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मोदी सरकार के कहे अनुसार अगर आरबीआई से उसका संचित कोष छिन गया तो आरबीआई भी अन्य बैंकों की तरह मुसीबतों से घिर जायेगा। ऐसे में सरकार आरबीआई के खजाने को हड़प लेगी और भारत में अर्जेंटीना जैसे हालात पैदा होंगे…

अभिषेक आजाद की रिपोर्ट

सरकार एक तरफ ऊँची विकास दर का दावा कर रही है, दूसरी तरफ आरबीआई पर ऋण के लिए दबाव बना रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर अर्थव्यवस्था में सबकुछ सही चल रहा है तो ऋण किसलिये? आखिर सरकार आरबीआई के रिजर्व कोष को हड़पने के लिये लालायित क्यों है?

वास्तविकता यह है कि नोटबंदी के दुष्परिणाम भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये घातक साबित हुये हैं। नोटबंदी के दुष्परिणामों के बारे में सभी अर्थशास्त्रियों में आम सहमति है। सभी इसे अंतिम विकल्प मानते हैं। अर्थशास्त्र का सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी इसके दुष्परिणामों के बारे में जानता है। नोटबंदी चलती हुई ट्रेन की चेन पुलिंग जैसा मूर्खतापूर्ण कदम है। अपनी मूर्खता पर शर्मिंदा होने के बजाय सरकार ने अर्थशास्त्र के उलट नोटबंदी के फायदों का दुष्प्रचार किया।

छोटे, लघु और मध्यम उद्योग नोटेबंदी की मार से संभले भी नहीं थे कि 6 महीने बाद जीएसटी थोप दी गयी। नोटबंदी और जीएसटी के कारण कई छोटे उद्योग बंद होने के कागार पर है। लघु एवं मध्यम उद्योगों के सामने कार्यशील पूंजी का संकट है।

सरकार ने आरबीआई के सामने माना कि नोटबंदी से लघु एवं मध्यम उद्योग तबाह हुये हैं। वित्त मंत्रालय ने रिजर्व बैंक से उसके पास जमा 3.6 लाख करोड़ रुपए सरकार को हस्तांतरित करने को कहा ताकि वह क़र्ज़ देकर लघु एवं मध्यम उद्योगों को बचा सके।

जीडीपी को विकास के लिये सतत निवेश की आवश्यकता होती है। नोटबंदी से पूंजी संचय और निवेश प्रभावित हुआ। सरकार कार्यशील पूंजी और निवेश की कमी को क़र्ज़ से पूरा करना चाहती है। आरबीआई ने 11 सरकारी बैंकों को पीसीए में मतलब प्रॉम्प्ट करेक्टिव एक्शन में डाल रखा है।

जब आरबीआई को लगता है कि कोई बैंक मुनाफा नहीं कमा रहा और उसका फंसा क़र्ज़ (बैड लोन) बढ़ रहा है तो आरबीआई उसे पीसीए में डाल देता है। पीसीए में शामिल बैंक न तो क़र्ज दे सकता है, न ही नई ब्रांच खोल सकता है। सरकार चाहती है कि आरबीआई इन 11 बैंकों को पीसीए से निकाल दे। आरबीआई ने लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) को कर्ज देने के नियम काफी सख्त कर दिए हैं। सरकार ने आरबीआई को क़र्ज देने के नियम सरल करने को कहा।

आरबीआई ने हाल ही में 31 नॉन बैंकिंग फाइनैंशियल कम्पनियों के लाइसेंस रद्द किए थे। सरकार चाहती थी कि केंद्रीय बैंक मुश्किल में चल रही इन कम्पनियों की मदद करे, लेकिन आरबीआई नहीं चाहता कि इन कम्पनियों का बोझ भी वह उठाए।

सरकार क़र्ज़ के माध्यम से अर्थव्यवस्था को उबारना चाहती है, जबकि आरबीआई इसके लिये बिलकुल भी तैयार नहीं। आरबीआई बढ़ते क़र्ज़ के संकट को देखने में सक्षम है, जिसका सरकार को अनुमान भी नहीं है। क़र्ज़ के माध्यम से अर्थव्यस्था की तबाही को कुछ देर के लिये टाला जा सकता है, किन्तु इसका समाधान नहीं किया जा सकता

क़र्ज़ के माध्यम से वित्तीय बाजार के बुलबुले को बढ़ाया तो जा सकता है किन्तु इसे फूटने से नहीं बचाया जा सकता। गुब्बारा जितना बड़ा होगा नुकसान भी उतना ज्यादा होगा।

शुरुआत में क़र्ज़ जीडीपी की विकास दर को बढाता है, किन्तु जैसे जैसे क़र्ज़ की मात्रा बढ़ने लगती है जीडीपी पर इसका प्रभाव कम होने लगता है। क़र्ज़ का पैसा वास्तविक अर्थव्यवस्था में निवेश होने की बजाय वित्तीय अर्थव्यवस्था में निवेश होने लगता है, जिसका जीडीपी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

वास्तविक अर्थव्यस्था ठहराव की स्थिति में रहती है, किन्तु वित्तीय अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ता जाता है। ऐसी स्थिति में जब वित्तीय बाजार का बुलबुला फूटता है तो अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आ जाती है। 2008 की महामंदी से पहले 2005 तक कुल अमेरिकी क़र्ज़ देश के जीडीपी का लगभग साढ़े तीन गुना था।

रिजर्व बैंक की चिंता जायज़ है। देश के बैंक ‘फंसे क़र्ज़’ (बैड लोन) के बोझ तले दबे हैं। ऐसी स्थिति में और क़र्ज़ देना आर्थिक संकट को हल करने की बजाय गहरा करेगा। बैंक अगर क़र्ज़ देते भी हैं तो कर्जधारक उसे वित्तीय बाजार में लगाएंगे, जिससे जीडीपी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। विकास तो होगा नहीं, किन्तु क़र्ज़ में डूबने से अर्थव्यवस्था और जर्जर हो जाएगी।

सरकार चुनाव से ठीक पहले एकमुश्त पैसा अर्थव्यवस्था में डालकर कारोबारी वर्ग को विश्वास दिलाना चाहती है कि सबकुछ ठीक हो जायेगा। सरकार चाहती है कि सभी बैंक ज्यादा से ज्यादा लोन बाटें। इस तरह के ‘स्टंट’ से क्षणिक लाभ तो मिल सकता है, किन्तु अर्थव्यवस्था को लम्बी कीमत चुकानी पड़ती है।

सरकार आगामी लोकसभा चुनाव में तात्कालिक फायदा देख रही है जबकि विरल आचार्या लम्बे समय की अर्थव्यवस्था को देख रहे हैं। हमें आरबीआई की चिंता को गंभीरता से लेना होगा।

वर्तमान सरकार ने एक बाद एक गलती करके भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। शिक्षा और स्वास्थय के बजट में कटौती की गयी। नोटबंदी और जीएसटी को बिना किसी तैयारी के लागू किया गया। अब आरबीआई के 3.6 लाख करोड़ के संचित कोष को हड़पना चाहती है।

अगर आरबीआई से उसका संचित कोष छिन गया तो आरबीआई भी अन्य बैंकों की तरह मुसीबतों से घिर जायेगा। हम नहीं चाहते कि सरकार आरबीआई के खजाने को हड़प ले और भारत में अर्जेंटीना जैसे हालात पैदा हो। अगर ज्यादा से ज्यादा क़र्ज़ बांटा गया तो अर्थव्यवस्था क़र्ज़ के गर्त में डूब जाएगी।

हमें 2008 की अमेरिकी महामंदी से सबक लेते हुए क़र्ज़ को न्यूनतम करने की कोशिश करनी चाहिए। बेहतर होगा यदि सरकार कोष हड़पने और क़र्ज़ को बढ़ावा देने की बजाय शिक्षा और स्वास्थय जैसी बुनियादी सेवाओं में निवेश करके अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने की कोशिश करे।

(अभिषेक आज़ाद दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में शोधछात्र और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं।)


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