अन्ना आंदोलन में इस बार रामलीला मैदान से भीड़ थी नदारद, टीवी और अखबारों से भी आंदोलन के समाचार लगभग गायब, 6 दिन के अनशन के बाद अन्ना को शायद लगा कि इस बार का आंदोलन ताकत में मीलों है पीछे, कहीं ऐसा न हो कि सरकार रहे इससे बेअसर इसलिए वापस ले लिया आंदोलन

सुशील कुमार सिंह

जब बीते 23 मार्च को समाजसेवी अन्ना हजारे दिल्ली के रामलीला मैदान में अपने चित-परिचित अंदाज में लोकपाल, लोकायुक्त और किसानों की समस्या समेत चुनाव सुधार मुद्दे पर आमरण अनशन शुरू किया तो लगा कि अब बकाया चुकता होगा पर जिस तर्ज पर अन्ना आंदोलन का अवसान हुआ उससे यह समझना कठिन हो गया कि सवाल समाप्त हुए या कई और पनप गये।

बीते 29 मार्च को 7 दिन से उपवास पर बैठे अन्ना ने अनशन खत्म कर दिया और इसकी रस्म अदायगी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री फडणवीस ने जूस पिला कर की। अन्ना हजारे ने कहा कि सरकार ने केन्द्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त की जल्द नियुक्ति पर लिखित आश्वासन दिया है। इसके लिए सरकार को 6 महीने का वक्त दिया है। जाहिर है इस पर सरकार नहीं खरी उतरी तो वे रामलीला मैदान में फिर आयेंगे।

किसानों को डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन देने को भी सरकार तैयार है। इसमें फसल पैदा करने में किसानों की मेहनत और कर्ज पर लगने वाला ब्याज भी शामिल है। चुनाव सुधार पर क्या हुआ पता नहीं, पर जितना हुआ वह आंदोलन समाप्त करने के लिए काफी था। इसमें कोई दुविधा नहीं कि किसी भी आंदोलन की शुरूआत भी होती है और समाप्ति भी।

ऐसा नहीं है कि रामलीला मैदान में अन्ना हजारे का यह पहला आंदोलन था। इसके पहले यूपीए सरकार के समय में वे भारी-भरकम आंदोलन कर चुके हैं। आंदोलन करने से रोकने को लेकर अन्ना को उन दिनों तिहाड़ जेल भी भेज दिया गया था और जिस तर्ज पर देश ने अन्ना हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार और लोकपाल के मसले पर आंदोलन देखा है, उसके एवज में यह बहुत ही ठण्डा आंदोलन कहा जायेगा।

अन्ना आंदोलन को मीडिया कवरेज नहीं मिला, इलेक्ट्राॅनिक मीडिया तो मानो इससे दूरी ही बनाकर रखी था। समाचार पत्रों के बीच के पेजों में बॉक्स में कुछ खबरे पढ़ने को मिलीं और जनता तो मानो अन्ना को पहचानती ही नहीं थी।

आंदोलन दौर और परिस्थितियों के परिणाम होते हैं। साल 2011 में और उसके बाद जब दिल्ली के रामलीला मैदान में अन्ना आंदोलन शुरू हुआ तब का समय कुछ और था। उस दौरान यूपीए सरकार के संस्करण दो में भ्रष्टाचार का मुद्दा काफी बड़ा बन चुका था, साथ ही सरकार से जनता ऊब भी रही थी। ऐसे में अन्ना की हुंकार ने देश को एकजुट करने के काम आया। इतना ही नहीं आंदोलन को नियोजित करने वाले लोगों की कई पंक्ति भी थी।

अरविंद केजरीवाल से लेकर किरण बेदी, प्रशांत भूषण, संतोष हेगडेवार समेत कई लोगों का तन, मन, धन इसमें लगा था। इतना ही नहीं रामदेव आदि समेत कई जाने-अनजाने चेहरे आंदोलन को रसूकदार बनाने में लगे थे। आंदोलन को जिस प्रारूप में आगे किया गया था वह देश के प्रत्येक जनमानस के दिल को भी छू रहा था।

देश की आजादी के बाद शायद ऐसे आंदोलन कम ही हुए हैं। अन्ना आंदोलन के एपीसोड प्रथम ने उनमें महात्मा गांधी के अक्स को झलका दिया था। उस समय जब सरकार ने लोकपाल के मसले पर लिखित आश्वासन दिया और बिल पारित करने की बात हुई, तब इस आंदोलन को अवसान मिला था।

गौरतलब है कि अन्ना टीम और सरकार की टीम के बीच आंदोलन के पहले कई चरण की बैठकें भी हुई थी। भारतीय राजनीति में अन्ना की साख को देखते हुए एक बार फिर स्पष्ट होने लगी कि एक समाजसेवी व्यक्ति में अगर पारदर्शिता और ईमानदारी का पूरा प्रभाव हो तो करोड़ों लोगों से चुनी हुई सरकारें भी असहाय महसूस करती हैं। इसमें कोई दुविधा नहीं कि यूपीए सरकार ने अन्ना के आंदोलन और उनकी मांग को कहीं अधिक महत्व दिया था। दोटूक यह भी है कि केजरीवाल जैसे नेता भी इसी आंदोलनों की बड़ी उपज हैं।

अन्ना के आंदोलन पर कोई सवाल नहीं है न ही शुरुआत को लेकर न ही समाप्ति पर। मगर सवाल यह मन में उठ रहा है कि अन्ना को इस आंदोलन की आवश्यकता ही क्यों पड़ी। यूपीए सरकार साल 2013 में लोकपाल अधिनियम पारित कर चुकी है यह बात और है कि मोदी सरकार के लगभग चार साल बीत जाने के बावजूद देश में लोकपाल की नियुक्ति नहीं हुई है और न ही सभी राज्यों में लोकायुक्त बनाये गये हैं।

गौरतलब है कि प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग (1966-70) की रिपोर्ट में लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ति पहली बार हुई। सरकारें आती-जाती रहीं लोकपाल पर चर्चा भी होती रही और विधेयक भी आते रहे पर अधिनियम बनाना मुश्किल बना रहा। अन्ततः इस मामले में 2013 में सफलता मिली पर अधकचरी क्योंकि लोकपाल तो आज भी नहीं है।

हालांकि 1970 में लोकायुक्त के मामले में उड़ीसा विधानसभा द्वारा विधेयक बनाया गया जो देश का पहला अधिनियम है। जबकि लोकायुक्त की नियुक्ति महाराष्ट्र करने वाला पहला राज्य है।

आज भी लगभग 5 दशक होने के बावजूद दर्जनों प्रान्तों में लोकायुक्त नहीं है। हाल ही में देश की शीर्ष अदालत ने भी कहा कि जिन राज्यों में लोकायुक्त नहीं हैं वे बताये कि ऐसा क्यों है? निहित परिप्रेक्ष्य में सवाल यह भी है कि लोकपाल और लोकायुक्त के खेल में सरकारें असंवेदनशील क्यों हैं। जब वे यह कहती हैं कि वे ईमानदार हैं, पारदर्शी हैं और जीरो टाॅलरेंस की हैं तो फिर इनकी नियुक्ति से गुरेज क्यों?

जहां तक सवाल अन्ना आंदोलन की दूसरी मांग डेढ़ गुना ज्यादा समर्थन मूल्य वाली बात की है वह भी बीते 1 फरवरी के बजट में सरकार ने देने की बात कही थी तो यहां भी सरकार को अन्ना की बात मानने में क्या दिक्कत आती है और चुनाव सुधार के मामले में मोदी सरकार तो एक साथ चुनाव की बात कर ही रही है। अन्ना हजारे की मांग और सरकार के प्रयास एक ही जैसे प्रतीत होते हैं केवल लोकपाल को छोड़कर, तो फिर आंदोलन की रस्म अदायगी क्यों की गयी।

क्या अन्ना हजारे यह नहीं समझ पाये कि जिस मांग को वह सरकार के सामने रखने जा रहे हैं उसे लेकर सरकार पहले ही कदम बढ़ा चुकी है। उन्हें लिखित आश्वासन मिला है और ऐसा आश्वासन सरकार की जेब में होते हैं। वायदे करना और न निभाना साथ ही जुमलाबाजी करना सरकारों की फितरत रही है। सबकुछ जानते हुए भी इतनी आसानी से सरकार को अन्ना ने क्यों छोड़ दिया, जबकि वे पहले भी कह चुके हैं कि मोदी सरकार के दावे गलत हैं और गुमराह करने वाले हैं।

मोदी सरकार पर यह भी आरोप रहा है कि मीडिया को मैनेज करने में सरकार अच्छे-खासे तरीके से सफल है। रामलीला मैदान में भीड़ भी नहीं थी और टीवी और अखबारों से अन्ना आंदोलन के समाचार भी लगभग गायब थे। हो सकता है कि 6 दिन के अनशन के बाद अन्ना को यह लगा हो कि इस बार का आंदोलन ताकत में मीलों पीछे है तो कहीं ऐसा न हो कि सरकार इससे बेअसर रहे।

हालांकि अन्ना की कोशिशों को एक सीमा के बाद कमतर नहीं आंक सकते पर उनका होमवर्क दुरूस्त था ऐसा मान पाना भी कठिन है। संरचनात्मक तौर पर यह आंदोलन बिल्कुल कमजोर था जो मांग इसमें रखी गयी वह जनता को आकर्षित करने में नाकाफी रही यहां तक कि किसान आंदोलन का समूह भी अन्ना के इर्द-गिर्द नहीं दिखाई दिया और वे भी गुटों में बंटे रहे।

रोचक यह भी है कि अन्ना आंदोलन के ठीक पहले महाराष्ट्र में पूरे प्रदेश के किसान मुम्बई में इकट्ठा हो गये और वहां के मुख्यमंत्री फडणवीस ने तुरंत ही उनकी मांग स्वीकार कर ली। आंदोलन कोई बड़ा रुख लेता सब किसानों की घर वापसी करा दी गयी। किसान साथ नहीं थे, जनता का आकर्षण घट चुका था, मांगें भी घिसी-पिटी थी, सरकार भी पहले जैसी नहीं थी और अन्ना के इर्द-गिर्द भी पहले जैसा कुछ नहीं था तो फिर आंदोलन पहले जैसा कैसे हो सकता है।

(सुशील कुमार सिंह वाईएस रिसर्च फाॅउन्डेशन आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में निदेशक हैं)


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