Last Update On : 02 04 2018 11:22:00 AM

महाराष्ट्र के वित्त मंत्री के जीजा ने जज लोया के पोस्टमार्टम में दिखाई थी विशेष दिलचस्पी, कारवां पत्रिका की नई रिपोर्ट में हुआ इसका खुलासा

जनज्वार, दिल्ली। मुंबई हाईकोर्ट के जज लोया हत्याकांड का खुलासा करने वाली पत्रिका कारवां ने फिर एक बार सनसनीखेज दावा किया है। उसकी आज प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि नागपुर मेडिकल कॉलेज के फोरेंसिक विभाग के प्रोफेसर डॉक्टर मकरंद व्यावहारे ने राजनीतिक संबंधों को निभाने के लिए जज लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फेरबदल की है।

पर चालाकी देखिए कि इस मामले के मास्टरमाइंड डॉक्टर मकरंद के हस्ताक्षर न तो जज लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की किसी फाइल पर हैं, न ही अदालत के किसी कागजात पर। पहली निगाह में लगता है कि मकरंद का तो कोई रोल ही नहीं है, लेकिन जब खुलासे होते हैं तो पता चलता है कि भाजपा ने अपने अध्यक्ष और सोहराबुदद्दीन शेख फर्जी इनकांउटर मामले के आरोपी अमित शाह को बचाने के लिए कहां—कहां चादर तान रखी है।

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मुंबई हाईकोर्ट के जज लोया की उस समय मौत हो गयी जब वह गुजरात के सोहराबुदद्दीन शेख फर्जी इनकांउटर मामले की सुनवाई कर रहे थे और संभव था कि वह अगली सुनवाई पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को गिरफ्तार करने के आदेश दे सकते हैं। ऐसे में पूरी भाजपा अपने अध्यक्ष और प्रधानमंत्री मोदी के सबसे भरोसेमंद अमित शाह को बचाने के लिए झोंक दी गयी। ताकत इसलिए भी झोंकी कि अगर अमित शाह सोहराबुदद्दीन शेख मामले में नपते तो तत्कालीन मुख्यमंत्री और मौजूदा प्रधानमंत्री मोदी पर आंच नहीं आती, यह असंभव था।

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गौरतलब है कि गुजरात के सोहराबुद्दीन अनवर हुसैन शेख़ की 26 नवंबर 2005 की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई थी। हत्या के एक चश्मदीद गवाह रहे तुलसीराम प्रजापति की भी दिसंबर 2006 में एक ‘मुठभेड़’ में मार दिए गए। उसके बाद सोहराबुद्दीन की पत्नी क़ौसर बी की भी हत्या हो गयी। इन सभी हत्याओं के आरोप गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह पर लगे, जिसके बाद अमित शाह की गिरफ्तारी हुई।

अमित शाह की हत्या में संलिप्तता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में जांच चली। अमित शाह की इन हत्याओं में संलिप्तता का आरोप इतना सीधा था कि अदालत ने अमित शाह को राज्य-बदर कर दिया गया कि वह जांच को प्रभावित न कर सकें। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई गुजरात से बाहर करने की और कहा कि सुनवाई के दौरान जजों का तबादला न किया जाए।

पर मामले की सुनवाई कर रहे सीबीआई के विशेष जज जे टी उत्पत का ट्रांसफर कर दिया गया, क्योंकि उन्होंने मई 2014 में अदालत में उपस्थित होने समन किया। शाह ने पेश होने की छूट मांगी पर जज उत्पत ने नहीं दी, जिसके बाद उनका सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद ट्रांसफर कर दिया गया।

इसके बाद ये मामला जज लोया को सौंप दिया गया, पर यहां भी अमित शाह जज लोया की अदालत में पेश नहीं हुए और एक दिसंबर 2014 को लोया की मौत नागपुर में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इसके बाद जो जज एमबी गोसावी अमित शाह की संलिप्तता की जांच के लिए आए उन्होंने आते ही एक दिन का समय गवांए बिना दिसंबर 2014 में अमित शाह को इस मामले से बरी कर दिया और वह अपने बाल—बच्चों के साथ सुख चैन से जी रहे हैं।

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नागपुर के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में फोरेंसिक विभाग के प्रोफेसर डॉ. मकरंद व्यावहारे महाराष्ट्र के वित्त मंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व भाजपा अध्यक्ष सुधीर मंगतीवार के जीजा हैं। कारवां की जांच रिपोर्ट के तथ्यों पर गौर करें तो बहुत साफ हो जाता है कि व्यावहारे ने न सिर्फ अपने कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर जज लोया की मौत के पोस्टमार्टम रिपोर्ट को अपने मनमुताबिक बनवाया है, बल्कि इसके लिए जिस तरह का भी हथकंडा अपनाने की जरूरत पड़ी है, उसका इस्तेमाल किया है।

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नागपुर के सरकारी मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक विभाग में न्यायाधीश बीएच लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की दो महीने तक रिपोर्टर निकिता सक्सेना ने सिलसिलेवार जांच की। इस जांच के बाद निकिता ने अपनी रिपोर्ट में कई नए खुलासे किए हैं। इस खुलासे के बाद लोया हत्याकांड के संदेहों को बहुत ही प्रामाणिक तथ्य मिले हैं, जिससे साफ हो जाता है कि बहुत ही चालाकी और तैयारी के साथ जज लोया की हत्या को हर स्तर पर हॉर्ट अटैक में बदलने की सुनियोजित तैयारी की गयी है।

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महत्वपूर्ण यह है कि जज लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट डॉक्टर मकरंद व्यावहारे के निर्देश पर जारी की गई थी। व्यावहारे ने तय किया था कि जज लोया की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कौन—कौन से विवरण शामिल किए जाने हैं और किन तथ्यों को शामिल नहीं करना है। बाद में गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज द्वारा पोस्टमार्टम में छेड़छाड़ किए जाने की शिकायतों पर जांच बिठाई गई थी। डॉ. मकरंद जिन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बड़ी चालाकी से फेरबदल करवाए थे, वह जज लोया के किसी भी मेडिकल दस्तावेज में और अदालत में तक अपने नाम को सामने नहीं आने देने में अब तक सफल हो रहा था। जज लोया मामले में पोस्टमार्टम रिपोर्ट की गड़बड़ी में जितनी बड़ी भूमिका डॉ. व्यावहारे की रही है, वह अब तक मीडिया में सामने नहीं आ पाई है।

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सरकारी आधिकारिक दस्तावेजों के मुताबिक जज लोया का पोस्टमार्टम डॉ. एनके तुमराम ने किया था, जो कि गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में फॉरेंसिक विभाग में लेक्चरर थे। जबकि सच्चाई यह है कि पोस्टमार्टम डॉ. मकरंद व्यावहारे के निर्देशों पर किया गया था, जो तब वहीं प्रोफेसर थे और अब इंदिरा गांधी सरकारी मेडिकल कॉलेज, नागपुर में फोरेंसिक विभाग के प्रमुख हैं। व्यवहारे महाराष्ट्र की पावरफुल मानी जाने वाली चिकित्सा परिषद के सदस्य भी हैं जो कि राज्य के सभी चिकित्सकों के लिए पर्यवेक्षी निकाय है।

डॉ. व्यवहारे संस्थान और मेडिकल कॉलेज में राजनीतिक संबंधों के चलते कोई भी काम करवाने वाले शख्स के बतौर जाने जाते थे। अपने राजनीतिक संबंधों का लाभ लेकर ही वे एक लेक्चरर से हेड आॅफ डिपार्टमेंट समेत अन्य पावरफुल जगहों पर पहुंच बनाने में सफल रहे हैं। व्यावहारे महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुंगतीवार के जीजा हैं, जो कि फड़नवीस की कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखते हैं।

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पोस्टमार्टम के दौरान मौजूद रहे कर्मचारियों ने रिपोर्टर से हुई बातचीत में बताया कि डॉक्टर व्यावहारे पूरे पोस्टमार्टम के दौरान खुद खड़े रहे। डॉक्टर व्यावहारे उस समय बुरी तरह भड़क उठे जब एक जूनियर डॉक्टर ने जज लोया के सिर और पीठ पर लगी चोट को लेकर सवाल किया। कर्मचारियों के मुताबिक डॉक्टर व्यावहारे किसी कीमत पर नहीं चाहते थे कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में किसी भी उन तथ्यों का जिक्र हो जो मौके पर दिखाई दे रहे थे।

डॉक्टरी रिपोर्टों के मुताबिक जज लोया की मौत हॉर्ट अटैक से हुई है। लेकिन इस जांच रिपोर्ट से साफ है कि जज लोया की मौत का सच जान—बूझकर छुपाया गया है, जिसमें महाराष्ट्र के मंत्री के जीजा ने भाजपा हाईकमान के इशारे पर एक साजिशकर्ता की भूमिका निभाई है।