Last Update On : 08 12 2017 10:38:00 PM

दूसरे पत्रकारों को ‘गोदी पत्रकार’ बताने वाले रवीश कुमार साहब को हर किस्म के परिवारवाद की आलोचना करनी चाहिए या परिवारवाद के सवाल को ही खारिज कर चैनल की मातृ-पार्टी के हक में भुगतान की सेवा निभानी चाहिए…

दीप जगदीप सिंह

इन दिनों एनडीटीवी का राहुल गांधी प्रेम संभाले नहीं संभल रहा है। चाहे मुद्दा गुजरात चुनाव का हो या राहुल गांधी की अध्यक्षीय ताजपोशी का, राहुल गांधी को ‘डार्लिंग’ और ‘राजकुमार’ साबित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही।

4 दिसंबर को राहुल गांधी की ताजपोशी के दिन ‘प्राईम टाईम’ की शुरूआती इंट्रो में रवीश कुमार ने भारत में परिवारवाद के बारे में सवाल करना ही अनावश्यक साबित करने पर पूरा ज़ोर लगा दिया। रवीश ने साबित करने की कोशिश की क्योंकि भारत में हर दल में परिवारवाद है और जिन दलों में परिवारवाद नहीं भी है, उनके अंदरूनी ढांचे में भी लोकतंत्र नहीं है, इस लिए परिवारवाद हो या ना हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

यहीं बस नहीं, रवीश ने यहां तक कह डाला कि लोग परिवारवादी नेताओं को वोट ही क्यों देते हैं यानि परिवारवाद को बढ़ावा देने का कुसूर जनता का है। वह यहीं नहीं रुके, उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से सोनिया और राहुल गांधी की मजबूरी में परिवारवाद में फंसे हुए ‘विकटिम’ साबित करने का भी भरपूर किया और सोनिया गांधी के मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाए जाने को उभारा।

दूसरी तरफ दक्षिण भारत, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब आदि की सभी क्षेत्रीय पार्टियों के साथ-साथ भाजपा के पीढ़ी दर पीढी चल रहे परिवारवाद में साढू, बहनों, भाभियों, बाप-बेटों, नाति-नातिनों का ज़ोरदार ज़िक्र कर उनके परिवारवाद को बड़ा स्थापित करने का अथक प्रयास किया।

कल मणिशंकर अय्यर द्वारा प्रधानमंत्री को ‘नीच’ कहने और फिर रिपब्लिक टीवी के पत्रकार से दुर्व्यवहार का मामला छाया रहा, लेकिन एनडीटीवी पूरा दिन इस बारे में मूक रहा, लेकिन जैसे ही राहुल गांधी ने अय्यर को पार्टी की सदस्यता से हटाया, इसे राहुल गांधी का मास्टर स्ट्रोक स्थापित करने पर जुट गया।

इसे कहते हैं ‘क्रिटिसिज़म न्यूट्रलाईज़ेशन थ्यूरी’ यानि आलोचना संतुलितकरण सिद्धांत’। जिस आलोचना को नकारा या खारिज न किया जा सकता हो उसे इतना भोथरा बना दिया या संतुलित कर दिया जाए कि वह आलोचना लगे ही न।

संतुलित दिखने वाले कुछ मीडिया संस्थान लम्बे अर्से से इस नीति पर चल रहे हैं, जिसका नामकरण अभी तक किसी मीडिया के शोध विद्वान ने नहीं किया है। अगर इस बारे में कोई और नाम प्रचलित हो तो मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है।

ख़ैर सिद्धांत तो सत्यापित होते रहेंगे, फिलहाल सवाल यह है कि क्या ख़ुद के ‘सबसे भरोसेमंद ख़बर चैनल’ होने का दावा करने वाला एनडीटीवी और दूसरे पत्रकारों को ‘गोदी पत्रकार’ बताने वाले रवीश कुमार साहब को हर किस्म के परिवारवाद की आलोचना करनी चाहिए या परिवारवाद के सवाल को ही खारिज कर चैनल की मातृ-पार्टी के हक में भुगतान की सेवा निभानी चाहिए?

इस नुक्ते को गहराई से समझने के लिए यह चैनल की पूर्व वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त के इस व्यक्तव्य का संज्ञान भी लेना होगा, जिसमें उन्होंने कहा है कि पत्रकारों को राजनेताओं से अपने रिश्तों को सार्वजनिक करना चाहिए, ताकि पाठक/दर्शक उनकी पत्रकारिता के बारे में राय बनाते समय इस बात को ध्यान में रखते हुए फ़ैसला ले सकें।

वेब पत्रिका ओपी इंडिया ने बरखा दत्त के उक्त हवाले के साथ एक लेख में लिखा है कि एनडीटीवी के मालिक प्रणय राॅय की पत्नी और चैनल की प्रमोटर राधिका राॅय सीपीएम नेत्री वृंदा करात की बहन हैं। रवीश कुमार के भाई बृजेश कुमार पांडे फरवरी 2017 तक बिहार कांग्रेस के उपाध्यक्ष रह चुके हैं और अब भी नेता हैं। एनडीटीवी की मौजूदा संपादकीय निदेशक सोनिया सिंह कांग्रेसी नेता आरपीएन सिंह की पत्नी हैं, सिंह यूपीए सरकार के समय गृह मंत्रालय के राज्य मंत्री रह चुके हैं।

अय्यर का पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह से दलगत भागों में बंट चुका है। विरोधी दल इस बात का प्रचार तो कर रहे हैं कि ज़्यादातर चैनल/समाचार पत्र भाजपा के पक्ष में जा चुके हैं, लेकिन वह यह नहीं बता रहे हैं कि उनके पक्ष वाले चैनल/समाचार पत्र कौन से हैं। यह बात तब उजागर होती है जब उनके पक्ष वाले चैनल/समाचार पत्र सवालों के घेरे में आते हैं।

अगर अय्यर का रिपब्लिक टीवी के पत्रकार से दुर्व्यवहार भाजपा पक्षीय होने की वजह से है तो उस मौके पर अय्यर का पक्ष लेने वाली पत्रकार इस बात को प्रमाणित कर रही है कि वह कांग्रेसी नेता की अनुकंपा का ऋण उतार रही है। तभी अय्यर ने साफ़ कह दिया कि उनसे सवाल पूछना का अधिकार केवल उस महिला पत्रकार को है, बाकी सिर्फ़ सुनें और रिकार्ड करें।

इस मौके पर चुप रहने वाले बाकी पत्रकारों ने भी साबित कर दिया है कि पत्रकारों की एकता अब ‘अंधे कुंए’ में जा गिरी है, जिसे निकाल लाना अब भूसे में सुई ढूंढ़ने जैसा है।

इस बात की भविष्यवाणी करते हुए किसी भी किस्म का भ्रम नहीं होगा कि आने वाले दिनों में कोई भाजपा नेता एनडीटीवी या किसी कांग्रेस/वाम पक्षीय पत्रकार से ऐसे ही दुर्व्यवहार कर दे और उसके समर्थक इस का समर्थन करते हुए नज़र आएं, जैसे कि अभी अय्यर के समर्थक कर रहे हैं।

लेकिन इसमें से जो आशावादी बात उभर कर सामने आ रही है वह यह है कि मुख्य धारा का मीडिया ध्वस्त होने के कगार पर पहुंचता दिखाई दे रहा है और इस के समांनांतर उभर रहा जनपक्षीय पारंपरिक एवं न्यू मीडिया (सोशल मीडिया) के और अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली होने की संभावनाएं बढ़ रही हैं।

इसे और मज़बूत करने के लिए समानांतर मीडिया के लिए काम कर रहे पत्रकारों और संस्थानों को सचेत होकर जनपक्षीय पत्रकारिता के सिद्धांतों पर चलते हुए अपनी स्थिति मज़बूत करनी होगी। सिद्धांतों पर चलने वाले असली जनपक्षीय पत्रकार वही होंगे जो किसी भी विचारधारा/दल/पक्ष के साथ नत्थी हुए बग़ैर हर विचारधार/दल की कमियों और जन-विरोधी नीतियों का पर्दाफ़ाश करते हुए लोगों को जागरूक करें और लोकतंत्रीय ढांचे में जनता के अस्तित्व का फैसला जनता के विवेक पर छोड़ दें।

किसी विचारधारा का वाहक और वाहन बन कर कोई भी पत्रकार/मीडिया संस्थान जन-पक्षीय पत्रकारिता की ज़िम्मेदारी नहीं निभा पाएगा। अगर उसे किसी का पक्षधर होना भी है तो उसक पक्ष सिर्फ़ और सिर्फ़ आम लोग होंगे, इसके अलावा और कोई विकल्प नहीं है उनके लिए। जो भी पत्रकार इस विकल्प से दाएं-बाएं जाता है, उसकी ईमानदारी पर संदेह किया जा सकता है।

(दीप जगदीप सिंह जोरदार टाइम्स के संपादक हैं।)