Last Update On : 09 03 2018 12:42:00 PM

तीन लाख जनसंख्या वाली हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र में यह पहली आत्महत्या का मामला नहीं था। यह सत्ता नहीं जी.एस.टी. के विरोध को खत्म करने की साजिश थी, जिसे नेता प्रतिपक्ष ने आर्थिक मदद कर एक झटके में समाप्त कर दिया… 

संजय रावत का विश्लेषण

बात थोड़ी अटपटी जरूर है, लेकिन यह सत्य है कि सत्ता और विपक्ष दोनों ही जनता की भावनाओं के साथ खेलते हुए अपने-अपने हित मिलजुल कर भी साधते हैं। किसी जनविरोधी नीति के चलते जब कोई लापरवाह सत्तापक्ष सकते में आता है तो अपाहिज सा विपक्ष हरकत में आ जाता है। लेकिन विपक्ष के दमदार अभिनय को उस समय आमजन समझ ही नहीं पाता। जिसके चलते विपक्ष, सत्ताधारिंयों को संकट से उबार ले जाती है।

इस दृष्टिकोण को निष्पक्षता से देखे तो, चीजें साफ नजर आएंगी और हम जान जाएंगे कि किसी मुद्दे पर उद्वेलित, आन्दोलित जनता के आक्रोश को खत्म करने के लिए दोनों पक्ष कैसे एक-दूसरे के तारणहार बन जाते हैं। अब इसे सीधे-सीधे समझना हो तो उत्तराखण्ड की हल्द्वानी विधानसभा का रुख करते हैं। यहां की विधायक, कांग्रेस की पूर्व काबिना मंत्री इंदिरा हृयदेश नेता प्रतिपक्ष हैं, और भाजपा की जनविरोधी नीतियों के चलते जनता त्रस्त है। 

जी.एस.टी. जैसी जनविरोधी नीति से परेशान लाखों व्यावसायियों ने इसका विरोध किया, जिसमें से हल्द्वानी के एक युवा व्यवसायी प्रकाश पाण्डे ने व्यवस्था से झुंझला कर देहरादून में मंत्री के जनता दरबार में आत्महत्या कर ली। इस आत्महत्या को भाजपा ने कायरता का नाम दिया तो, विपक्ष कांग्रेसियों ने इसे मुद्दा बनाना ही था।

खैर जी.एस.टी. से मौत पर पूरे प्रदेश की राजनीति में भूचाल आया गया। आनन-फानन में मृतक के परिवार को 12 लाख रुपये की आर्थिक मदद और मृतक की पत्नी को सरकारी नौकरी का ऐलान कर सत्तापक्ष ने बचने की जुगत लगाई।

लम्बे बवालों के बीच नेता प्रतिपक्ष हर मंच से यही बोलती नजर आयी कि सत्तापक्ष मृतक को आर्थिक मदद नहीं देगा, तो हम उसकी मदद अपने स्तर से करेंगे। और एक दिन नेता प्रतिपक्ष ने मृतक परिवार की आर्थिक मदद कर भी दी। अब इस षड्यंत्र पर गौर किया जाए कि अपने 40 वर्षों के राजनीतिक कैरियर में नेता प्रतिपक्ष ने कितनी बार इस तरह की मदद की होगी।

करीब तीन लाख जनसंख्या वाली हल्द्वानी विधानसभा क्षेत्र में यह पहली आत्महत्या या आत्मदाह का मामला नहीं था। दरअसल यह सत्ता का नहीं जी.एस.टी. के विरोध को खत्म करने की साजिश थी, जिसे नेता प्रतिपक्ष ने आर्थिक मदद कर एक झटके में समाप्त कर दिया।

दरअसल उत्तराखण्ड में जी.एस.टी. को लेकर जितना आक्रोश था उसे प्रकाश पाण्डे की आत्महत्या ने और अधिक उद्वेलित कर दिया था। ये विरोध इतना तीव्र था कि ढेरों व्यवसायी व्यवस्था का विरोध कर नीति परिवर्तन की ओर बढ़ सकते थे। क्योंकि जी.एस.टी. से हताश हर व्यवसायी अब आत्महत्या की बात करने लगा था। साफ नजर आ रहा था कि सरकार पर हर हाल में इस मुद्दे को दबाने का भारी दबाव था। चूंकी जी.एस.टी. लागू होने के बाद देश के किसी व्यवसायी की आत्महत्या का यह पहला मामला जो था।

आने वाले समय में यह सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा था। इस घटना ने कई चीजे साबित भी की, जिसमें मुख्य यह कि ‘एक आम आदमी की आवाज तब तक नहीं सुनी जाएगी जब तक वह जिंदा है’, वर्ना क्या वजह थी कि नेता प्रतिपक्ष बजाए जी.एस.टी. से त्रस्त व्यवसायी की मौत से उठी आंधी को हवा दे सत्ता पर दबाव बनाती, उसके उलट उसकी आर्थिक मदद कर मुद्दे की ही इतिश्री कर दी। 

प्रकाश पाण्डे ने ये आत्मघाती कदम व्यवस्था से त्रस्त होकर उठाया था। भविष्य में यह आत्महत्या जाने कितने मौकों पर नजीर बन सकती थी, अब कोई इसका आंकलन भी नहीं कर पाएगा। नेता प्रतिपक्ष ने व्यवस्था के पक्ष में जो राजधर्म निभाया, उसका ऐसा पटाक्षेप कोई पहुंचा राजनीतिज्ञ ही कर सकता था।

(जनता दरबार में जहर खाकर आत्महत्या करने वाले प्रकाश पांडे के परिजनों के साथ नेता विपक्ष इंदिरा हृदयेश)