अधिकारी पहले सिर्फ 6 हजार देते हैं और कहते हैं कि पूरा शौचालय बना लोगे तो बाकी पेमेंट होगी, पर सवाल यह है कि जिस गरीब के पास भरपेट खाने का अन्न नहीं वह शौचालय का बजट कहां से जुटाए

मोदी सरकार की सर्वाधिक महात्वाकांक्षी योजना ‘हर घर में शौचालय’ की असलियत बताती अजय प्रकाश की रिपोर्ट

जनज्वार, आजमगढ़। मोदी सरकार की सर्वाधिक महात्वाकांक्षी योजनाओं में से एक शौचालय बनाओ अभियान की हकीकत यह है कि पहला पेमेंट अधिकारी केवल 6 हजार की करते हैं और इतने में शौचालय का पूरा ढांचा खड़ा करने के बाद ही 6 हजार देने की बात करते हैं, इसमें भी हजार—दो हजार कमीशन अलग मार लेते हैं। सरकार का शौचालय हमारे लिए गले की हड्डी बन गया है, क्योंकि 12 हजार में शौचालय बनता नहीं और नहीं बनवाने पर सरकारों द्वारा गांवों में तैनात अधिकारी जो नहीं बनवा रहे उनका राशन रोक दे रहे हैं।

इतनी बातें कहते हुए आजमगढ़ के सामाजिक कार्यकर्ता और जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव लड़ चुके अवधेश यादव आगे बताते हैं, ‘यह हाल उस गांव का है जिस गांव को यूपी के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके और मौजूदा सांसद मुलायम सिंह यादव ने गोद लिया है।’

आजमगढ़ के ही पलनी गांव के रहने वाले और यूपी में मानवाधिकारों के लिए सक्रिय रिहाई मंच से जुड़े विनोद कुमार यादव कहते हैं, ‘स्वच्छता अभियान की सफलताओं के चाहे जितने गाजे-बाजे विज्ञापनों में बजाए जाते हों, लेकिन हकीकत ग्राउंड पर जाने पर ऐसी सामने आती है कि मुंह से निकल पड़ता है कि मोदी की यह कल्याणकारी योजना है या गरीब ग्रामीणों पर थोपी गयी सरकारी आफत।’

तमौली की रहने वाली गायत्री देवी खुद इन दिनों शौचालय बनवा रही हैं। उन्होंने शौचालय का गड्ढा खुदवा लिया है और उनका अनुमान है कि कुल 50 हजार लग जाएगा, जबकि उन्हें सरकार की ओर से सिर्फ 6 हजार रुपए मिले हैं। वह बताती हैं कि उन पर शौचालय बनवाने का प्रशासन से दबाव था। शौचालय नहीं बनवाने पर राशन रोक देने की अधिकारी धमकी दे रहे हैं।

गायत्री देवी की बात सुन गांव के धर्मेंद्र यादव हंसते हुए कहते हैं, ‘मोदी जी की योजना है अगर शौचालय नहीं तो राशन नहीं। इसका मतलब है न खाएगा इंडिया न हगेगा इंडिया।’

धर्मेंद्र की बात सुन वहां खड़े सभी लोग हंस पड़ते हैं। लेकिन गांव के ही राजेंद्र सिंह के साथ शौचालय बनवाने वाले अधिकारियों ने जो किया है, उसे लेकर गांव में रोष है। राजेंद्र का भतीजा हमें बताता है कि डेढ़ महीना पहले शौचालय का गड्ढा अधिकारियों ने बलपूर्वक खुदवा दिया। हमारे चाचा नहीं खुदवा रहे थे तो सरकारी अधिकारियों ने 100 नंबर डायल कर पुलिस बुलवा कर खुदवाया। आज डेढ़ महीने बाद भी पैसा नहीं मिला कि चाचा शौचालय बनवा पाएं। उनके पास इतनी कमाई है नहीं कि खुद के पैसे शौचालय बन सके।

जिस टॉयलेट के लिए दिए जा रहे 12 हजार उसका एक नमूना

गौरतलब है कि मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को देशभर में एक राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की थी और कहा था कि महात्मा गांधी की 150वीं वर्षगांठ 2 अक्टूबर, 2019 तक भारत को खुले में शौच से मुक्त करना इस योजना का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है।

मगर यह स्वच्छ भारत मिशन शुरू से ही सवालों के घेरे में रहा है। मध्य प्रदेश के भोपाल में तो पिछले साल तत्कालीन शिवराज सिंह सरकार में स्वच्छ भारत अभियान का लक्ष्य पूरा करने की हड़बड़ी में आनन-फानन मॉड्यूलर टॉयलेट की मनमाने दामों पर खरीद करोड़ों के वारे-न्यारे किए गए। भोपाल नगर निगम ने करीब छह करोड़ रुपए की लागत से 1,800 मॉड्यूलर टॉयलेट खरीद का प्रस्ताव रखा था, जिसमें एक ही कंपनी से 12,000 रुपए औसत कीमत वाले टॉयलेट 32,500 रुपए में खरीदे गए।

यही नहीं पिछले साल ही विदिशा में तो स्वच्छता योजना के तहत बनाए गए 1309 शौचालय लापता मिले। दस्तावेजों के मुताबिक 1809 शौचालय बनाए गए, परंतु फिजीकल वेरिफिकेशन में मात्र 500 ही मिले। 1309 शौचालय कहां गए, किसी को नहीं पता। इस शौचालय घोटाले का पता तब चला जब स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत वेब पोर्टल में शौचालय निर्माण से सम्बंधित जानकारी अपडेट करनी थी। सर्वे दल द्वारा की गई जांच में यह गड़बड़झाला सामने आया।

इसी तरह अब उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में योगीराज में 12 हजार में बनने वाले सरकारी शौचालयों की क्या है हकीकत, इसको जानने के आप खुद सुनिए कि भुक्तभोगी क्या कह रहे हैं, कैसे ये शौचालय उनकी गले की फांस बन गए हैं…


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