Last Update On : 10 05 2018 10:10:00 AM

पर सवाल ये कि क्या सिद्धारमैया से नाराजगी के बीच कांग्रेस ऐसा कर पाएगी

मोदी—शाह के सीधे निशाने पर राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया समेत कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व, राहुल गांधी ने भी कांग्रेस के लिए फिलहाल अपनी पूरी उर्जा कर्नाटक में ही लगा रखी है….

बेंगलुरु से मनोरमा की रिपोर्ट

कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 एक ओर कांग्रेस के लिए अस्तित्व बचाने के साथ साथ नाक का सवाल है तो वहीं भाजपा में सीधे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। इसलिए मोदी—शाह की जोड़ी महीने भर से भी पहले से पूरे राज्य में मैराथन रैली, रोड शो, सभाएं करने में व्यस्त हैं।

मोदी—शाह के सीधे निशाने पर राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया समेत कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व है। दूसरी ओर राहुल गांधी ने भी कांग्रेस के लिए फिलहाल अपनी पूरी उर्जा कर्नाटक में ही लगा रखी है।

इन सबके बीच राज्य के चुनाव परिणामों को लेकर विशेषज्ञों का आकलन, भविष्यवाणियां और विश्लेषण भी जारी है। सबसे पहले भाजपा की सरकार बनने का सर्वे आया फिर कांग्रेस को बहुमत मिलने की बातें हुई और अब त्रिशंकु विधानसभा की बात हो रही है। बहरहाल, परिणाम 15 मई को नतीजे आ जाने के बाद तस्वीर साफ हो ही जाएगी, लेकिन इन सबके मद्देनजर ये भी सच है कि चुनाव में हार जीत का दारोमदार स्थानीय मुद्दों पर ज्यादा रहता है।

केन्द्र की भाजपा सरकार ने पिछले चार सालों में क्या किया इससे ज्यादा लोगों के लिए ये मायने रखता है कि पिछले पांच साल में सिद्धारमैया ने कर्नाटक में क्या किया। हालांकि अगर कर्नाटक में भाजपा हारती है तो यह मोदीमुक्त भारत का श्रीगणेश भी होगा।

10 में से 7 ओपिनियन पोल कांग्रेस को भाजपा से ज्यादा वोट दिला रहे हैं। बड़ी बात यह है कि पिछले 35 सालों में कांग्रेस को कभी भाजपा से कम वोट नहीं मिले। हालांकि तमाम नाराजगियों के बीच आम लोगों की भी यही राय है कि जो भी है कांग्रेस मोदी की भाजपा से तो बेहतर ही है। 1983 से लेकर 2013 तक के सभी चुनावों में सिर्फ 1999 में ऐसा हुआ कि कांग्रेस को 34 प्रतिशत से कम वोट 28.95 प्रतिशत पड़े।

अगर बात करें सिद्धारमैया सरकार की तो तमाम तारीफों और आलोचनाओं के बीच ये भी सच है कि बेंगलुरु शहर की 27 सीटों पर (भाजपा विधायक और उम्मीदवार की मौत के चलते एक सीट पर चुनाव नहीं हो रहा है) वोट स्थानीय मसलों के आधार पर भी डाले जाएंगे।

लेकिन इस संदर्भ में सरकार का रिपोर्टकार्ड उतना प्रभावशाली नहीं है, खासतौर पर सड़कों, बुनियादी सुविधाओं, ट्रैफिक, पीने का पानी, झीलों की साफ सफाई और उनके प्रदूषण पर रोक तथा कचरा प्रबंधन इन सभी मोर्चो पर सरकार का काम ढीला रहा है।

बुनियादी ढांचे की उपेक्षा से विशेष रूप से आईटी सेक्टर के लोगों में कुछ नाराजगी है। बात अगर कचरा प्रबंधन की करें तो बेंगलुरु शहर की ये सबसे बड़ी समस्या बनकर उभरी है यहां तक कि पिछली बरसात में कोरमंगला में आये बाढ़ का कारण नालियों का कचरे से बंद हो जाना था, वो भी तमाम मॉल्स व फ्लिपकार्ट, आमेजन जैसी आॅनलाईन शॉपिंग कंपनियों के पैकिंग कचरे के नालियों में डंप किए जाने के कारण। सरकार की ओर से इन हालात के लिए कोई प्रभावी रूपरेखा नहीं है, न ही मॉल्स और कंपनियों की जिम्मेदारी सुनिश्चित की गई।

शहर की गरीब बस्तियों और झुग्गी या स्लम इलाकों के हालात बदतर हैं, जहां ना पीने का साफ पानी है, ना ही शौचालय और ना कचरा प्रबंधन, जबकि कांग्रेस का इन्हीं इलाकों में सबसे मजबूत जनाधार है। कर्नाटक स्लम विकास आयोग के मुताबिक राज्य में 2804 झुग्गी बस्तियां हैं, जिनमें से अकेले बेंगलुरु में ही 597 स्लम हैं। शहर का हर पांचवा व्यक्ति स्लम में रहता है और राज्य की कुल तीस से चालीस फीसदी आबादी स्लम और गरीब बस्तियों में रहने को अभिशप्त है।

कर्नाटक विधानसभा में बेंगलुरु की सीटों का योगदान 10 फीसदी का होता है। पिछले चुनाव में यहां की कुल 28 सीटों में से कांग्रेस को 13, भाजपा को 12 और जेडीएस को 3 सीटें मिली थीं। यानी चुनाव जीतने के लिए बेंगलुरु की अनदेखी नहीं की जा सकती, खासकर तब जबकि भाजपा मुख्य रूप से शहरी लोगों की पार्टी है।

इसीलिए पिछले छ: महीने से सिद्धारमैया ने बेंगलुरु की सुध लेना शुरू किया है, चाहे सड़कों का निर्माण या मरम्मत हों या झीलों की साफ सफाई का काम, बेंगलुरु के लिए दस हजार करोड़ के पैकेज की भी घोषणा हुई है, लेकिन ये काफी नहीं है। लोगों में गुस्सा है, कचरा प्रबंधन के मसले पर शहर के तमाम बुद्धिजीवी और प्रबुद्ध लोग भी एकजुट हैं और दलगत राजनीति से अलग हटकर लोगों से काम करने वाले उम्मीदवारों का चयन करने की अपील कर रहे हैं।

नागरिकों में वोट डालने के अभियान का प्रचार कर रहे समकारा बैंड के तीर्थो मुखर्जी कहते हैं हमारी टीम के लोग शहर के तमाम इलाकों में लोगों को 12 मई को वोट डालने के लिए निकलने को कह रहे हैं और किसी भी दल के सबसे बढ़िया उम्मीदवार को चुनने की अपील कर रहे हैं।

इसी तरह बेंगलुरु पोलिटिकल एक्शन कमिटी या बीपैक जैसी नागरिक संस्थाओं ने योग्यता के आधार पर अच्छे उम्मीदवारों की सूची बनाई और उनके लिए अपनी ओर से प्रचार कर रही हैं। मसलन, इस चुनाव में बीपैक ने भाजपा के 8, कांग्रेस के 12,आप के तीन, स्वराज इंडिया के एक और 22 निर्दलीय उम्मीदवारों का चयन किया है और इनके लिए प्रचार कर रहे हैं साथ ही जरूरी होने पर चुनाव लिए 2 लाख तक की वित्तीय सहायता भी प्रदान कर रहे हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में अखबारों के प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के सर्वेक्षण में कांग्रेस की जीती पिछली 13 सीटों की मुख्य समस्या कचरा प्रबंधन ही थी, इसके अलावा पेयजल और शौचालय की, चाहे बेंगलुरु का सबसे बड़ा स्लम राजेन्द्र नगर हो या गांधी नगर, कोरमंगला,व्हाईटफील्ड, बेलान्दूर और इलेक्ट्रॉनिक सिटी जैसे इलाकों के स्लम सभी बेहाल हैं।

महादेवपूरा विधानसभा क्षेत्र में आने वाले कादूबीसन्नाहल्ली के राजा रेड्डी लेआउट के इनसाईट ऐकेडमी से लगे इस इलाके की सड़कों से ही नर्क की परिकल्पना साकार होने लगती है। सड़क से गली तक कचरे का अंबार, रुका हुआ सड़ चुका पानी, आवारा कुत्ते, सुअर और चारों ओर से आती तेज दुर्गंध, लेकिन यहीं लगभग 500 लोग भी रहते हैं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंढ और असम से आकर गार्ड, कुक और ड्राईवर की नौकरी और मेहनत मजदूरी करने वाले लोग। यहीं रह रहे सुमित पटेल बताते हैं सात हजार किराए पर एक कमरा लेने पर भी ना किचन है ना शौचालय। चार लोग मिलकार कमरा शेयर करते हैं। अकेले उनके गाजीपूर ढाई सौ के करीब लोग हैं, सात—आठ साल बेंगलुरु में रहने के बाद भी ना वोटर आईकार्ड बना है इन लोगों का और ना ही कोई सहूलियत ही मिली है।

सुमित बताते हैं यहां 10—12 औरतें भी रहती हैं, लेकिन कमरों में शौचायल बगैर छत और दरवाजे के हैं, जिनमें ना नल है न ही पानी। ये ऐसे इलाके हैं जहां न कोई नेता जाता है और न ही प्रशासन के लोग। शहर की ऐसी तस्वीर सिर्फ इसी इलाके की नहीं है, बल्कि कई जगह ऐसे या इससे भी खराब हालात हैं। जाहिर है जनता चुनाव में सवाल पूछेगी ही और वोट के रूप में जवाब भी देगी ही।