फाइल फोटो

राम रहीम को पत्रकार छत्रपति की हत्या का दोषी ठहराये जाने के बाद उनके बेटे अंशुल कहते हैं, हमारे ऊपर कई नेताओं ने दबाव डाला कि हम इस मामले में पीछे हट जाएं। हमारे लिए डेरा जैसी बड़ी ताक़त से लड़ना बहुत मुश्किल था…

जनज्वार। पंचकुला की स्पेशल सीबीआई कोर्ट ने पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को दोषी पाया है। उसके अलावा तीन अन्य कुलदीप सिंह, निर्मल सिंह और कृष्ण लाल को भी पत्रकार की हत्या में संलिप्त होने का दोषी ठहराया गया है। 17 जनवरी को पत्रकार हत्या मामले में दोषियों को सजा सुनाई जाएगी।

सुनवाई से पहले पंचकूला में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट का सुरक्षा घेरा बढ़ा दिया गया था। बलात्कार मामले में राम रहीम को सजा के बाद पिछली बार हुई हिंसा को देखते हुए प्रशासन की तरफ से चाक-चौबंद हो काफी सुरक्षा इंतजाम किए गए थे। सुनवाई के दौरान मीडिया को अदालत के अंदर आने की इजाजत नहीं दी गई थी।

गौरतलब है कि निर्भीक पत्रकार के तौर पर ख्यात रहे पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या 2002 में कर दी गई थी। आज जब इस मसले पर सुनवाई हुई तो गुरमीत राम रहीम वीडियो कांफ्रेंस के ज़रिए पेश हुआ। गौरतलब है कि इससे पहले अगस्त 2017 में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने ही राम रहीम को बलात्कार कांड में भी सजा सुनाई थी।

राम रहीम को सीबीआई कोर्ट की स्पेशल अदालत द्वारा तब 20 साल की सजा सुनाई गई थी। सीबीआई कोर्ट ने दो अलग—अलग पीड़ितों के लिए 15—15 लाख का जुर्माना भी लगाया था और इसके अलावा 65 हजार रुपये का जुर्माना भी।

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यानी राम रहीम के खिलाफ सीबीआई अदालत ने कुल 20 साल की सजा और 30 लाख 65 हजार जुर्माना लगाया। अगर हायर अदालतों में सजा कम नहीं हुई तो राम रहीम 2037 तक जेल में रहेगा। तब उसकी उम्र 70 साल हो जाएगी। बलात्कार के मामले में दो साध्वी अपीलकर्ता शामिल हुई थीं। दोनों ही मामले को अदालत ने सच पाया था।

इस फैसले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह हुई थी कि दोनों ही बलात्कार की सजा एक साथ नहीं, बल्कि अलग—अलग चलेंगे। पहले बाबा एक बलात्कार की सजा काटेगा, उसके बाद अगले दस साल दूसरे बलात्कार में। बलात्कार के मामले में 10 साल की अधिकतम सजा है। राम रहीम को निर्धारित हुई आजीवन कारावास की सजा 14 साल से भी 6 साल ज्यादा है।

जिस पत्रकार रामचंद्र छत्रपति हत्या मामले में आज स्पेशल कोर्ट ने सजा सुनाई है, वह सिरसा के सांध्य दैनिक ‘पूरा सच’ के संपादक थे। साध्वी के साथ हुए बलात्कार की ख़बर प्रकाशित करने के कुछ महीने बाद ही छत्रपति की अक्तूबर 2002 में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।

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बीबीसी में छपी खबर के मुताबिक सीबीआई कोर्ट द्वारा राम रहीम को पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की हत्या का दोषी ठहराये जाने के बेटे उनके बेटे अंशुल छत्रपति ने पिता की हत्या के दिन की कहानी साझा की।

अंशुल कहते हैं, “उस दिन करवाचौथ का दिन था। मेरी मां को अचानक अपने मायके किसी की मौत का शोक प्रकट करने के लिए जाना पड़ा था। मेरे पिता रामचंद्र छत्रपति अक्सर अख़बार का काम करने के बाद घर लेट आते थे। मेरी मां के घर से जाने के कारण उस दिन मेरी छोटी बहन और भाई ने मुझे घर जल्दी आने के लिए कहा इसलिए मैं घर पर था। मेरे पिता भी उस दिन करवाचौथ का दिन होने के कारण जल्दी घर आ गए थे।’

24 अक्तूबर, 2002 की घटना को याद करते हुए रामचंद्र छत्रपति के बेटे अंशुल छत्रपति भावुक हो बताते हैं,”मेरे पिता मोटर साइकिल आंगन में खड़ा करके अंदर आए ही थे कि किसी ने आवाज़ देकर उन्हें बाहर आने को कहा। जैसे ही वो बाहर गए, अचानक स्कूटर पर आए दो नौजवानों में से एक ने दूसरे को कहा- मार गोली और उसने मेरे पिता पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। हम तीनों बहन भाई जितनी देर में यह समझ पाते कि हुआ क्या है, वो नौजवान भाग चुके थे।”

बकौल अंशुल ‘हम तीनों ने शोर मचाया और अपने पिता को संभालने की कोशिश की। पिताजी गली में से उठकर घर के दरवाज़े तक तो आ गए लेकिन फिर गिर पड़े। हमारा शोर सुनकर गोली चलाकर भागे एक नौजवान को घर से थोड़ी दूर एक पुलिस चौकी पर तैनात एक सिपाही ने पकड़ लिया। इसकी बाद में पुलिस ने शिनाख़्त भी कर ली। अब तक लोग इकट्ठे हो गए थे। हमने पड़ोसियों की कार मांगी और पिताजी को सरकारी अस्पताल ले गए। मेरे पिता को गोली मारे जाने की ख़बर आग की तरह फैली और रिश्तेदारों समेत कई लोग अस्पताल में इकट्ठे हो गए। उनकी हालात बहुत ख़राब थी इसलिए उन्हें रोहतक मेडिकल कॉलेज रेफ़र कर दिया गया। वहां उनकी हालत में कुछ सुधार हुआ पर फिर बिगड़ने पर दिल्ली के एक निजी अस्पताल ले जाया गया, वहां उनकी मौत हो गई।’

अंशुल कहते हैं, “हमारे ऊपर कई नेताओं ने दबाव डाला कि हम इस मामले में पीछे हट जाएं। हमारे लिए डेरा जैसी बड़ी ताक़त से लड़ना बहुत मुश्किल था। जब ये हुआ तब मेरी उम्र महज़ 22 साल थी और मैं बीए फ़र्स्ट ईयर का छात्र था।’

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पत्रकार रामचंद्र छत्रपति की 21 नवंबर 2002 को मौत के बाद दिसंबर 2002 में उनके परिवार ने पुलिस की जांच से असंतुष्ठ होकर मुख्यमंत्री को मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की गुहार लगाई थी। जनवरी 2003 में उनके बेटे अंशुल ने हाईकोर्ट में एक याचिका दायर कर मामले को सीबीआई को सौंपने की मांग की थी। इस याचिका में डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम पर भी इसमें संलिप्त होने के आरोप लगाये गए थे।

तब से अब तकरीबन 16 साल बाद राम रहीम इस मामले में दोषी सिद्ध हो पाया था। अब तक वह पैसे और ताकत के बल पर खुद को मामले से अलग—थलग करता आया था, मगर उसके खिलाफ मिले एक के बाद एक सबूतों और पत्रकार छत्रपति के परिवार की जीजान से न्याय पाने की कोशिशों नले आखिरकार साबित कर ​ही दिया कि उनकी हत्या में राम रहीम का ही हाथ था, क्योंकि वह साध्वियों के साथ बलात्कार मामले को दबाना चाहता था।


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