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मार्क्सवादी आंदोलन उन सभी लोगों की धारणा को गलत साबित करता है जो यह मानते हैं कि अब वामपंथ की राजनीति का अंत हो चुका है…

अभिषेक आजाद

वामपंथी पार्टियों, संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने इस साल का आग़ाज़ 8-9 जनवरी की दो दिवसीय हड़ताल के साथ किया। इस हड़ताल में सभी ट्रेड यूनियनों और वामपंथी पार्टियों ने एक साथ लाल झंडा लेकर मार्च किया। यह हड़ताल ये साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मजदूर वर्ग की राजनीति का अभी अंत नहीं हुआ है।

देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं जो अब भी मार्क्सवाद में विश्वास रखते हैं, लाल झंडे के नीचे इकट्ठा होते हैं और साम्यवाद की स्थापना के लिए संघर्ष करते हैं। यह आंदोलन उन सभी लोगों की धारणा को गलत साबित करता है जो यह मानते हैं कि अब वामपंथ की राजनीति का अंत हो चुका है।

मार्क्सवाद एक विज्ञान है और यह निरंतर विकसित हो रहा है। कम्युनिस्ट घोषणा पत्र 1848 के प्रकाशन से लेकर अब तक साम्यवाद की स्थापना के कई प्रयोग किए जा चुके हैं और प्रयोग निरंतर जारी है। साम्यवाद की स्थापना का सबसे बड़ा प्रयोग अक्टूबर 1917 में रूस में हुआ। मार्क्सवादी सिद्धांतों को राजनीति के धरातल पर साकार करने का सबसे पहला श्रेय रूस के महान क्रांतिकारी नेता लेनिन को जाता है।

उसके बाद चीन और क्यूबा जैसे कई देशों में क्रांतियां हुई है और वहां पर मजदूरों की समाजवादी सरकार की स्थापना हुई। रूस में 1917 से लेकर 1989 तक समाजवादी सरकार रही। 1989 में सोवियत रूस के विघटन के बाद पूंजीवादी देशों ने इतिहास के अंत की घोषणा कर दी और वर्तमान पूंजीवादी व्यवस्था को अंतिम सत्य के रूप में प्रचारित किया।

यह सत्य है कि समाजवाद के कई प्रयोग असफल हुए हैं, किन्तु प्रयोगों की असफलता से विज्ञान का अंत नहीं होता अपितु उसकी परिकल्पना विकसित होती है। विज्ञान की समझ रखने वाले लोग यह जानते होंगे कि एक सफल प्रयोग के पीछे कितने असफल प्रयोग होते हैं। एडिसन को बल्ब बनाने के 10000 असफल प्रयोगों के बाद सफलता मिली। प्रयोग की असफलता से घबराकर जल्दबाजी में विज्ञान के अंत की घोषणा कर देना समझदारी नहीं होगी। मार्क्सवाद के अंत की घोषणा करने वाले लोगों को विज्ञान की बिलकुल भी समझ नहीं है।

इतिहास के विकास क्रम में आदिम साम्यवाद और सामंतवाद की अवस्था को पार करके हम वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था तक पहुंचे हैं। इससे आगे दो क्रमिक अवस्थाएं समाजवाद और साम्यवाद है। विकास के इस क्रम में हमे पूंजीवाद से आगे बढ़ना है। सामंतवाद की भांति पूंजीवाद भी अंतिम सत्य नहीं है। इतिहास किसी भी बिंदु पर रुकता नहीं। यह निरंतर आगे बढ़ता रहता है। समाजवाद पूंजीवाद की अगली अवस्था है।

रूस, चीन और क्यूबा जैसे अन्य कई देशों की क्रांतियों ने इस बात को साबित कर दिया है कि मार्क्सवाद या वैज्ञानिक समाजवाद महज कोरी कल्पना नहीं है। रूस में 72 वर्षों के लम्बे अंतराल तक समाजवादी सरकार का कार्यकाल रहा। क्यूबा और चीन की सरकारें आज भी समाजवादी होने का दावा करती है। इन देशों में समाजवाद का प्रयोग काफी हद तक सफल रहा है।

पूंजीवाद के गहराते अंतर्विरोध और आर्थिक संकटों ने सभी पूंजीवादी देशों को समाजवाद के बारे में सोचने पर मजबूर किया है। आज पूंजीवाद का है और आने वाला कल समाजवाद का होगा। मार्क्सवाद का अंत नहीं हुआ है, बल्कि यह आने वाले कल का सच है।

(अभिषेक आज़ाद दिल्ली विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में शोधछात्र और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं।)


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