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पत्रकार असित नाथ तिवारी का सरकार से दो टूक सवाल 

कासगंज में 26 जनवरी को एक युवक की हत्या हो गई। ये हत्या सांप्रदायिक झड़प में हुई। हत्या के बाद झड़प सांप्रदायिक दंगे में तब्दील हो गई और पूरा शहर कर्फ्यू के सन्नाटे में घिर गया। 27 जनवरी को शहर सुलगने लगा। झड़प और आगजनी की घटनाओं ने कर्फ्यू के सन्नाटे को कहर के कोहराम में तब्दील कर दिया। और यहीं से सवाल खड़ा हुआ कि ये हादसा हुआ ही क्यों ?

इस हादसे के कई पहलुओं की पड़ताल ज़रूरी है। पड़ताल होगी भी। फिलहाल जो बात सामने आ रही है वो ये है कि कासगंज में 26 जनवरी की सुबह कुछ युवकों ने मोटर साइकिलों पर सवार होकर तिरंगा यात्रा निकाली। इस यात्रा की सूचना स्थानीय प्रशासन और पुलिस को नहीं दी गई थी। पहली चूक यहां सामने आती है।

कथित तिंरगा यात्रा जब शहर के बड्डू नगर इलाक़े से गुज़र रही थी तब यात्रा में शामिल युवकों की किसी बात पर मुस्लिम समुदाय के कुछ युवकों से झड़प हो गई. पहले हाथापाई हुई फिर भीषण हिंसा हो गई। ये इलाका सांप्रदायिक नजरिए से बेहद संवेदनशील है। 1993 में इसी इलाके से भड़के दंगे ने राज्य के कई जिलों को अपनी चपेट में ले लिया था। इस इलाके में झड़प इस घटना में दूसरी प्रमुख चूक रही।

झड़प और हिंसा के बाद एक मस्जिद के नजदीक से गोलियां चलने लगीं। इसी गोलीबारी में शहर के नरदई गेट निवासी चंदन गुप्ता की मौत हो गई। फायरिंग के बाद खुद को घिरा देख कथित तिरंगा यात्रा निकालने वाले युवक वहां से जान बचा कर भागे। मामूली झड़प के बाद गोली का चलना इस घटना की तीसरी चूक थी।

इस घटना के बाद पूरे शहर में तनाव बढ़ गया। जब भीड़ ने कोतवाली का घेराव कर लिया तब पुलिस की नींद खुली। 27 जनवरी को पुलिस ये मानकर बैठ गई कि महकमे के बड़े अधिकारी शहर में मौजूद हैं लिहाजा कोई बड़ी घटना नहीं होगी। ये इस घटना की चौथी चूक रही। 27 जनवरी की सुबह से ही शहर में हिंसक घटनाएं होने लगीं। कई दुकानों समेत तीन बसों को भीड़ ने फूंक दिया।

अब इस घटना के बाद कई सवाल खड़े हो रहे हैं। पहला सवाल ये कि बिना स्थानीय पुलिस को सूचना दिए यात्रा क्यों निकाली गई ? दूसरा सवाल ये कि यात्रा को एक मस्जिद के नजदीक रोक कर वहां धर्म विशेष के खिलाफ नारे क्यों लगाए गए ? तीसरा सवाल ये कि जब यात्रा सड़कों से होते हुए संवेदनशील इलाके की तरफ बढ़ी तो पुलिस ने सुरक्षा के इंतजाम क्यों नहीं किए ? चौथा सवाल ये कि जब युवकों में किसी बात पर झड़प हो गई तो फिर गोलियां क्यों चलाई गईं ? पांचवा सवाल ये कि मस्जिद के आसपास उस दिन इतने हथियार क्यों इकट्ठा किए थे ? छठा सवाल ये कि मस्जिद के आसापस से गोलियां चलाने वाले कौन लोग थे ? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये कि इन तमाम मसलों पर नजर बनाए रखने के लिए जिस पुलिस तंत्र पर खरबों रुपये खर्च किए जाते हैं वो तंत्र कहां था ?

जब घटना हो गई, एक युवक की जान चली गई, दुकानें, बसें फूंक दी गईं और शहर के आपसी रिश्ते सुलग उठे तब पुलिस कमिश्नर सुभाष चंद्र शर्मा ये कह रहे हैं कि पुलिस ने लापरवाही बरती।

बात बड़ी सीधी है और वो भी सरकार से कि तू इधर-उधर की बात न कर बस ये बता कि काफिला क्यों लुटा ?

(पिछले डेढ़ दशक से पत्रकारिता कर रहे असित नाथ तिवारी इन दिनों इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हैं।)