Last Update On : 23 04 2018 12:05:00 PM

जबकि ज्यादातर ओलंपिक मैडल महिला खिलाड़ियों की बदौलत हुए हासिल, ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का भाषण नहीं जमीनी स्तर पर लागू करो मोदी जी…

जगमति सांगवान, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता

2016 रियो ओलम्पिक खेलों में अभूतपूर्व जीत, आमिर खान द्वारा बनाई गई फ़िल्म दंगल का ब्लाक -बस्टर प्रदर्शन, महिला क्रिकेट द्वारा वर्ल्डकप विजय तथा अभी गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमण्डल खेलों में उम्दा प्रदर्शन इस तथ्य को बख़ूबी रेखांकित करते हैं कि देश के युवा खेल जगत में धाक ज़माने को तैयार हैं, अगर उन्हें सम्बन्धित पक्षों से समयोचित प्रोत्साहन मिले।

88 साल के इतिहास में भारत का यह तीसरा सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। किसी ने इसी दौरान लिखा ‘चमके गुदड़ी के लाल’, इसे इस तरह कहते आगे बढ़ें “चमके गुदड़ी के लाल और ललनाएँ’, क्योंकि ललनाओं की चमक का आभामण्डल इतना ख़ूबसूरती से उभरा है कि वो भाषा की बनगत के ढाँचों को भी अवश्य समृद्ध करेगा।

बहरहाल यहाँ मुख्य सवाल यह है कि जब अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर गरीबतम परिवार और उनके बच्चे मुख्यत: अपने प्रयासों से देश का परचम फहरा सकते हैं तो अगर सरकारें और समाज उनके साथ सच्चे दिल से खड़े हों तो वे भारत को खेलों में तो कम से कम उसके आकार अनुरूप सम्मान दिला ही सकते हैं। क्योंकि फ़िलहाल तो इन खिलाड़ियों को लेकर समाज और सरकार की मुख्य भूमिका यही नज़र आती है कि जब ये खिलाड़ी अपने परिवारों के तमाम बजट को निचोड़ कर, एड़ी—चोटी का जोर लगाकर मैडल जीत लेते हैं तो राजनेताओं व समाज नेताओं में “इनको सम्मानित कर” इनके साथ फ़ोटो खिंचवाने की होड़ सी लग जाती है।

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जिस समय ये खिलाड़ी आर्थिक सामाजिक तमाम तरह की विपरीत परीस्थियों से जूझ रहे होते हैं उस समय विरले ही इनका हाथ थामने को आगे आते हैं। महिलाओं, दलितों व अल्पसंख्यक सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों के संदर्भ में यह हक़ीक़त और भी भयावह रूप में सामने आती है। जितनी सफल स्टोरी हमारे सामने उभर कर आती हैं उनके कई-कई गुणा प्रतिभाएँ उपयुक्त खेल सुविधाओं, सही कोचिंग, किट व डाइट के अभाव में रास्ते में ही दम तोड़ जाती हैं।

खेल चयन में व्याप्त भाई—भतीजावाद से कितनों के ही सपनों की उड़ानों के पंख क़तर दिए जाते हैं। कितनी ही यौन शोषण की शिकार प्रतिभाएँ सालों साल अपना दर्द साथ लिए रास्ते तलाशने को मजबूर होती हैं। यह हमारे लिए विचारणीय सवाल होना चाहिए।

अकसर खेलों पर चर्चा में यह सवाल उभर कर आता है कि हमारे देश की खेल उपलब्धियाँ देश की आबादी व आकार के अनुरूप क्यों नहीं हैं? सवाल वाजिब भी है, परन्तु इसके जवाब पर अनेकों नज़रिये हो सकते हैं।

एक भीम अवार्डी खिलाड़ी व बीसियों वर्ष के खेल प्रशासकीय अनुभव के आधार पर मुझे यह लगता है कि देश को केवल मैडल जीतने के सरोकार से खेलों पर नीति तैयार करने की बजाय देश में एक व्यापक जन खेल संस्कृति पैदा करने के सरोकार से खेलों पर विमर्श खोलना चाहिए व संसाधनों को उसी दिशा में लगाना चाहिए।

हमें याद रखना चाहिए कि हमारे यहाँ मुख्यधारा की सोच खेलों बारे यह रही है कि “खेलोगे कूदोगे बनोगे ख़राब, पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब”। खेलों के स्वस्थ शारीरिक व मानसिक विकास के पोटेंशियल से रिश्ता अभी क़ायम ही नहीं हुआ। वरना ये कैसे हो जाता कि पंजाब जैसे राज्य का बडा नौजवान तबक़ा नशे की चपेट में चला जाए और हम कुछ कर ही ना पाएँ।

खेलों में नौजवान तबके को सृजनात्मकता के साथ जोड़ने की ताक़त है। बशर्ते की हम उसे पहचानें और उस जगह से खेलों से रिश्ता क़ायम करें। उस प्रक्रिया से मैडलों की खेती लहलहाएगी। इस नज़रिए में यह ज़रूरी है कि गाँवों व शहरों में खेलों का सुदृढ़ ढाँचा खड़ा करना हमारी पहली प्राथमिकता हो।

ये एक क़दम भी ईमानदारी से उठाया जाए तो चीज़ें काफ़ी हद तक सही दिशा में बदलना शुरू हो जाएँगी। किसे नहीं पता कि मैडल जीतने के बाद करोड़पति बनाना उस प्रतिभा को भुनाने वाला रिश्ता है और इसी वजह से खेलों में मालामाल होने की ललक खिलाड़ियों को ड्रग सेवन की तरफ़ भी धकेलती है। प्रतिभाओं के सम्मान व प्यार के ख़िलाफ़ तो कोई भी नहीं हो सकता। यह उनका हक़ भी है।

परन्तु पूरे खेल का कमर्शिएलाईजेशन खेल भावना को किल करता है। खेल की सुविधाओं के अभाव में उभरती हुई खेल प्रतिभाएँ निजी खेल एकेडमियों के शोषण का शिकार होती जा रही हैं। स्वयं जिस दिन पूरा देश राष्ट्रमण्डल खेलों में भारत के तीसर स्थान की ख़ुशी मना रहा था साथ में यह ख़बर भी चल रही थी की देश की उभरती आकांक्षा ‘मिलेनियम सिटी’ गुड़गाँव से 8वें मील पर (घामडोज) में फ़ुटबॉल टीम व उनके कोच वन मन्त्री व उनके लोगों की उनके खेल मैदान पर बदनीयत के ख़िलाफ़ आमरण अनशन पर। कई होनहार खिलाड़ियों की तबीयत बिगड़ने से उन्हें हस्पताल में ज़बरदस्ती भर्ती कराया गया।

दूसरी तरफ़ खेल संगठनों की कार्यप्रणाली व चरित्र को भी जन खेल संस्कृति के अनुरूप ढालने की सख़्त ज़रूरत है। राजनेताओं व अफसरशाही से इन्हें मुक्त करके इनमें असल खेल प्रेमियों व इस क्षेत्र की प्रतिभाओं से लैस करना चाहिए। इसके लिए सरकार को खेल बजट में पर्याप्त वृद्धि करते हुए खेल संघों की इन लोगों पर निर्भरता ख़त्म करनी होगी।

उभरते हुए तबक़ों में महिलाओं को ज़्यादा से ज़्यादा खेलों के प्रदर्शन और प्रबंधन दोनों में भागीदार बनाना होगा। अभी तक खेल संघों व नीति निर्धारण में उनकी सजावटी मात्र भागीदारी ही है। यहाँ तक की ओलम्पिक खेलों के एकदम बाद प्रधानमंत्री द्वारा गठित आठ सदस्यीय खेल टास्क फ़ोर्स में भी एक भी महिला नहीं रखी गई है, जबकि ओलम्पिक में मैडल तो वही जीत कर लाई थीं।

उससे गदगद होकर स्वयं प्रधानमंत्री ने ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नारे को बेटी खिलाओ’ तक विकसित करने का आह्वान किया था, जो आज शायद ही किसी को याद हो। तमाम तरह से दुत्कारी गई, परन्तु आज अपनी हिम्मत और हौंसले के आधार पर अपना स्थान बनाती प्रतिभाओं के विचारों, अनुभवों और आकांक्षाओं को शामिल करने से ही खेल दर्शन समृद्ध होगा। दुनिया की खेल ताक़तों द्वारा उनके यहाँ विकसित की गई खेल संस्कृतियों का रास्ता इन्हीं मुकामों से होकर गुज़रा है।

(अंतरराष्ट्रीय बॉलीवाल खिलाड़ी रहीं जगमति सांगवान सामाजिक कार्यकर्ता और विमैन स्टडीज़ सैन्टर की पूर्व डायरेक्टर हैं।)