Last Update On : 24 06 2018 02:48:45 PM
फोटो : पीटीआई

देश लगा रहे इन खबरों में कि किसका पासपोर्ट नहीं बना, बना तो क्यों बना, कैसे एयरटेल वालों ने धर्म के आधार पर भेदभाव किया, किसे ओला वालों ने चलती गाड़ी से उतार दिया जैसी खबरों में, और वहां मोदी ने अंबानी—अडानी के हजारों करोड़ के फायदे के लिए कानून ही बदल दिया…

गिरीश मालवीय का विश्लेषण

मुकेश अंबानी की कम्पनी आलोक इंडस्ट्रीज औने पौने दाम में खरीद सके इसलिए मोदी सरकार ने कानून ही बदल डाला। चौंकिए मत, यह बिल्कुल सही विश्लेषण है जो किसी मीडिया चैनल या अखबार में आपको नहीं मिलेगा, इसलिए ध्यान से पढ़ लीजिएगा।

इंसोल्वेंसी एंड बैंक करप्सी कोड लाया ही इसलिए गया कि हजारों करोड़ के कर्ज डुबा कर बैठी कंपनियों को अडानी—अम्बानी जैसे बड़े उद्योगपतियों को बेहद कम कीमत में बेचकर उन्हें अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाया जाए और जनता को ठेंगा दिखा दिया जाए।

कल खबर आयी कि दिवालिया टेक्सटाइल फर्म आलोक इंडस्ट्रीज के कर्जदाताओं ने रिलायंस इंडस्ट्रीज और जेएमएफ एआरसी की ओर से संयुक्त रूप से जमा कराई गई समाधान योजना को मंजूरी दे दी है। ऋणदाताओं की समिति की वोटिंग में 72 फीसदी ऋणदाताओं ने रिलायंस का ऑफर मंजूर कर लिया।

अप्रैल के मध्य में हुई बैठक में रिलायंस और जेएम एआरसी के 5,050 करोड़ रुपये के ऑफर पर 70 पर्सेंट कर्जदाता बैंकरों ने ही सहमति दी थी, लेकिन तब ये सौदा नकार दिया गया था। इसकी सबसे बड़ी वजह एक नियम था जिसके तहत ऐसे रिजॉल्यूशन प्लान की मंजूरी के लिए कम से कम 75 पर्सेंट कर्जदाताओं की सहमति जरूरी है। अब सिर्फ 2 परसेंट ही बढ़त होने पर इसे रिलायंस को क्यो सौंपा जा रहा है।

दरअसल इन दो महीनों के दौरान सरकार ने इस 75 प्रतिशत ऋण दाताओं की मंजूरी वाले कानून में ढील देने वाला संशोधन पास कर दिया। यानी अब भी यह 75 प्रतिशत से कम है, लेकिन अब इस समाधान को मंजूरी दी जा सकती है।

अब सबसे कमाल की बात सुनिए इस सौदे से बैंकों को 86 फीसदी से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ रहा है, लेकिन बात अगर मुकेश अम्बानी के फायदे की हो तो जनता के पैसे पर डाका मारने से मोदी सरकार क्यों रुके।

आलोक इंडस्ट्रीज पर वित्तीय कर्जदाताओं का करीब 295 अरब रुपये बकाया है और मुकेश अम्बानी सिर्फ 50.5 अरब रुपये में आलोक इंडस्ट्रीज खरीद रहे हैं, यानी सरकार बैंकों पर दबाव डालकर 245 अरब रुपये पूरी तरह से डुबाने को आमादा है। लेकिन मजाल है कोई चूं तक बोल दे। इतना ही ऋण यदि किसानों का माफ कर दिया जाता तो पूरे भारत मे हल्ला मचा देते, वित्तमंत्री को ताव आ जाता, सारे आर्थिक विशेषज्ञ एक स्वर में ‘डुबा दिए’ ‘डुबा दिए’ का शोर मचाने लग जाते।

यह तस्वीर है ‘न्यू इंडिया’ की, आरती उतारिये इनकी और लगे रहिए कि किसका पासपोर्ट नही बना, बना तो क्यों बना, कैसे एयरटेल वालों ने धर्म के आधार पर भेदभाव किया, किसे ओला वालों ने चलती गाड़ी से उतार दिया जैसी खबरों में।

काश कि आप समझ पाते कि ऐसे बवंडर खड़े ही इसलिए किये जाते हैं कि आपका ध्यान इस आर्थिक लूट पर न जाए।