file photo

राफेल सौदे में प्रधानमंत्री मोदी ने अनुभवहीन और कर्ज में डूबी रिलायंस को एचएएल के ऊपर तरजीह क्यों दी, जिसके पास रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में 70 सालों का अनुभव है….

वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट

जनज्वार। उच्चतम न्यायालय ने राफेल मामले में दाखिल सभी याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इस सौदे की जांच करना उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि राफेल विमानों की खरीद पर कोर्ट दखल नहीं दे सकता।

उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि विमानों की खरीद को लेकर भी कोर्ट दबाव नहीं बना सकता। देश के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा कि पसंद का ऑफसेट पार्टनर चुने जाने में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं है, और व्यक्तिगत सोच के आधार पर रक्षा खरीद जैसे संवेदनशील मामलों में जांच नहीं करवाई जा सकती।

इस फैसले के बावजूद भारत और फ्रांस सरकार में हुए इस सौदे में कई अहम सवाल हैं, जिनका जवाब न तो उच्चतम न्यायालय के फैसले से मिला और न ही इन सवालों का कोई जवाब सरकार से मिलने की उम्मीद है।

सवाल है कि अगर राफेल जेट्स के स्पेशिकिफेशंस वही हैं जो यूपीए की डील के वक्त के थे तो प्रत्येक एयरक्राफ्ट की कीमत में 300 प्रतिशत का इजाफा क्यों हुआ? सवाल है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुभवहीन और कर्ज में डूबी रिलायंस को एचएएल के ऊपर तरजीह क्यों दी, जिसके पास रक्षा विनिर्माण क्षेत्र में 70 सालों का अनुभव है?

सवाल है कि प्रधानमंत्री मोदी ने डीपीपी (डिफेंस प्रोक्योरमेंट प्रसीजर यानी रक्षा खरीद प्रक्रिया) गाइडलाइंस का उल्लंघन क्यों किया और अनिल अंबानी की रिलायंस डिफेंस को चुनने के लिए दसॉल्ट को क्यों प्रभावित किया?

सवाल यह भी है कि डील के समय फ़्रांस के राष्ट्रपति रहे ओलांद के दावे का क्या हुआ? उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि दाम को तुलना करना कोर्ट का काम नही तो फिर बिना जेपीसी के कैसे पता चलेगा कि यह घोटाला है या नहीं? सवाल उच्चतम न्यायालय से भी है की जब इन याचिकाओं की सुनवाई उसके अधिकार क्षेत्र के बाहर है तो उच्चतम न्यायालय ने इन याचिकाओं को पहले ही ख़ारिज क्यों नहीं कर दिया?

दरअसल उच्चतम न्यायालय ने अपने संवैधानिक दायरे में रहते हुए फैसला सुनाया है। उच्चतम न्यायालय मामले की तह तक, यानी बेंचमार्क प्राइज, नहीं गया है, जिस कारण विवाद है। बेंचमार्क प्राइज के मामले में कोर्ट ने दखल देने से ही मना कर दिया है।

आरोप है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफसरों, रक्षा मंत्री और रक्षा खरीद परिषद की राय के खिलाफ जाकर लड़ाकू विमानों के ‘बेंचमार्क प्राइज’ (आधार मूल्य) को 39,422 करोड़ से बढ़ाकर 62,166 करोड़ रुपये कर दिया और अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस को फायदा पहुंचाया।

उच्चतम न्यायालय ने बेंचमार्क प्राइज को लेकर कोई फैसला नहीं सुनाया। कहा कि विमान की कीमत देखना हमारा काम नहीं है। उच्चतम न्यायालय ने फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट से 36 राफेल विमान सौदे में किसी तरह की जांच की संभावना को नकारते हुए कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच से मना कर दिया है।

यह भी कि उच्चतम न्यायालय ने 8.7 बिलियन डॉलर की रक्षा डील में किसी तरह की अनियमितता नहीं पाई है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने फैसला सुनाते हुए कहा कि उन्हें ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे कहा जा सके कि सरकार ने किसी निजी कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए फ्रांस के साथ समझौता किया।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने यह भी कहा कि हम सरकार को 126 विमान खरीदने पर विवश नहीं कर सकते, और यह सही नहीं होगा कि कोर्ट केस के हर पहलू की जांच करे, कीमत की तुलना करना कोर्ट का काम नहीं है।

कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि उसे राफेल डील में ऐसा कोई सुबूत नहीं मिला है, जिसके आधार पर कहा जा सके कि केन्द्र सरकार ने दसॉल्ट समझौते में रिलायंस को फायदा पहुंचाने का काम किया। कोर्ट में केन्द्र सरकार ने कहा है कि दसॉल्ट से करार में ऑफसेट पार्टनर चुनने का दारोमदार फ्रांस की कंपनी के पास था।

ऐसे में सवाल यह है कि जब भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुई इस डील में दसॉल्ट के लिए यह जिम्मेदारी छोड़ी गई तब किस आधार पर भारत सरकार की एविएशन इकाई एचएएल एक ऐसी कंपनी से पिछड़ गई, जिसने एविएशन क्षेत्र में कदम करार के बाद रखा।

ऑफसेट क्लॉज फ्रांस-भारत डील का हिस्सा?
इस डील के साथ ही भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच समझौता किया गया था कि डील से दसॉल्ट को हुई कुल कमाई का आधा हिस्सा कंपनी को एक निश्चित तरीके से वापस भारत में निवेश करना होगा। डील के इस पक्ष को ऑफसेट क्लॉज कहा गया। डील के तहत दसॉल्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वह 8.7 बिलियन डॉलर की आधी रकम को वापस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करे। निवेश जब इस पैसे से होना था और ऑफसेट क्लॉज भारत-फ्रांस सरकार की डील का हिस्सा है। तब यह निवेश भारत में 3 दशक से एविएशन में काम करने वाली कंपनी की जगह ऐसी कंपनी में हुआ जिसकी नींव करार के बाद रखी गई।

राफेल मामले में सबसे पहले एमएल शर्मा ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। उन्हीं की याचिका पर 10 अक्टूबर को उच्चतम न्यायालय ने 10 दिनों के भीतर राफेल सौदे की पूरी प्रक्रिया की जानकारी मांगी थी। फिर न्यायालय ने सीलबंद लिफाफे में राफेल विमानों की कीमत भी मांगी थी।एमएल शर्मा के बाद आठ अक्टूबर को आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह और फिर 24 अक्टूबर को अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा के साथ संयुक्त रूप से प्रशांत भूषण ने इसी मसले पर याचिका दाखिल की थी।

जेपीसी की मांग पर अड़ा विपक्ष
भले ही राफेल सौदे को लेकर उच्चतम न्यायालय ने सारी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा है कि डील पर संदेह की कोई वजह नहीं है, लेकिन संसद में कांग्रेस, टीएमसी समेत पूरा विपक्ष जेपीसी की मांग पर अड़ा हुआ है। यही नहीं, कांग्रेस ने विमानों की कीमत को फिर से मुद्दा बनाने की कोशिश की है। कांग्रेस का कहना है कि हम कभी उच्चतम न्यायालय नहीं गए। हम जेपीएसी की मांग शुरू से कर रहे हैं।

राफेल डील पर सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में हो रही देरी
राफेल डील और नोटबंदी पर सीएजी की ऑडिट रिपोर्ट में हो रही देरी को लेकर देश में अहम पदों पर काम कर चुके 60 रिटायर्ड अधिकारियों ने पिछले दिनों राष्ट्रपति से दखल देने की मांग करते हुए पत्र लिखा था और कहा था कि राफेल डील को साइन किए हुए साढ़े तीन साल हो गए हैं, लेकिन कैग अभी तक ऑडिट नहीं कर पाया है।


जन पत्रकारिता को सहयोग दें / Support people journalism


Facebook Comment