मोदी के खिलाफ़ हर उस वर्ग का व्यक्ति खड़ा होने को विवश है, जो पिछले 5 साल में सबसे ज्यादा प्रताड़ित किए गए हैं। वो मोदी के खिलाफ़ चुनावी मैदान में उतरकर पिछले पांच साल की दमन, बर्बरता व तानाशाही सत्ता के खिलाफ़ अपना प्रतिरोध दर्ज करा रहे हैं….

सुशील मानव

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय सीट वाराणसी से उनके खिलाफ़ कई वर्गों के लोग चुनाव लड़ रहे हैं। व्यावहारिक राजनीति से सरोकार रखने वाले लोग कह रहे हैं कि क्या कई लोगों के चुनाव लड़ने से मोदी के खिलाफ़ पड़ने वाला वोट बँट नहीं जाएगा, इससे तो नरेंद्र मोदी को ही फायदा होगा, वो आसानी से चुनाव जीत जाएंगे।

प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ने वाला हर प्रत्याशी भले ही हार जाए, भले ही इतने प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने से मोदी के लिए जीत की राह आसान हो जाए, लेकिन इससे लोकतंत्र और प्रतिरोध की जीत होगी। मोदी के खिलाफ़ हर उस वर्ग का व्यक्ति खड़े होने को विवश है, जो पिछले पांच साल में सबसे ज्यादा प्रताड़ित किए गए हैं। वो मोदी के खिलाफ़ चुनावी मैदान में उतरकर पिछले पांच साल की दमन, बर्बरता व तानाशाही सत्ता के खिलाफ़, अपना प्रतिरोध दर्ज कर रहे हैं।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। बेगूसराय में राष्ट्रद्रोह के आरोप में जेल जाने वाले कन्हैया उस कथित राष्ट्रवादी के खिलाफ़ चुन लड़ रहे हैं, जो सरकार से असहमति रखने वाले हर व्यक्ति तो पाकिस्तान भेजता आया है।

सबसे पहले किसानों की बात करते हैं। तमिलनाड़ु के 111 किसानों ने मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। किसान इस सरकार में सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया गया है। कभी नोटबंदी तो कभी सरकार की कृषि विरोधी नीतियों के चलते किसान त्रस्त रहा है। किसानों की आत्महत्या की दर मोदी सरकार में और ज्यादा बढ़ी है।

किसानों ने पिछले पांच साल में अपनी मांगों को लेकर एक के बाद एक कई आंदोलन किये, लेकिन उनकी आवाज़ सुनना तो दूर सरकार ने कभी उन्हें लेफ्ट समर्थित उग्रवादी कहकर मजाक उड़ाया। कभी उनके निकले पेट का मजाक उड़ाते हुए कहा गया कि वो किसान नहीं हैं, तो कभी उनके पहनावे को टारगेट करके कहा गया कि किसान जींस पहनते हैं क्या तो कभी मोदी सरकार के कृषिमंत्री ने कहा कि किसान नपुंसकता के चलते आत्महत्या कर रहे हैं कर्ज के चलते नहीं।

किसानों की समस्याओं को सुनना तो दूर सरकार द्वारा किसानों पर पुलिस से गोलियां चलवाई गईं। पेशे से मजदूर किसान गयादीन कहते हैं जब दस लाख का सूट पहनने वाला फकीर हो सकता है, जींस पहनने वाला किसान क्यों नहीं हो सकता, तोंदवाला चौकीदार हो सकता है, तोंदवाला प्रधानसेवक हो सकता है तो तोंदवाला किसान क्यों नहीं हो सकता। गयादीन कहते हैं नरेंद्र मोदी किसान विरोधी हैं और अब किसानों ने सोच लिया है कि हम उन्हें हटाकर ही दम लेंगे।

मोदी के खिलाफ़ बीएसएफ के बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव ने चुनाव लड़ने का ऐलान किया है। ये वही तेजबहादुर यादव हैं, जिन्होंने अपने वीडियो के जरिए पूरे देश को ये बताया था कि अर्द्धसैनिक बलों को कितना घटिया खाना दिया जाता है। इसके बाद ही तरह तरह से तेजबहादुर यादव को प्रताड़ित करके उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया।

मोदी सरकार ने 2014 के चुनाव में वन रैंक वन पेंशन के वादे के साथ आई थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद वो अपने वायदे से मुकर गई। अपनी मांग को लेकर पूर्व सैनिक लगातार जंतर मंतर पर धरना देते रहे और मोदी की पुलिस ने उन पर लाठी चार्ज करके उन्हें जंतर मेंतर से खदेड़कर भगा दिया।

फर्जी राष्ट्रवाद के नाम पर कब तक सैनिकों को कुर्बान किया जाता रहेगा। कांवड़ियों पर फूल बरसाने के लिए सरकार हेलीकॉप्टर देती है और पुलवामा से सैनिकों को निकालने के लिए मांगने पर भी हेलीकॉप्टर नहीं देती। पूर्वसैनिक सरोजमणि कहते हैं, मोदी सरकार ने सेना का राजनीतिक इस्तेमाल करके न सिर्फ सेना को अवमूल्यित किया है, बल्कि सेना की गरिमा को भी ठेस पहुंचाई है। सरोजमणि कहते हैं मोदी सरकार दरअसल पुलवाला सैनिकों की लाशों को जरिया बनाकर फिर से सत्ता तक हथियाना चाहती है। मेरा समर्थन तेजबहादुर यादव के साथ है।

वाराणसी सीट से मोदी के खिलाफ़ चंद्रशेखर आजाद ने भी घोषणा की है। मोदीराज में गुजरात के ऊना से शुरु हुआ दलितों का दमन, रोहित वेमुला की संस्थानिक हत्या से होते हुए, सहारनपुपर में दलित समुदाय पर हमला और एट्रोसिटी एख्ट के डायल्यूशन के खिलाफ बुलाए गए भारतबंद में सरेआम दलित युवकों पर गोलीबारी करके दर्जनों युवकों की हत्या कर दी जाती है। हत्यारे को पकड़ने के बजाय मोदी सरकार उल्टे हिंसा फैलाने के फर्जी आरोप में दलित युवकों को उनके घरों से उठा उठाकर जेल में बंद करके प्रताड़ित करती है।

भीमा-कोरेगांव जीत की 200वीं सालगिरह मना रहे महार पर कट्टर हिंदुत्ववादी लोग हमले करते हैं, भीमा कोरेगांव में दंगे करवाते हैं और फिर पीड़ितों को ही दंगा भड़काने के आरोप में जेल में डाल देते हैं, जबकि संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे जैसे असली गुनहगारों को सरकार संरक्षण देती है। रामबली भारतीया कहते हैं- दलित समुदाय ही मोदी सरकार के ताबूत में आखिरी कील गाड़ेगा।

वाराणसी सीट से ही जस्टिस कर्णन भी मोदी के खिलाफ़ चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। जस्टिस कर्णन को सिर्फ इसलिए 6 महीने कारावास की सजा भुगतनी पड़ी, क्योंकि उन्होंने न्यायपालिका में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ़ मोदी सरकार को पत्र लिखकर कार्रवाई करने का आग्रह किया था। सरकार में काबिज लोगों द्वारा अपने अपराधों को छुपाने के लिए जज लोया की हत्या करवा दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के 4 जज ऐतिहासिक और अभूतपूर्व प्रेस कान्फ्रेंस करके देश की आवाम से बताते हैं कि लोकतंत्र खतरे में है, न्यायपालिका को उसका काम नहीं करने दिया जा रहा है। इसके अलावा राफेल स्कैम समेत तमाम मुद्दों पर मोदी सरकार गलत तथ्यों के जरिए सुप्रींम कोर्ट तक को गुमराह करती है।

मोदीराज लड़कियों और औरतों के लिए किसी भयावह यातना से कम नहीं है। अलग अलग तरह से महिलाओं पर कई तरह के हमले किए गए। उन्हें उनके अधिकारों से च्युत करके घर और चूल्हा-चौका तक सीमित करने की कोशिश पुरजोर हुई। यूनिवर्सिटी की छात्राओं को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।

पूजा शुक्ला, रिचा सिंह, शेहला रशीद, गुरमेहर कौर, और बीएचयू की छात्राओं को निशाना बनाया गया। राधा त्रिपाठी कहती हैं- मोदी सरकार द्वारा उज्ज्वला योजना को स्त्रियों के लिए कहकर प्रचारित करना स्पष्ट संकेत करता है कि ये सरकार कि एक सामंती योजना थी जो औरतों के अस्तित्व को चूल्हा चौका तक समेटती थी। सरकार के संरक्षण में चला लव जेहाद की अफवाह और एंटी रोमियो स्क्वॉड हम लड़कियों स्त्रियों को अपना प्रेमी और जीवनसाथी चुनने के अधिकार पर हमला था।

पुलिस लाठीचार्ज में घायल समाजवादी नेता और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष ऋचा सिंह

इसके अलावा बार बार भाजपा सांसदों व मोदी सरकार के मंत्रियों द्वारा औरतों से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील करना औरतों को फिर से बच्चा जनने की मशीन बनाने की साजिश थी। जबकि बलात्कारियों के ऊपर से इस सरकार में मुकदमे वापिस लिए गए, भाजपा के मंत्रियों द्वारा बलात्कारियों के संरक्षण में तिरंगा यात्राएं निकाली गई। हम स्त्रियां इसका विरोध करती हैं। वाराणसी सीट से महिलाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए किन्ही महिला प्रतिनिधि को भी मोदी के खिलाफ़ चुनाव मैदान में उतरना चाहिए।

वहीं व्यापारी वर्ग के लोगों का कहना है कि हमें भी जीएसटी, नोटबंदी और एफडीआई के विरोध में मोदी के खिलाफ अपने प्रतिनिधि उतारना चाहिए।

मोहम्मद ज़फ़र ने कहा कि- पांच साल में सबसे ज्यादा यातनाएं मुस्लिम समुदाय के लोगों का झेलनी पड़ी हैं। लेकिन हमारे समुदाय ने कभी कोई प्रतिरोध या आंदोलन नहीं खड़ा किया इसके खिलाफ़। अब समय आ गया कि हम लोकतांत्रिक तरीके से इसका उत्तर दें और वाराणसी से मोदगी के खिलाफ़ मुस्लिम प्रतिनिधि खड़े करें।


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