भाजपा इस चुनाव में उत्तराखण्ड से दो तो छोड़िये किसी एक सीट को भी खो देती है, तो यह उसकी कमजोरी के रूप में गिना जायेगा। इस पूरे घटनाक्रम की जवाबदेही प्रदेश का मुखिया होने के नाते प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर आयेगी…

रामनगर से सलीम मलिक की रिपोर्ट

जनज्वार। समूूचे उत्तराखण्ड के गांव-गधेरों को अपने पैरो से नाप चुका खांटी राजनीतिक जब कोई चुनाव लड़ने से मना करता हो तो इसके तमाम निहितार्थ में से एक यह भी है कि उसका अगला कदम क्या होगा। लोकसभा चुनाव की इस बेला में बात हो रही है नैनीताल के मौजूदा सांसद व सूबे के मुख्यमंत्री रहे चुके भाजपा के दिग्गज नेता भगत सिंह कोश्यारी की, जिन्होंने अपनी पार्टी से अपने चुनावी समर में न उतरने की घोषणा करते हुये पार्टी को दोराहे पर खड़ा कर दिया है।

कोश्यारी के इस इंकार के बाद पार्टी ने नैनीताल लोकसभा क्षेत्र से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को पार्टी प्रत्याशी बनाने की घोषणा की है। कोश्यारी की चुनाव न लड़ने की यह पुकार पहली नजर में उनकी बढ़ती उम्र का तकाजा लगता है और दावा भी उन्होंने यही किया है।

लेकिन शारीरिक रूप से फिट कोश्यारी क्या महज उम्र के चलते लोकसभा चुनाव में उतरने से गुरेज कर रहे हैं या इसके पीछे उनकी नजर कहीं और है। उत्तराखण्ड के राजनीतिक परिदृश्य पर एक नजर डालने मात्र से ही कोश्यारी के चुनाव न लड़ने के असलियत की झांकी नजर आने लगती है।

इस आइने में गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र के मौजूदा सांसद भुवनचन्द्र खण्डूरी पर भी एक नजर डाल लेते हैं, जिससे मामला कुछ हद तक साफ हो सके। 14 विधानसभा क्षेत्र में फैली गढ़वाल लोकसभा क्षेत्र का पूरा हिस्सा ही पहाड़ी क्षेत्र में पड़ता है। इसमें कुछ क्षेत्र तो बेहद दुर्गम है, तिस पर खण्डूरी की तबियत भी खराब रहती है। वह चाहकर भी पूरे गढ़वाल क्षेत्र में चुनावी दौर में नहीं घूम सकते।

लेकिन इसके बरअक्स नैनीताल लोकसभा क्षेत्र का पूरा क्षेत्र ही मैदानी इलाके में पड़ता है और कोश्यारी खण्डूरी के मुकाबले शारीरिक तौर पर न केवल फिट हैं, बल्कि किसी भी प्रकार की बीमारी आदि से भी दूर हैं। यह था दोनों लोकसभा क्षेत्रों और वहां के वर्तमान सांसदों का भौगोलिक व शारीरिक फिटनेस विश्लेषण। अब बात की जाये राजनीतिक विश्लेषण की तो भाजपा के कई नेता सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर चुके हैं कि वर्तमान चुनाव बीते लोकसभा चुनाव के मुकाबले कहीं ज्यादा कठिन है।

बीते चुनाव में कांग्रेस के दस साल का कार्यकाल भारतीय जनता पार्टी के लिये सुनहरा मुददा होने के साथ ही ‘मोदी मैजिक’ भी साथ में था। लेकिन इस चुनाव में पार्टी लाख पिछले ‘सत्तर साल’ दोहरा ले, वह अपने पांच साल के कार्यकाल के लेखा-जोखे से नहीं बच सकती।

यही वह पेंच है जो कोश्यारी को कहीं और की राह दिखाने को मजबूर कर रहा है। राज्य की पांचों लोकसभा सीटो से भाजपा के सांसद होने के कारण इस चुनाव में कांग्रेस के पास खोने के लिये कुछ नहीं है तो दूसरी ओर बदले माहौल में भाजपा के सामने हर लोकसभा क्षेत्र में ‘हर हाल में’ अपना गढ़ बचाये रखने की चुनौती है।

भाजपा के अंदरुनी सर्वे में भी पार्टी को दो सीटों पर कमजोर माना गया है। ऐसे में यदि भाजपा इस चुनाव में दो तो छोड़िये किसी एक सीट को भी खो देती है, तो यह उसकी कमजोरी के रुप में गिना जायेगा। इस पूरे घटनाक्रम की जवाबदेही प्रदेश का मुखिया होने के नाते प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत पर आयेगी, जिसके बाद शायद ही उनकी कुर्सी सलामत रहे।

कोश्यारी को केवल इसी घड़ी का इंतजार है। वरिष्ठ होने के नाते केन्द्र में भी अपने से कहीं कम उम्र सांसद अजय टम्टा को केन्द्रीय मंत्री बनाने की जो टीस कोश्यारी के दिल में बनी हुई है, वही टीस गढ़वाल सांसद खण्डूरी के मन में भी थी। खण्डूरी की यह टीस पुत्र के कांग्रेस का दामन थाम लेने से हल्की हुई है, तो कोश्यारी की टीस का इलाज प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी है।


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