मोदी का संकट ये है कि अगर दलित वोट बैंक में से गैरजाटव मायावती के पास नहीं जाता है तो फिर कांग्रेस और बीजेपी में बंटेगा। इसी तरह ओबीसी का संकट ये है कि नोटबंदी और जीएसटी ने बीजेपी से इस तबके का मोहभंग कर दिया है…

पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

जैसे जैसे लोकसभा चुनाव की तारीख नजदीक आती जा रही है, वैसे वैसे बिसात पर चली जा रही हर चाल से तस्वीर साफ हो होती जा रही है। मोदी सत्ता की हर पालिसी अब बिखरे या कहें रूठे वोटरों को साथ लेने के लिये है। विपक्ष अब उस गणित के आसरे वोटरों को सीधा संकेत दे रहा है, जहां 2014 की गलती और 2018 तक मोदी की असफलता को महागठबंधन के धागे में पिरो दिया जाये।

गरीब अगड़ों के लिये दस फीसदी आरक्षण के बाद देशभर में नीतियों के जरिये वोटरों को लुभाने के लिये तीन कदम उठाने की तैयारी बजट सत्र के वक्त मोदी सत्ता ने कर ली है। चूंकि बजट अंतरिम पेश होगा तो बड़ा खेल नीतियों को लेकर होगा। पहला निर्णय, तेलंगाना के केसीआर की तर्ज पर चार चार हजार रुपये किसान मजदूरों को बांटने की दिशा में जायेंगे, क्योंकि मोदी सरकार को लग चुका है कि जब रुपयों को पालिसी के तहत केसीआर बांटकर चुनाव जीत सकते हैं तो फिर वह सफल क्यों नहीं हो सकते।

इसी को ध्यान में रखकर रिजर्व बैंक से तीन लाख करोड़ रुपये निकाले जा रहे हैं। दूसरा निर्णय, कांग्रेस जब राज्य में बेरोजगारी भत्ता बांटने की बात कर बेरोजगार युवाओं को लुभा सकती है तो फिर देश में रोजगार न होने के सिर पर फूटते ठीकरे के बीच समूचे देश में ही रोजगार भत्ते का ऐलान कर दिया जाये। तीसरा, पेंशन योजना के पुराने चेहरे को ही फिर से जिन्दा कर दिया जाये, जिससे साठ बरस पार व्यक्ति को पेंशन का लाभ मिल सके।

जाहिर है तीनों कदम उस राहत को उभारते हैं जो गवर्नेंस या कामकाज से नीतियों के आसरे देश को मिल न सका। यानी इकनामी डगमगायी या फिर ऐलानों की फेहरिस्त ही देश में इतनी लंबी हो गई कि चुनावी महीनों के बीच से गुजरती सत्ता के पास सिवाय सुविधा की पोटली खोलने के अलावा कोई दूसरा आधार ही नहीं बचा। इस कड़ी में एक फैसला इनकम टैक्स में रियायत का भी हो सकता है, क्योंकि सुब्रमण्यम स्वामी की थ्योरी तो इनकम टैक्स को ही खत्म करने की रही है। लेकिन मोदी सत्ता अभी इतनी बड़ी लकीर तो नहीं खींचेगी, लेकिन पांच लाख तक की आय़ पर टैक्स खत्म करने का ऐलान करने से परहेज भी नहीं करेगी।

इन ऐलानों के साथ जो सबसे बड़ा सवाल मोदी सत्ता को परेशान कर रहा है वो है कि ऐलानों का असर सत्ता बरकरार रखेगा या फिर जाती हुई सत्ता में सत्ता के लिए ऐलान की महत्ता सिर्फ ऐलान भर है, क्योंकि साठ दिनों में इन ऐलानों को लागू कैसे किया सकता है, ये असंभव है? दूसरी तरफ विपक्ष की बिसात है, जिसमें सबसे बड़ा दांव सपा-बसपा गठबंधन का चला जा चुका है। इस दांव ने तीन संकेत साफ तौर पर मोदी सत्ता को दे दिये हैं।

पहला, बीजेपी यूपी में चुनावी जीत का दांव पन्ना प्रमख या बूथ मैनेजमेंट से खेलगी या फिर टिकटों के वितरण से। दूसरा, टिकट वितरण सपा-बसपा गठबंधन के जातीय समीकरण को ध्यान में रखकर बांटेगी या फिर ओबीसी-अगड़ी जाति के अपने पारंपरिक वोटर को ध्यान में रख कर करेगी। तीसरा, जब 24 बरस पहले नारा लगा था, ‘मिले मुलायम काशीराम, हवा में उड गये जय श्री राम’, तो 24 बरस बाद अखिलेश-मायावती के मिलने के बाद राम मंदिर के अलावा कौन सा मुद्दा है, जो 2014 के मैन आफ द मैच रहे अमित शाह को महज दस सीट भी दिलवा दे।

इन्हीं तीन संकेतों के आसरे हालातों को परखें तो मोदी-शाह की जोड़ी के सामने कांग्रेस की रणनीति बीजेपी के राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगाने को तैयार है, क्योंकि सपा-बसपा के उम्मीदवारों की फेहरिस्त जातीय समीकरण पर टिकेगी और उनके समानातंर यूपी में अगर बीजेपी सिर्फ सवर्णों पर दांव खेलती है तो पहले से ही हार मान लेने वाली स्थिति होगी। दूसरी तरफ कांग्रेस ज्यादा से ज्यादा सवर्णों को टिकट देने की स्थिति में होगी।

यानी बीजेपी का संकट ये है कि अगर दलित वोट बैक में गैरजाटव मायावती के पास नहीं जाता है तो फिर कांग्रेस और बीजेपी में वह बंटेगा। इसी तरह ओबीसी का संकट ये है कि मोदी सत्ता के दौर में नोटबंदी और जीएसटी ने बीजेपी से मोहभंग कर दिया है, तो ओबीसी वोट भी बंटेगा।

ब्राह्मण, राजपूत या बनिया तबके में बीजेपी को लेकर ये मैसेज लगाातर बढ रहा है कि वह सिर्फ जीत के लिये पारंपरिक वोट बैंक के तौर पर इनका इस्तेमाल करती है और तीन तलाक के मुद्दे पर ही मुस्लिम वोट बैक में सेंध लगाने की जो सोच बीजेपी ने पैदा की है और उसे अपने अनुकूल हालात लग रही है। उसके समानांतर रोजगार या पेट की भूख का सवाल समूचे समाज के भीतर है।

उसकी काट बीजेपी योगी आदित्यनाथ के जरिये भी पैदा कर नहीं पायी। बुनकर हो या पसंमादा समाज, हालात समूचे तबके के बुरे हैं और बीजेपी ने खुले ऐलान के साथ मोदी-शाह की उस राजनीति पर खामोशी बरती जो मुस्लिम को अपना वोट बैंक मानने से ही इंकार कर रही थी। यानी चाहे अनचाहे मोदी-शाह की राजनीतिक समझ ने क्षत्रपों के सामने सारे बैर भूलाकर खुद को मोदी सत्ता के खिलाफ एकजुट करने की सोच पैदा की।

मुस्लिम-दलित-ओबीसी और सवर्णों में भी रणनीतिक तौर पर खुद को तैयार रहने भी संकेत दे दिये। 2019 की लोकसभा चुनाव की तरफ बढते कदम देश को उन न्यूनतम हालातों की तरफ खींचकर ले जा रहे हैं, जहां चुनाव में जीत के लिये ही नीतियां बन रही हैं।

चुनावी जीत के लिये आरक्षण और जातीय बंधनों में ही देश का विकास देखा जा रहा है। चुनावी जीत की जटिलताओं को ही जिन्दगी की जटिलताओं से जोड़ा जा रहा है। यानी जो सवाल 2014 में थे, वह कहीं ज्यादा बिगड़ी अवसथा में 2019 में सामने आ खड़े हुए हैं।


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