Last Update On : 08 02 2018 05:51:00 PM

नरेश त्रेहान के मीडिया प्रेमी होने से नहीं आ रही खबर, गरीब का मामला होने से नहीं मिल रही सोशल मीडिया में भी तवज्जो, इलाज के दौरान हुई लापरवाही का हर्जाना वसूलना चाहता है प्रबंधन गरीब परिवार से…

रांची। नामी प्राइवेट अस्पतालों की घोर लापरवाहियों और मरीजों के परिजनों से भारी—भरकम बिल वसूलने वाले देश के नामी निजी अस्पतालों की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है। इस नामी अस्पताल ने बीपीएल कार्ड धारी मरीज के परिजनों को 10 लाख का बिल थमा दिया और जब वे बिल जमा नहीं कर पाए तो मरीज को ही बंधक बना लिया।

यह घटना है झारखंड की राजधानी रांची में स्थित प्रतिष्ठित मेदांता हॉस्पिटल की। मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक रांची के सबसे बड़े निजी अस्पतालों में से एक मेदांता ने एक गरीब मरीज को बंधक बना लिया है, क्योंकि उसके परिजन उसके द्वारा थमाए गए 10 लाख रुपए का बिल भर पाने में असमर्थ हैं। गौरतलब है कि अस्पताल को ये गरीब परिवार करीब 4 लाख रुपये दे चुका है। सवाल है कि गरीबी रेखा से भी नीचे जीवन यापन करने वाला परिवार आखिर 10 लाख रुपए की भारी भरकम राशि कहां से लाएगा।

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इस मामले में यह भी गौरतलब है कि हाईकोर्ट का सख्त निर्देश है कि अगर अस्पताल का बिल बकाया रह भी जाता है तो वह रोगियों को बंधक नहीं बना सकता है।

प्रभात खबर में छपी एक खबर के मुताबिक झारखंड के ओरमांझी स्थित मेदांता अस्पताल ने करीब एक महीना से लातेहार जिले के एक किसान को बंधक बनाकर रखा हुआ है। सोशल मीडिया में भी यह खबर आ रही है कि अपनी गरीबी का हवाला देकर किसान के परिजनों ने मेदांता अस्पताल के मेडिकल सुपरिटेंडेंट से मरीज को छुट्टी देने की अपील की, तो अस्पताल प्रबंधन ने उन्हें झूठे केस में फंसाने की धमकी दी. अब परिजनों ने झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास से गुहार लगायी है कि अस्पताल के चंगुल से उन्हें मुक्त कराया जाये। उनके मरीज को अस्पताल से छुट्टी दिला दी जाये।

घटनाक्रम के मुताबिक लातेहार जिले के ग्राम चोपे (पोस्ट मुरुप) के 75 वर्षीय मोहम्मद अयूब अली उर्फ अयूब मियां को तकरीबन दो महीने पहले रांची के इरबा स्थित मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था। परिजनों के मुताबिक तब डॉक्टर ने उनके इलाज के लिए कुल डेढ़ लाख रुपये का खर्च बताया था, जो पैसा परिजनों ने जमीन बेचकर व गिरवी रखकर किश्तों में जमा किया।

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खबर के मुताबिक अस्पताल प्रबंधन को जब यह बताया गया कि मरीज बीपीएल कार्डधारी है, तो प्रबंधन ने कहा सरकारी प्रावधान के पैसे सरकार से मिल जायेंगे, तो अयूब मियां के डेढ़ लाख रुपये वापस कर दिये जायेंगे। इसके बाद मेदांता अस्पताल ने ऑपरेशन के लिए मरीज के परिजनों को 2,29,525 रुपये का इस्टीमेट बनाकर दिया. मुख्यमंत्री असाध्य रोग योजना के तहत लातेहार के सिविल सर्जन के पत्रांक संख्या 1909, दिनांक 15 दिसम्बर 2017 के माध्यम से मेदांता अस्पताल को पूरी राशि मिल गयी थी।

सिविल सर्जन कार्यालय से भुगतान होने के बावजूद अस्पताल प्रबंधन ने पहले से जमा डेढ़ लाख रुपये वापस करने की बजाय मरीज के परिजनों को और 9,85,063 पैसे का बिल थमा दिया। बुजुर्ग मरीज के परिजनों का कहना है कि हम खुद पाई—पाई के मोहताज हैं, खेत भी बिक गए हैं इतनी बड़ी राशि हम कहां से लाएंगे।

मगर अस्पताल प्रशासन इन गरीबों की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं है। अब परिजन इससे इतना परेशान हो गए हैं कि वो कहते हैं अगर हॉस्पिटल ने अयूब को डिस्चार्ज नहीं किया तो वो उसे छोड़कर यानी बंधक वाली हालत में छोड़कर वापस अपने गांव चले जाएंगे। आखिर इतनी बड़ी धनराशि हम लोग कहां से लाएं।

अयूब के परिजनों ने मेदांता पर इलाज के दौरान लापरवाही बरतने का आरोप भी लगाया। कहा कि 12 दिसंबर, 2017 को अयूब के बीपी संट का ऑपरेशन हुआ था। 17 दिसंबर को उसे जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था, लेकिन 24 दिसंबर, 2017 से 18 जनवरी, 2018 तक उसे MICU और NICU में रखा गया।

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अस्पताल की शिकायत में इस परिवार ने मुख्यमंत्री को भी एक पत्र लिखा है, जिसमें कहा है कि नर्स की गलती के कारण अयूब का अत्यधिक रक्तस्राव हो गया, जिस कारण उसे छह यूनिट खून भी चढ़ाना पड़ा था। खून के लिए डोनर की व्यवस्था करने के बावजूद मेदांता के ब्लड बैंक में परिजनों से 15 हजार रुपये वसूले गये।

अयूब के बेटे मोहम्मद इमदाद कहते हैं, मेरे पिता अच्छी हालत में थे। हम लोग उन्हें रेगुलर चेकअप के लिए हॉस्पिटल लेकर आए थे। पहले भी हम उन्हें लाते रहे हैं, मगर उस दिन पिता बेहोश हो गए तो डॉक्टरों ने जांच करने के बाद बताया कि इनके सिर में पानी भर गया है, जिसका जल्दी से जल्दी आॅपरेशन करना पड़ेगा। आॅपरेशन नहीं किया तो उनकी दोनों आंखों की रोशनी छिन जाएगी।

इमदाद आगे कहते हैं जब मैंने आॅपरेशन की खर्च की बाबत डॉक्टर से जानना चाहता तो कहा गया कि तकरीबन सवा लाख रुपया लग जाएगा। इसी के बाद उन्होंने अपने पिता को मेदांता में एडमिट करवाया था। उनका आॅपरेशन भी हो गया, मगर बाद में एक नर्स ने आॅक्सीजन का पाइप गलत जगह पर लगा दिया, जिससे पूरा आॅक्सीजन अयूब के शरीर में फैल गया। आॅक्सीजन शरीर में फैलने से अयूब का शरीर फूल गया। इस बात की जानकारी जब डॉक्टरों को हुई तो उन्हें दोबारा आॅपरेशन थिएटर में ले जाया गया। उसी के बाद मेदांता ने अयूब के परिजनों को लगभग 10 लाख का बिल थमा दिया।

अयूब के बेटे इमदाद कहते हैं कि डॉक्टरों और नर्स की गलती का खामियाजा अस्पताल प्रबंधन हमसे वसूलना चाहता है। हमने पहले ही जमीन बेचकर पैसे जमा किये थे, अब और पैसे कहां से लायें? इसके लिए अयूब के परिजनों ने गुड़गांव स्थित मेदांता अस्पताल के मुख्यालय से भी संपर्क किया और पूरी बात बताई। गुड़गांव मेदांता से मरीज के परिजनों को आश्वस्त किया गया कि आप फिक्र मत करिए सब ठीक हो जाएगा। आप बस अपने पिता का इलाज करवाइये।

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मगर जब अयूब ठीक हो गए और उन्हें डिस्चार्ज करवाने का टाइम आया तो अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों को 10 लाख रुपए का भारी भरकम बिल थमा दिया। जबकि अयूब के परिजनों को आश्वासन यह दिया गया था कि अस्पताल की गलती से उनके पिता इस हालत में पहुंचे हैं, इसलिए उन्हें पैसे लौटा दिए जाएंगे।

अब अस्पताल प्रबंधन अयूब को बिल जमा न करने तक डिस्चार्ज करने को तैयार नहीं है। उन्हें अघोषि रूप से बंधक बना लिया है अस्पताल ने। मेदांता प्रबंधन का कहना है कि जब तक पूरा बिल नहीं चुका दिया जाता, तब तक अयूब को नहीं छोड़ा जाएगा।

इस बाबत अयूब के परिजनों ने 3 फरवरी को मुख्यमंत्री रघुवर दास को पत्र लिखकर मदद की अपील की है, लेकिन अब तक मुख्यमंत्री कार्यालय की तरफ से भी कोई जवाब नहीं मिला है।