Last Update On : 07 09 2018 04:03:05 PM

माओवादी आंदोलनकारियों के बीच भारत की छवि को स्‍वीकार्य बनाने में गौतम नवलखा का बहुत बड़ा योगदान है, जो शायद श्रीमान मोदी का भारत भूल गया है….

विष्‍णु शर्मा का विश्लेषण

वर्ष 2005 में नेपाल के तत्‍कालीन राजा ज्ञानेन्‍द्र शाह ने वहां की लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्‍त कर सत्‍ता पर निरंकुश राजशाही लाद दी थी। ज्ञानेन्‍द्र का आरोप था कि लोकतांत्रिक दल, मुख्‍य रूप से नेपाली कांग्रेस, भ्रष्‍ट हैं और माओवादी विद्रोह को थामने में विफल साबित हुए हैं।

1996 में आरंभ हुआ माओवादी जनयुद्ध अपने चरम पर था और देश के अधिकांश हिस्‍सों में माओवादियों की समानांतर सरकार काम कर रही थी, लेकिन इसी वक्‍त माओवादी पार्टी के भीतर पार्टी के अध्‍यक्ष पुष्‍प कमल दहाल ‘प्रचण्‍ड’ और बाबूराम भट्टराई के बीच अंतरविरोध भी तीव्र हो चुका था और पार्टी में विभाजन की स्थिति पैदा हो गई थी।

ये दोनों नेता ज्ञानेन्‍द्र के सत्‍ता हथियाने के बाद उत्‍पन्‍न राजनीतिक अवस्‍था का अपने अपने ढंग से आकलन कर रहे थे। प्रचण्‍ड का मानना था कि नेपाली क्रांति का मुख्‍य दुश्‍मन भारत है और ज्ञानेन्‍द्र को साथ ले कर क्रांति को आगे ले जाना चाहिए। इसके विपरीत बाबूराम का कहना था कि बदली हुई परिस्थिति में राजतंत्र मुख्‍य दुश्‍मन बन गया है और नेपाल के संसदीय दलों और लोकतांत्रिक देश भारत को साथ लेकर नेपाल में पूर्ण लोकतंत्र की स्‍थापना की जानी चाहिए। कालांतर में बाबूराम की लाइन की जीत हुई और माओवादी पार्टी और संसदीय दलों के बीच एक गठबंधन बना जिसे बनाने में भारत की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही।

2005 तक भारत माओवादी आंदोलन को आतंकवाद मानता था। इस पार्टी के बड़े नेता भारत की हिरास्‍त में थे, लेकिन 2005 में भारत ने अपनी नीति को 180 डिग्री घुमा दिया और माओवादी आंदोलन को एक वैध लोकतांत्रिक आंदोलन के रूप में स्‍वीकार कर लिया।

भारत के लिए संतोष की बात यह थी कि बाबूराम भट्टराई की लाइन पर माओवादी पार्टी काम करने को तैयार है और उसने नव जनवादी कार्यक्रम को त्‍याग दिया है। पार्टी में बाबूराम की उपस्थिति ने आगे के संभावित कंफ्यूजन को मिटाने में भारत के नीति—निर्माताओं और विशेषज्ञों की खुब मदद की।

लेकिन कूटनायिक चालबाजियों, जासूसी कथाओं और भारत तथा नेपाली राजनीति दलों के बीच जारी सौदेबाजियों के पर्दे के पीछे झॉंकने से पता चलता है कि नेपाल की तत्‍कालीन राजनीति की केन्‍द्रीय भूमिका में आने से ऐन प‍हले तक बाबूराम भट्टराई स्‍वयं अपने भविष्‍य को लेकर निश्चिंत नहीं थे।

2005 में माओवादी पार्टी ने बाबूराम भट्टराई, उनकी पत्‍नी हसिला यमि, पार्टी के पोलित ब्‍यूरो सदस्‍य दीनानाथ शर्मा और अन्‍य को बंधन बना लिया था। माना जा रहा था कि पार्टी उनकी हत्‍या करने वाली है। माओवादी पार्टी का आरोप था कि भारत में उनके बड़े नेताओं की गिरफ्तारियों में बाबूराम का हाथ है।

लेकिन बाबूराम नहीं मरे
बाबूराम आज जिंदा हैं क्‍योंकि गौतम नवलखा जैसे लोगों ने समय रहते उनका बचाव किया। इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि भारत भी बाबूराम जैसे ‘सॉफ्ट’ माओवादी को बचाना नहीं चाहता होगा या अपने स्‍तर से दवाब नहीं दे रहा होगा, लेकिन उन परिस्थितियों में भारत की चिंता को प्रचण्‍ड और उनकी पार्टी कितना मान्‍यता देते यह पूरे विश्‍वास के साथ नहीं कहा जा सकता। माओवादी पार्टी राजा के साथ मिलकर भारत के खिलाफ युद्ध में जाने के लिए भी तैयार थी। भारतीय सेना के संभावित हस्‍ताक्षेप के विरुद्ध माओवादी जनसेना टनल अथवा सुरंग युद्ध का अभ्‍यास कर रही थी।

आनंद स्‍वरूप वर्मा, गौतम नवलखा और अन्‍य भारतीय बुद्धिजीवियों ने तत्‍कालीन नेपाल कम्‍युनिष्‍ट पार्टी (माओवादी) को खुला पत्र लिखा, जो टाइम्‍स ऑफ इण्डिया में भी प्रकाशित हुआ था, और बाबूराम के खिलाफ कार्रवाई न करने का अनुरोध किया। इस भय से कि बाबुराम के खिलाफ कार्रवाई से भारत के लोकतांत्रिक और वाम चिंतक नाराज हो जाएंगे माओवादियों ने बाबूराम को बख्‍श दिया। बाद में, जैसा कि उपर बताया गया है, बाबूराम पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व में पुन: स्‍थापित भी हो गए।

आज गौतम नवलखा जैसे वाम और लोकतांत्रिक मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भारत का शत्रु बताया जा रहा है। 2005-2006 में नेपाल के माओवादी आंदोलनकारियों के बीच भारत की छवि को स्‍वीकार्य बनाने में इन चिंतकों का बहुत बड़ा योगदान है, जो शायद श्रीमान मोदी का भारत भूल गया है।

हम सिर्फ कल्‍पना ही कर सकते हैं कि माओवादी पार्टी और भारत के बीच जो अविश्‍वास की स्थिति थी वह क्‍या रूप धारण करती, यदि गौतम नवलखा और आनंद स्‍वरूप वर्मा जैसे बुद्धिजीवी देश में न होते जिन पर भारत को अपना शत्रु मानने वाले भी इतना विश्‍वास तो करते ही थे कि खुल कर अपने विचार रख सके।

कोई भी लोकतांत्रिक देश गौतम जैसे, सुप्रीम कोर्ट की भाषा में, सेफटी वॉल्‍व के बिना बहुत दिनों तक जिंदा नहीं रह सकता। गौतम जैसे स्‍वतंत्र चिंतकों की उपस्थिति देश को विश्‍वसनीय बनाती है। ये लोग विरोधी विचारों के मध्‍य संवाद को मुमकिन बनाते हैं जिससे शांतिपूर्ण सहअस्तिव मुमकिन होता है। लेकिन दुख: की बात है कि प्रचण्‍ड, बाबूराम भट्टराई और खुद भारत भी गौतम और गौतम जैसे चिंतकों की भूमिका को भुला देना चाहते हैं।

इस वक्‍त प्रचण्‍ड भारत की चार दिवसीय यात्रा में हैं और यकीन है कि उनसे मिलने वाले पत्रकार गौतम के बारे में उनसे सुनना चाहेंगे। और यह भी उम्‍मीद है कि बाबूराम भट्टराई गौतम के पक्ष में खुला पत्र न भी लिखें तो ट्वीट तो करेंगे ही।