Last Update On : 24 09 2018 06:45:27 PM

पिछले कई सालों का अनुभव कहता है कि जो भी सरकारी स्कीम, पॉलिसी और प्रोजेक्ट आते हैं जनरली होते हैं फेल, पहलेपहल देखकर लगता है इतना मनलुभावन जैसे देश में हो जाएगी कोई क्रांति, मगर जमीन पर यह योजनाएं हो जाती हैं फेल….

जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी ने कल रविवार 23 सितंबर को दुनिया की सबसे बड़ी हेल्थ योजना प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना- आयुष्मान लांच की, जिसका तहेदिल से स्वागत किया जाना चाहिए। झारखंड की राजधानी रांची से इसकी शुरुआत करते हुए मोदी ने कहा कि इस योजना से अब गरीबों को भी धनी लोगों की तरह स्वास्थ्य सुविधाएं मिलेंगी, मगर इसे लेकर तमाम सवाल उठने भी शुरू हो गए हैं।

शिक्षा—स्वास्थ्य के मसले पर दिल्ली में बहुत ही प्रभावकारी काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अशोक अग्रवाल कहते हैं, प्रधानमंत्री ने जो मोदी केयर योजना लांच की है, उससे 10 करोड़ परिवार जो गरीबी रेखा के इर्द—गिर्द है उन्हें लाभ मिलेगा, मतलब हिंदुस्तान की 50 करोड़ जनसंख्या को इस योजना का लाभ मिलेगा। आज देश की हालत हेल्थ के मामले में अलार्मिंग है, गरीब अपना इलाज नहीं करवा पाते हैं। कई बार तो गरीबों के पास इतने पैसे भी नहीं होते कि किराया देकर चला जाए हॉस्पिटल में।

अशोक अग्रवाल आगे कहते हैं, ऐसी स्थिति में मोदी केयर योजना का होना चाहिए स्वागत, मगर यह कई सवाल भी खड़े कर रही है। नेशनल पॉलिसी फॉर हैल्थ का जो ड्राफ्ट 2015 में मोदी सरकार ने निकाला था, उसमें लिखा था पब्लिक हेल्थ इसको सरकार स्टेट सब्जेक्ट से लेकर कॉरपोरेट लिस्ट में लाएगी। कॉरपोरेट लिस्ट से फिर इसे फंडामेंटल राइट बनाएंगे संविधान में। उसके बाद इस पर एक नेशनल लॉ बनाएंगे। मगर अफसोस कि जब इसको 2017 में फाइनल रूप दिया गया तो उसी पूरी तरह ड्राप कर दिया गया, यानी जो लॉ बनाने की योजना थी वह गायब हो गई। इससे मोदी सरकार की मंशा साफ होती है कि किसी को राइट आॅफ मेटर नहीं देना है, स्कीम के तहत इसे लागू करेंगे। चूंकि स्कीम कानूनी तरीके से बाध्य नहीं होती है, इसलिए अब भी आम जनता भगवान भरोसे ही रहेगी।

पिछले कई सालों का अनुभव कहता है कि जो भी सरकार स्कीम, पॉलिसी और प्रोजेक्ट बनाती है, जनरली फेल ही होती हैं। इन स्कीमों को पहलेपहल देखकर इतना मनलुभावन लगता है जैसे देश में कोई क्रांति हो जाएगी, मगर जमीन पर यह योजनाएं फेल हो जाती हैं।

मोदी केयर के बारे में भी लगता है कि यह ड्रीम ज्यादा रियलटी कम है। नेशनल पॉलिसी फॉर ट्रीटमेंट आॅफ रेयर डिजीज 2017 में बनाई थी मोदी सरकार ने और इसके लिए 100 करोड़ रुपया भी जारी किया। मगर आज तक रेयर डिजीज के एक भी पेशेंट को इस योजना का लाभ नहीं मिला। ऐसी योजनाएं राज्य और केंद्र सरकार के बीच में फंसकर रह जाती हैं।

अशोक अग्रवाल के मुताबिक केयर के विरोध में 5 राज्य सामने भी आ गए हैं, जिनमें से दिल्ली सरकार ने साफ—साफ कह दिया है कि हमें अपने राज्य में मोदी केयर स्कीम लागू नहीं करनी है। शेष 31 राज्यों जहां यह लागू की जानी है वहां भी राज्य—केंद्र के झगड़े में फंसकर रह जाएगी यह योजना। भ्रष्टाचार ने देश को इतनी बुरी तरह जकड़ा हुआ है कि 30 रुपए के स्मार्टकार्ड में जिसमें बीपीएल गरीबों का 30 हजार तक का इलाज होना था, निजी अस्पतालों ने कई जगह बिना इलाज के भी वह पैसा हड़प लिया। देश की 90 फीसदी से ज्यादा स्वास्थ्य सेक्टर प्राइवेट हाथों में है।

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