Last Update On : 01 10 2018 04:59:26 PM

अब ठहाके लगाते हुये हत्या करना और हत्या कर और जोर से ठहाके लगाने वाला शहर लखनऊ हो चला है। बस जेहन में ये बसा लीजिये कि लखनऊ की पहचान वाजिद अली शाह से नही योगी आदित्यनाथ से है….

वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी

न तो हम रुके हुये थे और न ही आपत्तिजनक अवस्था में थे। हमारी ओर से कोई उकसावा नहीं था मगर कांस्टेबल ने गोली चला दी।” ये लखनऊ की सना खान का बयान है, जो कार में ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठी थी और ड्राइवर की सीट पर उनका बॉस विवेक तिवारी बैठा हुआ था। दोनों ही एप्पल कंपनी में काम करने वाले प्रोफेशनल्स हैं। और शाम ढलने के बाद अपनी कंपनी के एक कार्यक्रम से रात होने पर निकले तो किसी फिल्मी अंदाज में पुलिस कांस्टेबल ने सामने से आकर सर्विस रिवाल्वर से गोली चली दी, जो कार के शीशे को भेदते हुये विवाक तिवारी के चेहरे के ठीक नीचे ठोडी में जा फंसी।

कैसे सामने मौत नाचती है और कैसे पुलिस हत्या कर देती है इसे अपने बॉस की हत्या के 30 घंटे बाद पुलिस की इजाजत मिलने पर सना खान ने कुछ यूं बताया, ‘हम कार्यक्रम से निकले और सर ने कहा कि वह मुझे घर छोड़ देंगे।’

‘मकदूमपुर पुलिस पोस्ट के पास बायीं और से दो पुलिसवाले कार के बराबर आकर चलने लगे। वे चिल्लाये रुको। मगर सर गाड़ी चलाते रहे क्योंकि रात का समय़ था। उन्हें मेरी सुरक्षा की चिंता थी, पर तभी इनमें से एक कास्टेबल बाईक से उतरा और लाठी से गाड़ी पर वार करना शुरु कर दिया। मगर सर ने कार नहीं रोकी, तो दूसरे ने गाड़री को ओवरटेक किया और 200 मीटर आगे जाने के बाद सड़क के बीच में बाईक रोक दी और हमें रुकने को कहा

‘हमारी कार कम गति से आगे बढ़ रही थी और फिर गाड़ी रोक दी। तभी कांस्टेबल ने अपनी बंदूक निकाली और सामने से सर पर गोली चला दी। सर ने गाड़ी पर नियंत्रण खो दिया और वह आगे चलकर खंभे से टकरा कर रुक गयी। मैंने ट्रक ड्राईवर को रोकने की कोशिश की। बाद में गाडी पर गश्त लगा रहे पुलिसकर्मियों ने हमें देखा और उनसे सर को अस्पताल ले जाने की गुजारिश की।’

और उसके बाद जो हुआ वह बताने के लिये सना भी सामने न आ सके, इसकी व्यवस्था भी शुरुआती घंटों में पुलिस ने ही की। जब सना को पुलिस ने इजाजत दे दी कि वह बता सकती है कि रात हुआ क्या तो झटके में योगी सिस्टम तार तार हो गया। उसके बाद लगा यही कि किस किस के घर में जाकर अब पूछा जाये कि कि उस रात क्या हुआ था जब किसी का बेटा, किसी का पति , किसी का बाप पुलिस इनकाउंटर में मारा जा रहा था और खाकी वर्दी ये कहने से नहीं हिचक रही थी, अपराधी थे मारे गये।

फेहरिस्त वाकई लंबी है जो एनकाउंटर में मारे गये। नामों के आसरे टटोलियेगा तो यूपी के 21 नामों पर गौर करना होगा। मसलन गुरमीत, नौशाद, सरवर, इकराम, नदीम, शमशाद, जान मोहम्मद, फुरकान, मंसूर, वसीम, विकास, सुमित, नूर मोहम्मद, शमीम, शब्बीर, बग्गा सिंह, मुकेश राजभर , अकबर, रेहान, विकास।

ये वो नाम हैं तो बीते डेढ बरस के दौर में एनकाउंटर में मारे गये। तो जो एनकाउंटर में मारे गये और एनकाउंटर में मारे गये लोगो के कमोवेश हर घर के भीतर आज भी ऐसा सन्नाटा है कि कोई बोल नहीं पाता। 12 मामले अदालत की चौखट पर हैं, पर गवाह गायब हैं। चश्मदीद नदारद हैं। कौन सामने आये। कौन कहे।

पर सना के तो अपनी बगल की सीट पर मौत देखी। कानून के रखवालों के उस अंदाज को देखा जो कानून में हाथ लेकर हत्या करने के लिये बेखौफ थे। खाकी वर्दी के उस मिजाज को समझो जो हत्या करने पर इसलिये आमादा थी, क्योंकि हत्या को एनकाउंटर कहकर छाती पर तमगा लगाना फितरत हो चुकी है। वैसे ये पहली बार हुआ हो ये भी नहीं है, लेकिन पही बार हत्या करने का लाइसेंस जिस तरह सत्ता ने पुलिस महकमे को यूपी में दे दिया है उसमें एनकाउंटर हत्या हो नहीं सकती और हत्या को एनकाउंटर बताना बेहद आसान हो चला है।

तो क्या बहस सिर्फ इसी कठघरे में आकर रुक जायेगी कि पुलिस से भी गलती हो जाती है, क्योंकि हत्या तो देहरादून में 3 जुलाई 2009 को भी हुई थी, जब लाडपुर के जंगलों में पुलिस ने रणवीर नाम के एक छात्र के साथ खूनी खेल खेला था। हत्या तो दिल्ली के कनाट प्लेस में भी हो चुकी है।

अदालत ने पुलिस को हत्यारा कहने में भी हिचक नहीं दिखायी। लेकिन तब तक अदालत में सुनवाई के दौरान किसी अधिकारी ने ये नहीं कहा था कि इनकाउंटर पुलिस का हुनर हो चुका है, लेकिन यूपी के योगी माडल में ही जब इनकाउंटर के बूते प्रमोशन का लालच सिपाही-हवलदार-दारोगा-कास्टेबल को दिया जा चुका है तो सिपाही के दिमाग में इनकाउंटर के अलावे और क्या जायेगा। नतीजतन खुले तौर पर हत्या करते वक्त भी किसी सिपाही के हाथ क्यों कांपेंगे, जबकि उसको पता है कि सत्ता में अपराधियों की भरमार है।

पूरी राजनीति अपराधियों से पटी पड़ी है। ऐसे में सिपाही को अपराधी कहकर कैसे सियासत होगी और कौन राजनीति करेगा। यानी खुद अपने उपर से आपराधिक मामलों को कैबिनेट के जरिये जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ खत्म करा लेते हैं, जबकि चुनावी हलफनामे में आईपीसी की सात धाराओ के साथ तीन मुदकमे दर्ज होने का जिक्र था। पर सीएम ही जब अदालती कार्रवाई के रास्ते न्याय को खारिज करते हुये अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करता हो तो फिर जिस कांस्टेबल ने गोली चलायी, हत्या की उस खाकी वर्दी को बचाने का काम कौन सी सत्ता नहीं करेगी।

क्योंकि सत्ता का एक सच तो ये भी है कि दस कैबिनेट मंत्री और 6 राज्य स्तर के मंत्रियों पर आईपीसी की धाराओं के तहत मामले दर्ज हैं और ऐसा भी नहीं है कि दूसरी तरफ विपक्ष के सत्ता में रहने के दौर उसके कैबिनेट और राज्य स्तर के मंत्रियों के खिलाफ आईपीसी की आपराधिक धारायें नहीं थीं। डेढ़ दर्जन मंत्री तब भी खूनी दाग लिये सत्ता में थे। फिर हत्या करने वाले पुलिस का मामला अदालत में जाये या फिर पूरे मामले को सीबीआई को सौप दिया जाये।

अपराधी होगा कौन। सजा मिलेगी किसे और कौन गारंटी लेगा कि अब इस तरह की हत्या नहीं होगी। दरअसल लखनऊ के मिजाज में अब मुस्कुराना शब्द ठहाके लेने में बदल चुका है और कल तो मुस्कुराते हुये आप अदब के शहर लखनऊ में होने का गुरूर पाल सकते थे। लेकिन अब ठहाके लगाते हुये हत्या करना और हत्या कर और जोर से ठहाके लगाने वाला शहर लखनऊ हो चला है। बस जेहन में ये बसा लीजिये कि लखनऊ की पहचान वाजिद अली शाह से नही योगी आदित्यनाथ से है।