गोकशी पर सख्ती, शहरों—जिलों के नाम बदलकर उनका हिंदू नामकरण करना और कुंभ मेले का सरकारी आयोजन करके धर्म में व्यापार का समावेश करने जैसे कदमों के चलते योगी संघ के लिए हिंदुत्व का नया पोस्टर ब्वॉय बन चुके हैं…

सुशील मानव की रिपोर्ट

तीन राज्यों के चुनावी हार के बाद मोदी पर से भक्तों का भरोसा उठने लगा है, जबकि 2019 का चुनाव बिना दंगों, राम मंदिर और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बगैर अब संघ-भाजपा के लिए जीत पाना लगभग नामुमकिन है, संघ ये भलीभाँति जानता है। मोदी नाम का कारतूस दग चुका है। 2019 में उसे रिफिल करके इस्तेमाल करना संघ के लिए भी आत्मघाती हो सकता है। पिछले दो-तीन साल से योगी को देश के तमाम राज्यों में बतौर स्टार प्रचारक इस्तेमाल करना संघ की इसी रणनीति का हिस्सा था।

रातोंरात ‘योगी लाओ, देश बचाओ’ और ‘मोदी हटाओ योगी लाओ’ ‘योगी फॉर PM’ ‘जुमलेबाज़ी का नाम मोदी, हिंदुत्व का ब्रांड योगी’ की बड़ी बड़ी होर्डिंग का उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में लग जाना संघ की उसी रणनीति का हिस्सा लगती है।

ये होर्डिंग बिना संघ या योगी के इशारे के तो नहीं लगाई जा सकते। तो क्या तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों के हार के साथ ही देश की राजनीति से ये मोदी-युग की समाप्ति है। राफेल डील का मामले के कांग्रेस चुनावी मुद्दा बनायेगी ही। राफेल डील की कोई काट फिलहाल तो मोदी के पास नहीं है।

किसान, छात्र, व्यापारी, दलित, अल्पसंख्यक और व्यापारी आदि समुदाय के लोगों में मोदी के खिलाफ़ बड़ा असंतोष और गुस्सा हैं, जबकि इस बीच योगी अपने जहरीले बयानबाजी के चलते हिंदुत्व का नया ब्रांड बनकर उभरे हैं।

यह महज संयोग नहीं कि चार राज्यों की चुनावी रैली में योगी आदित्यनाथ की रैलियाँ प्रधानमंत्री मोदी से ज्यादा रखी गईं। चार राज्यों में योगी आदित्यनाथ ने 74 चुनावी रैलियां की थी। ये दर्शाता है कि भाजपा संघ का भरोसा मोदी की अपेक्षा योगी पर बढ़ा है।

मध्यप्रदेश के चुनावी मंच से योगी द्वारा उछाला गया जुमला ‘कमलनाथ जी आपको ये अली मुबारक़, हमारे लिए बजरंग बली ही पर्याप्त हैं’, अयोध्या की रैली में RSS और VHP के सदस्यों द्वारा बार बार इस्तेमाल किया जाना ये दर्शाता है कि संघ ने योगी के रूप में हिंदुत्व का नया मुखौटा गढ़ लिया है।

गोकशी पर सख्ती, शहरों जिलों के नाम बदलकर उनका हिंदू नामकरण करना और कुंभ मेले का सरकारी आयोजन करके धर्म में व्यापार का समावेश करने जैसे कदमों के चलते योगी संघ के लिए हिंदुत्व का नया पोस्टर ब्वॉय बन चुके हैं। इसके अलावा फरवरी 2018 में दो दिवसीय ‘उत्तर प्रदेश इन्वेस्टर समिट’ का आयोजन करके हिंदुत्व और कार्पोरेट को एक साथ साधने की कोशिश की थी।

इस समिट में मुकेश अंबानी, रतन टाटा, गौतम अडानी समेत देश के 5000 बड़े उद्योगपति समेत दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधियों शामिल होना इस बात की गारंटी है कि कार्पोरेट भी अगले चुनाव में मोदी के बजाय योगी पर पूँजी इन्वेस्ट करना चाहता है।

गौरतलब है कि यूपी इन्वेस्टर समिट में गुजरात के वो सभी उद्योगपति जिनका मोदी के राजनीतिक उत्थान में बड़ा हाथ रहा है, योगी के साथ खड़े नज़र आये थे। गौतम अडानी ने समिट में कहा था कि हमारा ग्रुप यूपी में वर्ल्ड क्लास फूड पार्क, लोजिस्टिक पार्क खोलेगा। उन्होंने कहा कि यूपी में हमारा लक्ष्य सोलर पावर स्टेशन खोलने का प्लान है, साथ ही मेट्रो बनाने और यूनिवर्सिटी बनाने में भी निवेश करेंगे और अगले 5 साल में हम यूपी में करीब 35 हजार करोड़ रुपए का निवेश करेंगे।

इसके अलावा मुकेश अंबानी ने भी चार बड़े ऐलान किए थे। जिसमें अगले तीन साल में 10 हजार करोड़ रुपए का निवेश और गंगा को साफ करने के लिए सरकार के साथ रिलायंस कंपनी मिलकर काम करेगी।

तो क्या संघ और कार्पोरेट के खुले सपोर्ट के बाद 2019 चुनाव में योगी मोदी को रिप्लेस करके भाजपा का प्रतिनिधित्व करेंगे या फिर राम मंदिर पर अध्यादेश लाकर मोदी-शाह की जोड़ी संघ पर काउंटर फायर करके 2019 के लिए अपना दावा मजबूत कर सकती है। बहरहाल, इतना तो तय है कि मोदी-शाह की जोड़ी को 2019 में कांग्रेस से पहले संघ और योगी से लड़ना होगा।


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