिया है।

अपने एक अन्य लेख में वह लिखती हैं कि अगर स्त्री बुर्जुवा प्रसाधनों को त्याग करके अपनी देह को उसके जन्मना रूप में उजागर कर दे तो मरदानगी का दम भरने वालों के घुटने कांपने लगेंगे। पाकिस्तान की सारा शुगुफ्ता की पंक्तियां हैं ‘मरदानगी का दम भरने वालो, याद रहे कि औरत का बदन ही उसका वतन नहीं होता, वह कुछ और भी है’।

दरअसल, स्त्री पुरुष से कहीं अधिक शक्तिशाली है, परन्तु उसके लिए पुरुषों द्वारा तय किए गए लज्जा के दायरे में उसकी इच्छाएं घुट कर रह जाती हैं। गौरतलब है कि चीर हरण सारी लम्पटता का केन्द्र रहा है और सिलसिला द्रौपदी से जारी हुआ लगता है।

श्रीकृष्ण ने द्रौपदी की रक्षा की, परन्तु हर पीड़िता को श्रीकृष्ण कहां उपलब्ध हैं। याद आती है साहिर की पंक्तियां ‘आसमां पर है खुदा और ज़मीं पर हम, आजकल वह इस तरफ देखता है कम’।

हमारी संसद में महिलाओं के तैंतीस प्रतिशत प्रतिनिधित्व का बिल दशकों से लंबित है। कोई भी राजनीतिक दल उसे पास नहीं करना चाहता। यह संभव है कि स्त्री के खिलाफ षड्यंत्र आइने के आविष्कार के साथ हुआ कि वह स्वयं को निहारती रहे, सजती-संवरती रहे और उसके अधिकार का हनन होता रहे।

(मशहूर फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे का यह लेख दैनिक भास्कर से साभार)