Last Update On : 03 04 2018 08:21:00 PM

पूंजीपतियों के कर्जमाफी को बट्टा खाता यानी राइट आॅफ के जाल में फंसाने वालों से रहें सावधान, उन्हें भेजें जनज्वार की सीधी चुनौती, पूछें उनसे कि किसी एक पूंजीपति का वे बताएं नाम जिसने बट्टा खाते में पड़े कर्ज का एक पैसा भी किया हो सरकार को अदा

देश को लूटने वालों का नाम बताने की हिम्मत नहीं कर पाई संसद में सरकार, मंत्री ने दिया आरबीआई नियमों का हवाला कि नहीं बता सकते नाम, लेकिन 1—2 लाख के कर्जदार—गरीब हजारों किसानों को हर साल करती आत्महत्या के लिए मजबूर

जनज्वार। सिर्फ 3 साल में पूंजीपतियों का 2.5 लाख करोड़ रुपए माफ करने वाली मोदी सरकार के संसद में दिए जवाब से साफ है कि मोदी और उनकी कैबिनेट उन्हीं लुटेरों पर मेहरबान है जिसके खिलाफ खड़े होने का नारा देकर भाजपा राजनीतिक जीत के ऐतिहासिक दरवाजे की दहलीज पर 2014 में पहुंची थी।

आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने सदन में इस संबंध में दो सवाल पूछे थे। एक यह कि 2014 से 2017 के बीच सरकार ने बैंकों से पूंजीपतियों द्वारा लिए कर्ज में से कितना एनपीए किया है। और दूसरा यह कि इन वित्तिय वर्षों में जिनका एनपीए हुआ है, कृपया सरकार उनका नाम बताए। पर सरकार ने एनपीए की जानकारी देने के बाद कर्ज लेने वालों का नाम बताने से दो टूक मना कर दिया। कहा कि कर्ज लेकर बैंकों का पैसा न लौटाने वालों के नाम सरकार सार्वजनिक नहीं कर सकती, क्योंकि वह आरबीआई नियमों से बंधी हुई है।

वित्त मंत्रालय की ओर से संसद में जवाब दे रहे वित्त राज्य मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने कहा वर्ष 2014—15 से लेकर सितंबर 2017 के बीच सरकार द्वारा संचालित बैंकों ने पूंजीपतियों के 2 लाख 41 हजार 911 करोड़ रुपए राइट आॅफ किए हैं। सरकार ने अपने जवाब में आगे जोड़ते हुए बताया है कि यह रिजर्व बैंक की नियमित प्रकिया है, उसी आधार पर यह किया गया है।

वित्त राज्य मंत्री शिवप्रताप शुक्ला ने आगे कहा कि आरबीआई नियमों के अनुसार धारा 45 ई के अंतर्गत ‘रिजर्व बैंक एक्ट 1934’ में कर्जदारों का नाम नहीं बताने का प्रावधान है, इसलिए सरकार किसी कर्जदार का नाम सार्वजनिक नहीं कर सकती। साथ ही सरकार ने यह कहा पूंजीपतियों के कर्ज को बट्टा खाता में डाला गया है।

गौरतलब है कि पूंजीपतियों के कर्जमाफी का मामला सामने आते ही बट्टा खाता शब्द उछाल लेता है। अर्थशास्त्रियों और आर्थिक जानकारों द्वारा बताया जाता है कि यह किसान कर्जमाफी से से अलग है, इसे सरकार ने बट्टा खाते में डाला है, कर्ज माफ नहीं किया है। इस तर्क के जरिए यह साबित करने की धुंध फैलाई जाती है कि पूंजीपतियों द्वारा लिया कर्ज वापस होगा।

पर यह पूरी तौर पर झूठ है। क्योंकि आजतक के इतिहास में किसी एक पूंजीपति ने बट्टे खाते का एक पैसा वापस नहीं किया है और सरकार का पैसा पूरे तौर पर डूब गया है। किसान कर्जमाफी और पूंजीपतियों के एनपीए यानी बट्टाखाता में शब्द के अलावा कोई फर्क नहीं है।

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार और विश्लेषक राजेश रपरिया कहते हैं, जिसको यह लगता है शब्दाडंबर खड़ा कर पूंजीपतियों की कर्जमाफी से अलग है कुछ बट्टाखाता, उनको सरकार से पूछना चाहिए कि किसी एक पूंजीपति वे नाम बताएं जिसने बट्टे खाते का एक पैसा वापस किया हो।

ऐसे में जनज्वार उन सभी अर्थशास्त्री और आर्थिक जानकारों को खुला चैलेंज देता है, जो कहते हैं कि बट्टा खाता यानी राइट आॅफ और कर्जमाफी यानी वेव आॅफ के बीच फर्क है। वे आएं और देश के सामने बताएं कि शब्दजाल का नाटक फैलाने से किस मायने में है यह अलग, क्योंकि जनज्वार के आर्थिक विश्लेषक डंके की चोट पर साबित करेंगे कि बट्टा खाता पूंजीपतियों की कर्जमाफी का सबसे मुफीद शब्द है जिसके खेल में कॉरपोरेट मीडिया और सरकार दोनों लगी हैं।

भारत में 80 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है और इस ग्रामीण विकास के लिए सरकार का सालाना बजट 1,38,097 करोड़ रुपए है, जोकि पूंजीपतियों द्वारा लगाए गए बट्टे से लगभग आधी राशि है। इसी तरह पूरे देशभर के परिवहन के लिए पूरे मंत्रालय को कुल 1,34,872 करोड़ रुपए दिए गए हैं, यह भी पूंजीपतियों को बैंकों को दिए गए कर्ज का लगभग आधा है।

किसानों की हितैषी होने का दावा करने वाली मोदी सरकार का किसानों के लिए कुल बजट भी सिर्फ 63,836 करोड़ रुपए है। यानी पूंजीपतियों ने देश को जितना बट्टा लगाया है, उससे किसानों को चार साल से भी ज्यादा का बजट दिया जा सकता था। देश के स्वास्थ्य का बजट भी मात्र 54,667 करोड़ रुपए है।

देश के जितने पैसों को पूंजीपतियों ने चूना लगाया है उससे शिक्षा क्षेत्र को तकरीबन तीन साल से भी ज्यादा का बजट दिया जा सकता है। शिक्षा के लिए भी सरकार का कुल 85,010 करोड़ रुपए का बजट दिया है।

पूंजीपतियों ने देश को जितना बट्टा लगाया है, वह एक साल के कुल केंद्रीय बजट से कुछ ही कम पड़ता है। गृह मंत्रालय का भी सालाना केंद्रीय बजट मात्र 93,450 करोड़ है। मोदी सरकार ने किसी भी मंत्रालय को इतना बजट नहीं दिया है जितना ‘सम्मानित’ पूंजीपतियों के नाम पर बट्टा खाते में डाला गया है। रेलवे की सेफ्टी का बजट भी 1 लाख करोड़ का है।