70:30 फार्मूले के तहत सरकार अब सरकार शिक्षकों के वेतन का केवल 70% भुगतान करेगी, शेष 30% की व्यवस्था शिक्षण संस्थानों को स्वयं करनी होगी। 30% फण्ड की व्यवस्था करने के लिये कॉलेज और यूनिवर्सिटी को मजबूर होकर व्यावसायिक कोर्स शुरू करना होगा और फीस बढ़ानी होगी…

बता रहे हैं अभिषेक आजाद

सरकार ने पिछले साढ़े चार साल में शिक्षा व्यवस्था के बाज़ारीकरण और इससे समाज के बड़े हिस्से को बाहर करने के लिये कई महत्वपूर्ण नीतिगत फैसले लिये हैं। शिक्षा के बजट को कम किया है। शिक्षण संस्थानों का वित्तीय स्वायत्ता, 70:30 फार्मूला, उच्च शिक्षा वित्तीय संस्था (HEFA) और शिक्षकों की नियुक्ति में ठेकेदारी प्रथा के माध्यम से ‘निजीकरण और बाज़ारीकरण’ किया जा रहा है।

वित्तीय स्वायत्ता के नाम पर सरकार शिक्षण संस्थानों को बोल रही है कि अब आपके पास आर्थिक स्वायत्ता है, अपना ख़र्च खुद निकालिये। अगर आप अपना ख़र्च निकलने में असमर्थ हैं तो ‘उच्च शिक्षा वित्तीय संस्था’ (HEFA) से क़र्ज़ लीजिये और ब्याज सहित वापस कीजिये। इससे पहले शिक्षण संस्थानों को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) से जो पैसा मिलता था, उसे वापस नहीं करना पड़ता था।

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को खत्म करने की भी कोशिश की जा रही है। शिक्षण संस्थानों पर अधिक से अधिक व्यावसायिक कोर्स चलाने और हर साल फीस बढ़ाने का दबाव बनाया जा रहा है।

70:30 फार्मूले के तहत सरकार अब सरकार शिक्षकों के वेतन का केवल 70% भुगतान करेगी, शेष 30% की व्यवस्था शिक्षण संस्थानों को स्वयं करनी होगी। 30% फण्ड की व्यवस्था करने के लिये कॉलेज और यूनिवर्सिटी को मजबूर होकर व्यावसायिक कोर्स शुरू करना होगा और फीस बढ़ानी होगी। कुल मिलाकर इस फॉर्मूले के तहत शिक्षा का महंगा होना तय है।

शिक्षकों के रिक्त पदों पर नियुक्तियाँ नहीं हो रहीं। एडहॉक अध्यापको का समायोजन नहीं हो रहा। लोग 15-15 साल से एडहॉक पर पढ़ा रहे हैं और उनके पास कोई जॉब सिक्योरिटी नहीं है, उन्हें कभी भी बिना कारण बताये निकाला जा सकता है। ठेके पर शिक्षकों की नियुक्ति की एक नयी परम्परा शुरू की जा रही है।

इसी बीच 22 जनवरी 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने 200 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम पर यूजीसी और मानव संसाधन मंत्रालय की इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ याचिका को खारिज कर दिया। इसी के साथ ये तय हो गया कि अब यूनिवर्सिटी में खाली पदों को 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम के जरिये ही भरा जायेगा।

यूनिवर्सिटी में टीचरों का रिक्रूटमेंट डिपार्टमेंट/सब्जेक्ट के हिसाब से होगा, न कि यूनिवर्सिटी के हिसाब से। पहले वैकेंसी भरते वक्त यूनिवर्सिटी को एक यूनिट माना जाता था, उसके हिसाब से आरक्षण दिया जाता था। 13 प्वाइंट रोस्टर सिस्टम आरक्षण खत्म करने की एक साजिश है।

शिक्षा के बाजारीकरण और ‘शिक्षा विरोधी-जन विरोधी’ नीतियों के विरोध में हड़ताल और प्रदर्शन भी हुये। 08-09 जनवरी को एडहॉक शिक्षकों के अनशन के समर्थन में दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षकों ने दो दिवसीय हड़ताल की। शिक्षकों की नियुक्ति में ठेकेदारी व्यवस्था के खिलाफ 17 जनवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के 4500 शिक्षकों ने संसद मार्च किया और तीन दिन के लिये अध्यापन ठप रहा। 13 पॉइंट रोस्टर के खिलाफ 31 जनवरी को भारी संख्या में सभी संगठनों के लोग इकट्ठा हुये और संसद मार्च किया।

पूरे देश से छात्र और छात्र संगठन दिल्ली में 18 फरवरी को संसद मार्च के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। 19 फरवरी को देश के सभी शिक्षक और अभिभावक संगठन संसद मार्च करेंगे। 18 और 19 फरवरी का आंदोलन शिक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण है।

इस संघर्ष को जारी रखते हुये हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि हम अपने संघर्ष को कुछ रियायतों या बेहतर सेवा शर्तों तक ही सीमित न रखे। सीमित संघर्ष में क्षणिक रियायत तो मिल सकती हैं, किन्तु दीर्घकालिक पराजय निश्चित है। अर्थवाद के दलदल से बाहर निकलकर राजनीतिक संघर्ष करना चाहिये। राजनीतिक ताकत के अभाव में आर्थिक माँगे स्वीकार नहीं की जाती, जो लोग खुद को आर्थिक रियायतों तक सीमित रखना चाहते है, उन्हें भी अपनी राजनीतिक चेतना को विकसित करना चाहिये।

‘वर्किंग क्लास’ जैसा वर्ग ही पूंजीवाद से असंतुष्ट तमाम ताकतों को अपने साथ जोड़ सकता है और पूंजीवाद पर हल्ला बोलने के लिये उनका नेतृत्व कर सकता है। ‘वर्किंग क्लास’ एक ऐसा क्रांतिकारी वर्ग है जिसे इतिहास ने तमाम शोषित-पीड़ित जनता के संघर्षों को नेतृत्व प्रदान करने का दायित्व सौंपा है। हमारा अंतिम ध्येय समाजवादी क्रांति द्वारा मौजूदा अन्यायपूर्ण पूंजीवादी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को खत्म करना होना चाहिये।

1991 की नई पूँजीवादी आर्थिक नीतियों के बाद शिक्षा का निजीकरण और बाज़ारीकरण बड़ी तेजी से हुआ। सभी समस्यायों की जड़ पूंजीवादी राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था में है। पूँजीवाद से असंतुष्ट ताकतें ‘संसद मार्च’ तो करती हैं, किन्तु इन्हें संसद पहुंचने से पहले रास्ते में रोक दिया जाता है। इन पूंजीवाद से असंतुष्ट ताकतों को संसद तक पहुँचाकर समाजवाद की स्थापना करना वामपंथी पार्टियों का दायित्व है।


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