Last Update On : 09 08 2018 11:48:58 PM

एक ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है, जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में बिल्कुल असमर्थ है, लोग भुखमरी और आत्महत्या को मजबूर हैं…

जनज्वार। प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि हमने सत्ता में आने के बाद युवाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार दिया है, लोग आत्मनिर्भर बन रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ उनको आईना दिखाता दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला है जिसमें उसने कहा है कि भीख मांगना अपराध नहीं है, भीख कोई भी सस्टेन करने के लिए मांगता है, यानी भिखारी अगर बढ़ते भी हैं तो इससे सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ना। दूसरी तरह से कोर्ट ने इससे यही साबित किया है कि सरकार की कोई भी नीति ऐसी नहीं है जो बेरोजगारों को रोजगार दिला सके ताकि वे भुखमरी के हालात तक न पहुंचे।

रोजगार और आम जन के लिए जितने काम करने के दावे मोदी सरकार करती है अगर उनमें से कुछ भी काम किए होते तो भिखारी काफी तादाद में कम हो गए होते, मगर यह आंकड़ा दिनोंदिन बढ़ रहा है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने एक फैसले में राष्ट्रीय राजधानी में भीख मांगने को अपराध की श्रेणी निकाल बाहर किया है। दो सदस्यीय जजों की पीठ ने इस मामले में एक फैसला सुनाते हुए यह भी कहा कि भीख मांगने के लिए किसी को सजा देना सरासर असंवैधानिक है, जिसे जल्द से जल्द रद्द कर दिया जाना चाहिए।

सवाल उठता है कि सत्ताधारियों की हालत और दिन—ब—दिन गहराती जा रही रोजगार की समस्या को देखते हुए क्या कोर्ट ने भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है कि कोई भी गुजारे के लिए सड़क पर बैठकर भीख मांग सके, क्योंकि रोजगार तो है नहीं।

दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश गीता मित्तल और न्यायमूर्ति सी हरिशंकर की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि भीख मांगने को अपराध बनाने वाले ‘बॉम्बे भीख रोकथाम कानून’ के प्रावधान संवैधानिक जांच के आगे खारिज हो जाते हैं।

अपने 23 पेज के फैसले में दो जजों की पीठ में कहा कि इस फैसले का अपरिहार्य परिणाम यह होगा कि भीख मांगने का अपराध कथित रूप से करने वालों के खिलाफ कानून के तहत मुकदमा खारिज हो जाएगा।

फैसला सुनाते हुए जजों ने कहा, लोग सड़कों पर इसलिए भीख नहीं मांगते कि ऐसा करना उनकी इच्छा है, बल्कि इसलिए मांगते हैं क्योंकि भीख मांगना जीने के लिए उनकी जरूरत है। भीख मांगना जीने के लिए उनका अंतिम उपाय है, उनके पास जीवित रहने का कोई अन्य साधन नहीं है।

उच्च न्यायालय द्वारा यह फैसला हर्ष मंदर और कर्णिका साहनी की जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया। इस जनहित याचिका में कोर्ट से राष्ट्रीय राजधानी में भिखारियों के लिए मूलभूत मानवीय और मौलिक अधिकार मुहैया कराए जाने का अनुरोध किया गया था। अदालत ने इस कानून की कुल 25 धाराओं को निरस्त कर दिया है।

गौरतलब है कि इससे पहले केंद्र सरकार ने कहा था कि वह भीख मांगने को अपराध की श्रेणी से बाहर नहीं कर सकती, क्योंकि कानून में पर्याप्त संतुलन है और इस कानून के तहत भीख मांगना अपराध की श्रेणी में है।

जबकि अदालत ने एक सुनवाई के दौरान साफ—साफ कहा भी था कि एक ऐसे देश में भीख मांगना अपराध कैसे हो सकता है, जहां सरकार भोजन या नौकरियां प्रदान करने में बिल्कुल असमर्थ है।

गौरतलब है कि बॉम्बे रोकथाम अधिनियम, 1959 के आधार पर देशभर के सभी राज्यों में भिक्षा विरोधी कानून लागू है। कई भिखारियों को राजधानी दिल्ली में इस कानून के आधार पर सलाखों के पीछे डाला गया है।