Last Update On : 09 07 2018 09:39:47 AM
फोटो : आस मोहम्मद कैफ

पुलिस अफसर ने हमसे कहा, हम पर दबाव है या तो हम तुम तीनों का एनकाउंटर कर दें या फिर भीड़ के सामने से हट जाएं…

सुशील मानव, स्वतंत्र पत्रकार

जनज्वार। 28 जून 2018 को त्रिपुरा में बच्चा चोरी की तीन अलग—अलग घटनाओं में कथित भीड़ द्वारा तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी। कई लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। गंभीर रूप से घायल मगर जिंदा बचे इन्हीं लोगों में से एक हैं खुर्शीद।

25 वर्षीय खुर्शीद जिला मुजफ्फरनगर तहसील ककरौली के खेड़ी फिरोजाबाद गांव के रहने वाले हैं और दूरदराज के गाँवों में फेरी लगाकर कपड़े बेचने के पेशे मे लगे हुए हैं। 28 जून के उस भयानक घटना वाले दिन खुर्शीद दरभंगा के गुलजार और मुजफ्फरनगर के ज़ाहिद के साथ कपड़ा और छोटे छोटे इलेक्ट्रॉनिक समान बेचने के ताईं सीधाई मोहनपुर गए थे।

खुर्शीद उस दिन की खौफनाक घटना को जब याद करते हैं तो मौत का बेहद करीब से किया साक्षात्कार उनके चेहरे और आँखों में साफ दिखाई पड़ता है। दरअसल खुर्शीद पहले कन्याकुमारी में फेरी लगाकर कपड़े बेच रहे थे, पर उनका काम नहीं चल रहा था। एक साथी ने बताया था कि अगरतला में दो महीने अच्छी बिक्री होती है तो वो घटना से ठीक तीन दिन पहले ही अगरतला आये थे।

खुर्शीद घटना के बारे में विस्तार से बताते हैं कि एक स्थानीय गाड़ी किराये पर लेकर वो गुलजार भाई और ज़ाहिद भाई के साथ सुबह 6 बजे अगरतला से 25 किमी दूर सीधाई मोहनपुर गाँव पहुंचे। वे लोग अभी पहले ही घर मे प्रेशर कुकर दिखा रहे थे कि एक महिला ने उन लोगों को आगाह करते हुए कहा,- भाई आप लोग चले जाओ। यहां माहौल दो दिन से बहुत गर्म है। उस औरत ने बताया कि यहाँ बच्चा चोरी की अफवाह दो रोज से बहुत तेजी से फैल रही है। तिस पर खुर्शीद के साथ गए ज़ाहिद ने जवाब में उस महिला को अपना दुखड़ा सुनाते हुए कहा-‘बहन हम काम नहीं करेंगे तो भूखे मर जायेंगे।’

खुर्शीद आगे बताते हैं कि इसके बाद वहां कुछ और लोग आ गए उन लोगों ने हमसे हमारी आईडी प्रूफ मांगा। हमने अपनी आईडी प्रूफ दिखा दिया। ज़ाहिद भाई ने अपनी आईडी फोन में दिखाई। फिर चार पाँच लोग आपस मे बात करने लगे और उसके बाद फोन पर बात कर किसी को बुलाने लगे। वे लोग बंगला भाषा में बोल रहे थे वो क्या बात कर रहे थे, ये हम समझ नहीं पाये।

एक वाट्सअप अफवाह के चलते मॉब लिंचिंग का शिकार बन मौत के मुंह से लौटा खुर्शीद अपने मां—बाप के साथ

तभी उनके फोन पर एक मैसेज आया जिसमें बच्चा चोरों के बाबत लिखा हुआ था। साथ ही किडनी निकाल कर बेचने वाले गिरोह के इलाके में घूमने की चेतावनी भी लिखी हुई थी। उन लोगों ने वो मैसेज हमें दिखाया और उसमें से एक आदमी की कद काठी ज़ाहिद भाई से मिलती थी, इसलिए खासतौर पर ज़ाहिद भाई पर उनका संदेह गहराने लगा। फिर वो हम तीनों को लेकर वहाँ से बाहर आए।

बाहर का नजारा देखकर हमारी सांसें हलक में अटक गईं। कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सैकड़ों लोगों की भीड़ इकट्ठा होने लगी थी। इतने लोग इतनी जल्दी कहाँ से आ गये। सबकुछ उन तीनों की सोच के बाहर घट रहा था। ये सब पहाड़ी लोग थे, जिसमें कुछ नेताटाइप के लोग भी थे जो हम तीनों को लेकर थाने गए। उस समय घड़ी में आठ बज रहे थे। कुछ लोगों ने हमें बांग्लादेशी कहकर शोर मचाया। थाने में पुलिस ने हमारी आईडी प्रूफ चैक किया, जिसके बाद ही ये निश्चित हुआ कि हम तीनों भारतीय नागरिक हैं।

थाने में भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी। बावजूद इसके हम खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे थे, क्योंकि हम थाने में थे और पुलिस के संरक्षण में थे। इसके बाद कुछ स्थानीय नेताओं को बुलाकर हमसे बात करवाई गई। इस सबके बावजूद जाने क्यों वो हमें बच्चा चोर ही समझ रहे थे। हमने बताया कि हमारी गाड़ी में इलेक्ट्रॉनिक सामान और कपड़े भरे हैं, आप चेक करके तसल्ली कर लो।

गाड़ी ड्राइवर सोपान मियां स्थानीय निवासी था। बावजूद इसके वो सब यह मानने को कतई राजी नहीं थे कि हम तीनों बच्चा चोर नहीं हैं। हम चाहकर भी उनके यकीन को नहीं बदल पा रहे थे कि हम बच्चे चुराने वाले लोग नहीं हैं। हमारे कुछ समझ में नहीं आ रहा था हम लाचार और बेबस थे। धीर—धीरे तीन घण्टे बीत गए, भीड़ लगातार बढ़ती जा रही थी और अब ये हजारों लोगो की भीड़ थी।

हम अपने फोन से बात कर रहा थे और मदद मांग रहे थे। तभी थाने पर पथराव होने लगा। ठीक तभी एक पुलिस अफसर थाने आया और उसने हमसे कहा, ‘उन पर दबाव है या तो वे हम तीनों का एनकाउंटर कर दें या फिर भीड़ के सामने से हट जाएं।’

इतना सुनकर तो जैसे हमारी जान ही निकल गई। अब हम बदहवास थे, मौत हमारे बिल्कुल सामने थी। ज़ाहिद भाई ने मुझसे कहा,- अब हम नहीं बचेंगे खुर्शीद। मैंने अगरतला में अपने एक साथी को फोन किया और कहा भाई हम तो नहीं बचेंगे, मगर तुम यहाँ मत आना, बस इसके बाद भीड़ बेकाबू हो गई।

भीड़ हमारे खून की प्यासी हो गई थी हम सीधाई मोहनपुर थाने के अंदर ही थे। थाने के अंदर 20 से ज्यादा पुलिसवाले थे, सभी के सभी वर्दी में। बावजूद इसके पुलिसवाले खुद असहाय दिखाई दे रहे थे, मानो उनके हाथ बांध दिए गए हों। बाहर भीड़ शोर मचा रही थी कि अंदर बच्चों के चोर हैं, काट दो मार दो कटपीस कर दो। हमारी गाड़ी तोड़ दी गई, अचानक हथियारबंद भीड़ अंदर घुसने लगी।

सैकड़ों लोग एक साथ अंदर आ गए, वे सब लाठी—डंडे, लोहे की रॉड और कुछ धारधार हथियारों से लैस थे। पुलिस ने हमे एक फोल्डिंग के नीचे छिपा दिया। एक पुलिस वाले ने कहा सर फायरिंग कर दीजिए, मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया।

ज़ाहिद भाई ने फोल्डिंग पलंग के नीचे से सिर निकालकर बाहर झांकने की कोशिश की और तभी एक लोहे की चीज़ भड़ाक की तेज आवाज़ से उनके सर पर मारी गई, उनका भेजा बाहर निकल आया। भीड़ को पता चल चुका था कि हम यहां छिपे हैं और संख्या में तीन हैं।

गुलजार भाई ने जमीन से भेजा उठाकर कपड़े के सहारे ज़ाहिद भाई के बांध दिया। मैंने अपने सर के ऊपर अपने दोनों हाथ रख लिए। ताबड़तोड़ डंडे बरस रहे थे। तभी तेज फायरिंग की आवाज़ आने लगी। त्रिपुरा पुलिस के स्पेशल कमाण्डो हमारे लिए फरिश्ते बनकर आ गए थे। उनकी ताबड़तोड़ हवाई फायरिंग के चलते भीड़ भाग खड़ी हुई।

ज़ाहिद भाई की मौत हो चुकी थी। अनगिनत चोट खाने के बाद गुलजार भाई भी मौत से जूझ रहे थे। मुझे तो खुद के जिंदा होने पर भी कोई भरोसा नहीं था। कमांडो ने हमें आनन-फानन में गाड़ी में बैठाया। ज़ाहिद भाई को हमारे पैरों के नीचे छिपाकर चार कमांडो आगे और चार पीछे फायरिंग करते हुए हमें बचाकर अस्पताल ले आये।

भीड़ ने खुर्शीद के दोनों हाथ तोड़ दिये हैं। उनके दोनो हाथों में प्लास्टर बँधा है। चेहरे चोट के निशान और पूरी देह मार के सूजन से बाबस्ता है। दिल में ताउम्र न निकलने वाला खौफ हदस बनकर बैठी है। ये बात तो अब स्पष्ट हो गई है कि बच्चा चोर की अफवाह के पीछे गहरी राजनीतिक साजिश है।

बावजूद इस घटना के कई प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं कि उस पुलिस अफसर को तीनों का एनकाउंटर करने या भीड़ के हवाले कर देने का हुक्म देने वाला कौन था? सशस्त्र पुलिस बल ने पहले ही भीड़ को हटाने के लिए कोई उचित कारर्वाई क्यों नहीं की। आखिर पुलिस के होते पुलिस थाने में जाहिद की हत्या कैसे हो गई, क्या पुलिस ने उस हुक्म के बाद उन तीनों को भीड़ के हवाले कर दिया था?