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सप्ताह की कविता में आज ऋतुराज की कविताएं

‘सारे रहस्‍य का उद्घाटन हो चुका और/ तुममें अब भी उतनी ही तीव्र वेदना है/…यह सोचने की मशीन/ यह पत्र लिखने की मशीन …/ मशीनों का चलना रूका नहीं है अभी/ तुम्‍हारी मुक्ति नहीं है…(शरीर)’

ऋतुराज की शरीर कविता यह समझने को पर्याप्‍त है कि किस तरह वे सरल ढंग से जटिल जीवन स्थितियों को भी अभिव्‍यक्‍त करने की सामर्थ्‍य रखते हैं। पंचतत्‍व रचित इस अधम माने जाने वाले शरीर को जिस तरह ऋतुराज उसकी आत्‍मा सौंपते हैं वह विश्‍व कविता में विस्‍मयकारी है। दरअसल जीवन एक निरंतरता में होता है, उसे कहीं से काटकर अलग से देखा समझा या परिभाषित नहीं किया जा सकता। इसलिए इस शरीर को अधम मानकर आप किनारा नहीं कर सकते, क्‍योंकि आपकी सारी सौंदर्य चेतना का आधार यही है, इसे ऋतुराज का कवि सही संदर्भों में समझ पाता है।

अपने एक संकलन की भूमिका में ऋतुराज एक शुभेच्‍छु आलोचक के बहाने अपनी आत्‍मालोचना को जगह देते लिखते हैं – ‘जब तक कोई कवि आम आदमी की निर्बाध जीवनशक्ति और संघर्ष में सक्रियता से शामिल नहीं होता, तब तक कवियेां के प्रति अविश्‍वास और उपेक्षा बनी रहेगी। वे निर्वासित, विस्‍थापित और नि:संग अपराधियों की तरह होंगे। कविता के कारागार में आग लगेगी और वे मारे जाएंगे।’ इस तरह ऋतुराज अपने लिए और अपने समय के कवियों के लिए एक चेतावनी केा जगह देते हैं कि अपने दही की मिठास का बयान करने की बजाय वे आम जन से जुडें नहीं तो उनके साथ कविता की मौत तय है।

विष्‍णु खरे और विष्‍णु नागर की तरह ऋतुराज भी रघुवीर सहाय से आगे की कविता को संभव बनाते हैं। रामदास की हत्‍या अगर तय है तो वे उसके तय होने को उद्घाटित करने और अन्‍याय को कोसने से आगे बढने की बात करते हैं। ‘विफलता की गतिकी’ कविता में वे लिखते हैं – ‘…अन्‍याय को कोसते हुए/ अपनी तुच्‍छता की स्‍वीकृति में/ एक जगह ठहर जाने का काम था…।’

वे समझा पाते हैं कि विफलता को कोसना अपनी तुच्‍छता को स्‍वीकृति देना भी है, कि कोसने में लगाया गया वक्‍त हम अन्‍याय से लडने में भी लगा सकते हैं और अपने को कुंठित होने से बचा सकते हैं। आज की युवा कविता जिस तरह अपने समय को एक सैलानी की निगाह से देखने और बयान करने की जुगत में अपना सारा समय जाया कर रही है, ऐसे में ऋतुराज की कविताएं राह दिखाती सी कहती हैं—’सैलानी ने क्‍या देखा/ पहाड/ झील और चौराहे पर मुस्‍तैद सिपाही/ लेकिन वह लडकी नहीं/ जिसकी धरती अधजले कोयलों के/ सफेद सलेटी रंगों से सनी है।’ आइए पढते हैं ऋतुराज की कविताएं – कुमार मुकुल

शरीर
सारे रहस्य का उद्घाटन हो चुका और
तुम में अब भी उतनी ही तीव्र वेदना है
आनंद के अंतिम उत्‍कर्ष की खोज के
समय की वेदना असफल चेतना के
निरवैयक्तिक स्पर्शों की वेदना आयु के
उदास निर्बल मुख की विवशता की वेदना

अभी उस प्रथम दिन के प्राण की स्मृति
शेष है और बीच के अंतराल में किए
पाप अप्रायश्चित ही पड़े हैं

लघु आनंद वृत्तों की गहरी झील में
बने रहने का स्वार्थ कैसे भुला दोगे
पृथ्वी से आदिजीव विभु जैसा प्यार
कैसे भुला दोगे अनवरत् सुंदरता की
स्तुति का स्वभाव कैसे भुला दोगे

अभी तो इतने वर्ष रूष्ट रहे इसका
उत्तर नहीं दिया अभी जगते हुए
अंधकार में निस्तब्धता की आशंकाओं का
समाधान नहीं किया है

यह सोचने की मशीन
यह पत्र लिखने की मशीन
यह मुस्कुराने की मशीन
यह पानी पीने के मशीन
इन भिन्न-भिन्न प्रकारों की
मशीनों का चलना रूका नहीं है अभी
तुम्हारी मुक्ति नहीं है।

कन्‍यादान
कितना प्रामाणिक था उसका दुख
लड़की को दान में देते वक़्त
जैसे वही उसकी अंतिम पूंजी हो

लड़की अभी सयानी नहीं थी
अभी इतनी भोली सरल थी
कि उसे सुख का आभास होता था
लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था
पाठिका थी वह धुंधले प्रकाश की
कुछ तुकों और लयबद्ध पंक्तियों की

माँ ने कहा पानी में झाँककर
अपने चेहरे में मत रीझाना
आग रोटियाँ सेंकने के लिए है
जलने के लिए नहीं
वस्त्र और आभूषण शब्दिक भ्रमों की तरह
बंधन हैं स्त्री-जीवन के

माँ ने कहा लड़की होना
पर लड़की जैसी मत दिखाई देना।

राजधानी में
अचानक सब कुछ हिलता हुआ थम गया है
भव्य अश्वमेघ के संस्कार में
घोड़ा ही बैठ गया पसरकर
अब कहीं जाने से क्या लाभ?

तुम धरती स्वीकार करते हो
विजित करते हो जनपद पर जनपद
लेकिन अज्ञान,निर्धनता और बीमारी के ही तो राजा हो

लौट रही हैं सुहागिन स्त्रियाँ
गीत नहीं कोई किस्सा मज़ाक सुना रही हैं-
राजा थक गए हैं
उनका घोड़ा बूढा दार्शनिक हो चला अब
उन्हें सिर्फ़ राजधानी के परकोटे में ही
अपना चाबुक फटकारते हुए घूमना चाहिए

राजधानी में सब कुछ उपलब्ध है
बुढापे में सुंदरियाँ
होटलों की अंतर्महाद्वीपीय परोसदारियाँ

राजधानी में खानसामे तक सुनाते हैं
रसोई में महायुद्धों की चटपट।