Last Update On : 01 12 2018 01:17:00 PM

मोदी सरकार के लिए इससे ज्यादा संवेदनहीन और शर्मनाक क्या हो सकता है कि उसके आईटी सेल ने किसानों के आंदोलन में किसानों को किराए की भीड़ बताकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश की। देशभर से इकट्ठा हुए जनसैलाब को भाड़े के किसान बताना देश के अन्नदाताओं का अपमान है….

अभिषेक आज़ाद

कल किसानों ने लाखों की संख्या में व्यापक पैमाने पर दिल्ली के रामलीला मैदान से संसद तक मार्च किया। इस किसान मुक्ति मार्च में भाग लेने के लिए लाखों की संख्या में देशभर से किसान शामिल हुए। इस आंदोलन में 200 से अधिक किसान संगठनों ने भाग लिया। उनकी 2 मांगें ‘पूर्ण कर्ज़ मुक्ति’ और ‘फसलों की लागत का डेढ़ गुना दाम’ है।

किसानों ने सदन का विशेष सत्र बुलाकर इन दो बिलों को पास करने की मांग की। उनकी मांगों के समर्थन में 21 राजनीतिक दल एक साथ मंच पर आए। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की तरफ से महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी और सांसद डी. राजा ने मंच साझा किया।

स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार सरकार को 21 लाख करोड़ रुपए का भुगतान किसानों को करना चाहिए। किसानों का कुल कर्ज़ 14 लाख करोड़ रुपए है। अगर सम्पूर्ण कर्ज़ एकमुश्त माफ कर दिया जाए तब भी किसानों को सरकार से 7 लाख करोड़ रुपए मिलना चाहिए। गौरतलब है कि स्वामीनाथन समिति का गठन 2004 में किसानों की आत्महत्या रोकने की नीतियों पर सुझाव देने के लिए किया गया था। स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट के अनुसार किसानों को उनकी लागत का डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए।

सरकार ने अभी तक सभी फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित नहीं किया है। बहुत सी फसलों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की सूची के बाहर रखा गया है। न्यूनतम समर्थन मूल्य के पुनरावलोकन के लिए समिति का गठन देर से किया जाता है, जिसकी वजह से किसानो को अपने उत्पाद खुले बाज़ार में कम दामों पर बेचने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

सभी शहरों में किसान मंडी नहीं बनाई गई। आदर्श कृषि क्रय केंद्रों को देर से खोला जाता है, तब तक किसान अपनी फसल खुले बाज़ार में कम दामों पर बेच चुके होते हैं। क्रय केंद्रों द्वारा किसानों के सम्पूर्ण कृषि उत्पाद का एक छोटा सा हिस्सा ही खरीदा जाता है। सरकारें इस तरह से कई प्रकार के हथकंडे अपनाकर अपनी जिम्मेदारी निभाने से कतराती हैं।

लागत की परिभाषा अपर्याप्त और अपूर्ण है। इसमें कई बुनियादी खामियां हैं। लागत में केवल खाद और बीज ही नहीं किसान का श्रम भी शामिल होता है। मौजूदा व्यवस्था में न्यूनतम मूल्य निर्धारित करते समय श्रम को लागत के रूप में नहीं जोड़ा जाता, जिससे फसलों का समर्थन मूल्य बहुत कम होता है।

अगर आप किसान के श्रम का कोई भी मूल्य नहीं आंकते तो इसका यही मतलब हुआ कि किसान खेतों में बेगार करते हैं। ज्ञात हो कि संविधान के अनुच्छेद 23 के तहत बेगार को अपराध घोषित किया गया है। यदि कोई व्यक्ति न्यूनतम मजदूरी से कम पर काम करता है तो वह बंधुआ मजदूर होता है। बेगार और बंधुआ मजदूरी अमानवीय प्रथाएं है जिनके लिए सभ्य समाज में कोई स्थान नहीं।

स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट को सही तरह से लागू नहीं किया गया। किसान आत्महत्या रुकने का नाम नहीं ले रही है। गैर सरकारी आंकड़ों के अनुसार पिछले 4 सालों में किसान आत्महत्या की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है। जब सरकार आत्महत्या रोकने में विफल रही तो उसने अपनी नाकामी छिपाने के लिए किसान आत्महत्या के आंकड़े इकट्ठा करना बंद कर दिया।

इससे पहले की व्यवस्था के अनुसार किसान आत्महत्या की रिपोर्ट पुलिस के पास जाती थी और वहां से NCRB देशभर में हुई किसान आत्महत्याओं के आंकड़े इकट्ठा करता था। वर्तमान केंद्र की मोदी सरकार किसान आत्महत्या के आकड़े इकट्ठा करना आवश्यक नहीं समझती। इस सरकार को किसानों से कोई संवेदना नहीं है। इसे किसानों की मौत से कोई फर्क नहीं पड़ता।

सरकार मुआवजा देने के बजाए किसानों को फसल बीमा कराने का मशविरा दे रही है। इसने पूरे देश को कुछ कंपनियों के बीच बांट रखा है। एक क्षेत्र का किसान केवल उसी एक कंपनी से बीमा ले सकता है जिसे सरकार ने अधिकृत किया हो। बीमा कंपनियां मनमाने ठंग से किसानों पर शर्तें थोप रही हैं। उनके ATM से पैसे कट जाते हैं, किन्तु उन्हें पालिसी नहीं मिलती।

कुछ कंपनियों ने यह शर्त थोप रखी है कि वह बीमा राशि का भुगतान केवल उसी स्थिति में करेंगी जब सम्पूर्ण क्षेत्र की 70 फीसदी से अधिक फसल का नुकसान होगा। ऐसी स्थिति में अगर किसी एक किसान का नुकसान हुआ तो उसे बीमा पालिसी के बावजूद भी कोई राशि नहीं मिलेगी। इस तरह की बीमा योजनाएं देश के किसानों के साथ धोखा है।

किसानों का सम्पूर्ण ऋण एकमुश्त माफ़ किया जाए। अगर सरकार किसानों का कर्ज़ माफ नहीं कर सकती तो वह उसे ‘नोन परफॉर्मिग एसेट’ में बदल दे। गौरतलब है कि सरकार ने देश के 15 बड़े पूंजीपतियों के साढ़े तीन लाख करोड़ रुपए के बकाये को नॉन परफार्मिंग एसेट में बदला है।

जब सदन में वित्त मंत्री जी से पूंजीपतियों की क़र्ज़ माफ़ी के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा किमने क़र्ज़ माफ़ नहीं किया है, उसे नॉन परफार्मिंग एसेट में बदला है। मेरा उनसे अनुरोध है की इसी तरह किसानों के ऋण को भी नॉन परफार्मिंग एसेट में बदल दें।

किसान आत्महत्या के आंकड़ों को फिर से इकट्ठा करना शुरू किया जाए, जिससे किसान आत्महत्या से जुड़े तथ्य स्पष्ट रूप से खुलकर सामने आ सके। स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को पूर्णरूपेण लागू किया जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य में श्रम की कीमत को भी जोड़ा जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम दाम पर कृषि उत्पाद बेचने पर किसान को जो नुकसान होता है उसे भी लागत में जोड़ा जाए। सभी शहरों में मंडियां बनाई जाए। न्यूनतम समर्थन मूल्य का सही समय पर पुनरावलोकन हो और सही समय पर क्रय केंद्र खोले जाए। किसानों के सम्पूर्ण उत्पाद को खरीदा जाए। बीमा योजना को खत्म किया जाए और उसके स्थान पर मुआवजे की व्यवस्था हो।

अगर GST में संशोधन के लिए आधी रात को संसद का विशेष सत्र बुलाया जा सकता है तो संसद का विशेष अधिवेशन किसानों की समस्या पर बुलाया जाए और उसमें किसानों की फसलों के उचित दाम की गारंटी का कानून और किसानों को क़र्ज़ मुक्त करने का कानून पारित किया जाए।

सरकार ने किसानों की समस्याओं को गंभीरतापूर्वक लेने और उनकी मांगों को पूरा करने की बजाए इस आंदोलन को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ करने की कोशिश की, किंतु लोगों की भारी तादाद की वजह से जब आंदोलन को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन हो गया, तो उसने अपनी आईटी सेल को सक्रिय कर दिया। इसके द्वारा आंदोलन में बनावटी कमियां निकालकर आंदोलन को दुष्प्रचारित किया जा रहा है।

यह आईटी सेल इस आंदोलन में किसानों को किराए की भीड़ बताकर डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश कर रहा है। देशभर से इकट्ठा हुए जनसैलाब को भाड़े के किसान बताना देश के अन्नदाताओं का अपमान है। इस पूरे आंदोलन को लेकर सरकार का रवैया बेहद संवेदनहीन और शर्मनाक रहा है।

सरकार ने किसानों को पूरी तरह से नज़रन्दाज़ किया है। उनकी समस्याओं पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। किसान मुक्ति संघर्ष में उमड़े जनसैलाब और जनाक्रोश ने यह साबित कर दिया है कि सरकार को अपनी किसान विरोधी नीतियों का खामियाजा आगामी लोकसभा चुनाव में भुगतना पड़ेगा।

(अभिषेक आज़ाद दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य हैं।)