Last Update On : 05 09 2018 02:18:26 PM
विश्वविद्यालय के मेन गेट पर हड़ताल कर रहे सुरक्षाकर्मी

अपनी मांगों के लिए सुरक्षाकर्मी विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने बैठ गए हैं शांतिपूर्ण अनशन पर

गुजरात, जनज्वार टीम। गुजरात में स्थित गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पिछले तीन साल से कार्यरत सुरक्षाकर्मी अपनी मांगों को लेकर आज सुबह से अनशन पर बैठे हुए हैं। वे पिछले तीन दिनों से विश्वाविद्यालय प्रशासन का चक्कर काट रहे थे और पिछले एक महीने से लगातार निवेदन कर रहे थे कि उन्हें हर बार की तरह नई सुरक्षा एजेंसी के साथ समायोजित किया जाय। लेकिन विश्वविद्यालय प्रशासन उनकी मांग को मानने को तैयार नहीं है। अब वे अपनी मांगों को लेकर विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार के सामने शांतिपूर्वक तरीके से सत्याग्रह कर रहे हैं।

सुरक्षाकर्मियों के साथ बरती जा रही अमानवीयता, असंवेदनशीलता और आर्थिक अन्याय व अन्य कई तरह के अनैतिक शोषण बहुत गंभीर सवाल इसलिए भी खड़े करते हैं, क्योंकि यह सब देश के वड़ा प्रधान मोदी के गृह राज्य की राजधानी गांधीनगर में घट रहा है।

पिछले कई सालों से गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय में सुरक्षाकर्मियों के साथ लगातार आर्थिक शोषण होता आ रहा था, अब तक संवेदनशील छात्रों व उनके कुछेक संगठनों के बीच उनके मूलभूत अधिकारों को लेकर, जिसमें उनको मिलने वाली मासिक तनख्वाह और अन्य सुविधाओं को लेकर विश्वविद्यालय परिसर में लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं।

लेकिन अमानवीयता की पराकाष्ठा तब पार हो जाती है, जब पिछले तीन सालों से बेहद कम सैलरी में कार्यरत सुरक्षाकर्मियों को नए सुरक्षा कम्पनी का टेंडर प्राप्त होने के बाद (जबकि पुराने सुरक्षाकर्मियों को प्रशासन द्वारा समायोजन को लेकर आश्वासन देने के बावजूद) उन्हें जलील करके बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और वे पिछ्ले कई महीनों से इसी उम्मीद थी उनके भी अच्छे दिन आएंगे। लेकिन आज उनके उससे भी बुरे दिन आ चुके हैं। उनके अच्छे दिन का ख्वाब अब एक बतौर कड़वे ख्वाब में बदल चुका है।

कुछ ऐसी है सुरक्षाकर्मियों के साथ अन्याय और शोषण की दास्तां
पिछले कुछ महीनों पहले तक गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के अधिकतर सुरक्षाकर्मियों को हर माह प्रति 8 घण्टे का 5400 रुपया दिया जाता था, जबकि उनकी मासिक आय कम होने से उनसे 4 घण्टे ओवरटाइम करने की मजबूरी होती थी और जिससे उन्हें कुल मिलाकर 7800 रुपए प्रतिमाह मिल पाता था।

वहीं भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के ‘न्यूनतम मजदूरी अधिनियम-1948’ के नियमानुसार सुरक्षाकर्मी या वॉचमैन दो कैटगरी में आते (पहले गैर हथियारबंद व दूसरे हथियारबंद) है। और इनमें तीन वर्ग आते (एरिया-A कुशल, एरिया-B अर्धकुशल, और एरिया-C अकुशल) है। चूंकि गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के सभी सुरक्षाकर्मी गैर हथियारबंद की कैटगरी में आते हैं। अतः इन तीन वर्गों की प्रतिदिन के हिसाब से आठ घण्टे का क्रमश: 653 रुपया, 593 रुपया और 506 रुपया नियमानुसार न्यूनतम मजदूरी के तौर पर मिलना चाहिए था।

अगर तुलनात्मक दृष्टिकोण से देखा जाय या फिर, किसी अकुशल, अप्रशिक्षित सुरक्षाकर्मी के प्रतिदिन आठ घंटे रूप में मासिक तौर पर 15180 रुपया मिलना चाहिए और वहीं ओवरटाइम सहित 12 घण्टे का 22770 रुपया प्रतिमाह होना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें 12 घण्टे का मात्र 7800 रुपया मिलता था। जबकि छात्रों के भारी दबाव के बाद बमुश्किल प्रशासन ने 900 रुपए प्रतिमाह प्रति आठ घंटे के हिसाब से सैलरी बढ़ाया गया था।

अब सवाल यह उठता है कि उनके कानूनी हक के बतौर कइयों साल से न्यूनतम मजदूरी का 14970 रुपया कहाँ और किसको जा रहा था। और वे कौन-कौन से लोग थे, जो उनका हक मार कर आर्थिक शोषण कर रहा थे। जिसकी सर्वप्रथम पूर्ण जवाबदेही विश्वविद्यालय प्रशासन की है जो इस मुद्दे को लेकर मौन साध रखा है।

अभी भी न्यूनतम मजदूरी अधिनियम-1948 का हो रहा है अतिक्रमण
नई सुरक्षा कम्पनी के आने के बावजूद सेवारत नए सुरक्षाकर्मियों का भी आर्थिक शोषण शुरू हो चुका है। सबसे निम्न श्रेणी के अकुशल सुरक्षाकर्मी के बतौर प्रतिदिन आठ घंटे के 506 रुपया यानि मासिक तौर पर 15180 रुपया मिलना चाहिए। लेकिन बमुश्किल उनको भी प्रतिमाह 8000 से 9000 रुपए के बीच में दिया जा रहा है। यानी प्रतिमाह प्रति सुरक्षाकर्मी का लगभग 6000 रुपए का हेर-फेर हो रहा है। ये नए सुरक्षा कर्मियों के साथ हो रहा शोषण व अन्याय की दास्तां है।

आखिर एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में कई सालों से ‘न्यूनतम मजदूरी अधिनियम- 1948’ का उल्लंघन क्यों हो रहा है? अगर वहीं उच्च श्रेणी में आने वाले सभी स्टाफ को पूरी सैलरी सहित सभी अन्य सुविधाएं आराम से मिल रही हो। जबकि निम्न श्रेणी में आने वाले सुरक्षा गार्डों के साथ ऐसा दुर्व्यहार एवं आर्थिक अन्याय क्यों हो रहा है। सवाल यह भी कि आखिर कब तक इस तरह का असंवेदनशील, अनैतिक एवं अमानवीय शोषण जारी रहेगा?

जब हर साल की तरह इस साल भी देश का प्रधानमंत्री लाल किले से चढ़कर यह कहते हैं कि यह गरीबों, शोषितों, पीड़ितों एवं वंचितों की सरकार है जो उनके हक एवं अधिकार को लेकर बेहद संवेदनशील है लेकिन विडम्बना देखिये आज भी उसी पार्टी की सरकार जो केंद्र के साथ-साथ गुजरात राज्य में भी सत्तासीन है।

हक एवं अधिकार की बात तो दूर छोड़िए इन शोषित, पीड़ित और वंचित सुरक्षाकर्मियों के साथ बरती जा अमानवीयता एवं शोषण को लेकर कोई कुछ सुनने वाला नहीं है और कोई कुछ कहने वाला है। जबकि गुजरात सरकार के इससे सम्बंधित विभाग यानी श्रम विभाग और अन्य प्रशासनिक विभागों को भी इन सुरक्षाकर्मियों ने सूचित कर चुके हैं, मगर सबके सब मौन हैं।