Last Update On : 13 09 2017 07:19:00 PM

गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने निर्णय लिया कि न्याय पंचायतें अव्यावहारिक हैं, इसलिए न्याय पंचायत से संविधान उ.प्र. पंचायतीराज अधिनियम की धारा-42 से 94 तक अधिनियम से निकाला जाये…

शशांक यादव
एमएलसी, उत्तर प्रदेश

झूठ और जुमलेबाजी के लिए बदनाम सरकारी परम्परा को निभाते हुए न्याय पंचायतों के गठन के मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के बयान और कृत्य कथनी और करनी में अंतर का एक बहुत बड़ा उदाहरण बन गये। न्याय पंचायतों को पंच परमेश्वर की पुरातन भारतीय अवधारणा बताने वाले मुख्यमंत्री ने बोलने से पहले ग्रामीण न्याय का गला घोंट दिया था और फिर कैबिनेट का प्रस्ताव कर मामले को समाप्त भी कर दिया।

यही नहीं, न्यायालय को दिये जवाब में जनता ने चुने प्रतिनिधियों को अक्षम भारतीय लोक संस्कृति साबित किया और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का नारा देने वाली भाजपा सरकार ने लोकतंत्र का गला घोंटने की पहली चाल पूरे गुरूर और बेशर्मी के साथ शुरू कर दी है।

पूरी दुनिया में माना जाता है कि भारत के उच्चतम न्यायालय के दर्जनों निर्णय, लाॅ कमीशन की रिपोर्ट और लोक अदालतों की अवधारणा, गांव के पंच निर्णय को मुकदमेबाजी कम करने की एकमात्र विधि मानते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने जनता के सामने पंच परमेश्वर की बात कहकर खुद ही गांवों को न्याय व्यवस्था समाप्त करने का कैबिनेट में निर्णय ले लिया है।

भारत में 3 करोड़ मुकदमे लम्बित हैं, जिसमें से 24 प्रतिशत यानि लगभग 60 लाख केवल उत्तर प्रदेश में हैं। पंच निर्णय पक्षकारों के मध्य सुलह को प्राथमिकता देता है। न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति सरकार के बस में नहीं, इसलिए लोक अदालत के माध्यम से सुलह को आंदोलन के रूप में चलाया गया और ग्राम स्तर पर न्याय पंचायतें सुलह के आधार पर निर्णय का पीढ़ियों पुराना तरीका अपनाती थी।

यह हकीकत है कि 1982 से उत्तर प्रदेश में न्याय पंचायतें प्रभावी नहीं हैं। 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने लोकतंत्र के चौखंभा राज की अवधारणा को मजबूत करने के लिए ग्राम क्षेत्र व जिला पंचायतों को संवैधानिक स्वरूप दिया।

न्याय पंचायतों के गठन के पुराने स्वरूप का आधुनिक स्वरूप पहले 1889 में मद्रास विलेज कोर्ट एक्ट और फिर 1920 में राज्यों के पंचायती राज एक्ट के माध्यम से मजबूत किया गया। न्याय पंचायतों का स्वरूप ग्राम पंचायतों के साथ हमेशा जुड़ा रहा। सदियों से गांवों के झगड़े पंचायतें तय करती रहीं। अफसरशाही को जनता के साथ में न्याय की व्यवस्था अपने अधिकारों का हनन लगा। लिहाजा न्याय पंचायतें जान-बूझकर निष्प्रभावी की गयीं।

73वें संविधान संशोधन के बाद 1994 से न्याय पंचायतों के गठन के सम्बन्ध में पंचायती राज एक्ट में प्राविधान यथावत रखे गये। 1994 के बाद से जब बीसों साल बीते और सभी सरकारें खामोश रहीं, तब मजबूर होकर कुछ लोग न्यायालय की शरण में गये।

पिछली अखिलेश यादव की सपा सरकार में ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधि उनसे मिले तो उन्होंने ठण्डे बस्ते में पड़ी इस फाइल को बाहर निकाल सितम्बर 2016 तक काफी कवायद हुई, लेकिन उसके बाद चुनावी प्रक्रिया में मामला फिर ठण्डा बस्ते में चला गया।

नई सरकार आयी, उच्च न्यायालय ने पूछा कि भाई न्याय पंचायत गठन में क्या कर रहे हो, हमारे मुख्यमंत्री जी के कारकून बोले, साहब इससे तो सिरदर्द बढ़ेगा, जनता के हाथ में न्याय व्यवस्था चली जायेगी, तब घटनाक्रम तेजी से चला। सरकारी झूठ, फरेब और जनता को धोखा देने की कागजी सबूतों की एक धरोहर तैयार हो गयी। अब जरा तारीखों पर गौर कीजिए।

कोर्ट में लम्बित याचिका संख्या-2368/2008 राम नारायन गुप्ता बनाम उ.प्र. सरकार में 29 मई, 2017 को योगी सरकार प्रति शपथपत्र दाखिल करके कहती है कि न्याय पंचायत के प्राविधान उ.प्र. पंचायतीराज एक्ट, 1947 में प्रभावी है, लेकिन वर्तमान परिस्थिति में न्याय पंचायत और सरपंच का गठन अव्यवहारिक है और यह पंचायती व्यवस्था में नयी जटिलतायें पैदा करेगा।

इतना ही नही, हमारी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की सरकार यह भी कहती है कि शपथ पत्र में जनता से चुने गये सरपंच व अन्य पंच स्थानीय होंगे वो न्याय देने में विश्वास उत्पन्न नहीं कर सकेंगे, क्योंकि निजी स्वार्थ आड़े आयेंगे। यानि कि जनता से चुने विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ईमानदार कानून नहीं बनाते हैं, अपना स्वार्थ पहले रखते हैं।

लोकतंत्र की पूरी अवधारणा को 29 मई, 2017 को मिट्टी में मिलाने के आठवें दिन यानी छह जून, 2017 को इन्दिरा गांधी प्रतिष्ठान में राष्ट्रीय न्यायिक अभिकरण के सम्मेलन में केन्द्रीय विधि मंत्री श्री रविशंकर और माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के सामने योगीराज पूरे विश्वास के साथ जुमला उछालते हैं कि ग्राम स्तर पर बहाल करनी होगी पुरानी पंच न्याय व्यवस्था, बल्कि यहां तक कहा कि अगर ग्राम पंचायत होते, आगरा दंगे न होते। प्रशासन संवेदशील हो तो मामले कोर्ट से पहले की निपट जायें। टेली लाॅ सर्विस के माध्यम से ग्राम न्यायालय की अवधारणा पर कार्य करने को कहा।

और ठीक 21 दिन बाद गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने निर्णय लिया कि न्याय पंचायतें अव्यावहारिक हैं, इसलिए न्याय पंचायत से संविधान उ.प्र. पंचायतीराज अधिनियम की धारा-42 से 94 तक अधिनियम से निकाला जाये। न्याय पंचायतों के ताबूत में आखिरी कील ठोक दी गई। यह झूठ यहीं तक नही रूका। 11 जुलाई 2017 को पेश बजट में उत्तर प्रदेश सरकार पंचायती राज कॉलम में पेज-396 पर घोषणा करती है कि प्रत्येक न्याय पंचायत में दो चन्द्रशेखर आजाद ग्रामीण विकास सचिवालय बनेंगे।

झूठ का इतना व्यापाक और बेशर्म इस्तेमाल सिर्फ तानाशाह प्रवृत्ति की सरकार ही कर सकती है, जो यह मानती है कि उनका कहा ही असली अन्तिम सच है। दिल्ली दरबार का यह रोग उत्तर प्रदेश तक आ चुका है। सुलह-सफाई से निर्णय जैसी महत्वपूर्ण अवधारणा को निरन्तर झूठ बोलकर जनता को शक्तिहीन बनाना ही शायद किसी तानाशाही आगमन का संकेत है।

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