Last Update On : 28 07 2018 08:56:41 PM

हम अक्सर वेदों का गुणगान करते हैं, कहते हैं कि जैसी वेदपुराणों के युग में समाज व्यवस्था थी, वैसी समाज व्यवस्था ही समाज के लिए बेहतर थी। पर हममें से ज्यादातर लोग सिर्फ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर ये दावे करते हैं…ऐसे में आइए जानते हैं कि विवाह, परिवार, स्त्री, पितृसत्ता और जुआ के बारे में ऋग्वेद में क्या कहा और लिखा गया है…

डॉक्टर राजू रंजन प्रसाद, धर्मशास्त्र और इतिहास के जानकार

निजी संपत्ति की सुरक्षा का सम्बन्ध पितृसत्ता से पहले परिवार से है। मातृसत्तात्मक समाजों में भी व्यक्तिगत संपत्ति हुआ करती है और इसका हस्तांतरण माता से पुत्री को होता है। संपत्ति की सुरक्षा के लिए ही मातृसत्तात्मक समाजों से हमें भाई-बहन की शादी के उदाहरण प्राप्त होते हैं।

‘ऋग्वेद’ में यम-यमी संवाद इस प्राचीन परंपरा की ओर संकेत हो सकता है। इसलिए निजी संपत्ति से सीधे तौर पर विवाह और परिवार का सम्बन्ध जुड़ता है न कि पितृसत्ता का। पितृसत्ता परिवार और विवाह के बाद की चीज है।

पुत्र गोद लेने के बारे में
वैदिक ग्रंथों में युद्ध जीतने वाले वीर पुत्रों की कामना वाले मन्त्रों से हम सब परिचित हैं। इस बात से कम ही लोग वाकिफ होंगे कि दूसरे के पुत्र के प्रति उपेक्षा का भाव है। ऋग्वेद के 7वें मंडल के चौथे सूक्त में कहा गया है कि दूसरे के पुत्र को लेकर कोई पुत्रवान नहीं हो सकता, इसलिए हे अग्निदेव, हमें सदा विद्यमान रहने वाले धन का स्वामी बनाएँ। 8वें मन्त्र में कहा गया है क़ि दत्तक पुत्र भले ही सेवा करने वाला एवं ऋण न लेनेवाला हो, फिर भी उसका मन अपने जनक के पास जायेगा ही। दत्तक पुत्र से संतोष नहीं होता।

स्त्री का अस्तित्व और उसका मान
वैदिक साहित्य में जहाँ देवों का महत्वपूर्ण स्थान है, वहां देवियों अथवा देवपत्नियों का स्थान अपेक्षाकृत गौण है। देवपत्नियों अथवा देवियों का अलग से कोई व्यक्तित्व नहीं दिखता, वरन देवों के नाम के आधार पर ही उनका भी नामकरण हुआ है। अथर्ववेद के एक मंत्र में अग्निदेव की पत्नी अग्नायी, इंद्रदेव की पत्नी इन्द्राणी, अश्विनी कुमारों की पत्नी अश्विनी, रुद्रदेव की पत्नी रोदसी और वरुणदेव की पत्नी वरुणानी का रक्षार्थ आवाहन किया गया है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में सोमपान हेतु इन्द्राणी, अग्नायी और वरुणांनी को निमंत्रित किया गया है।

जिस घोषा के बहाने हम ऋग्वैदिक स्त्रियों पर गर्व करते हैं, देखें कि वह कहती क्या है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में कहती है, हे अश्विनीकुमारों! जैसे विधवा स्त्री द्वितीय वर तथा सुन्दर स्त्री अपने पति को सम्मानित करती है, उसी प्रकार यज्ञकाल में आदर सहित आपका कौन आवाहन करते हैं? एक अन्य मन्त्र में वह कहती है, आपकी सामर्थ्य से ही यह घोषा, नारी लक्षणों से युक्त होकर सौभाग्यवती हुई, यथा इच्छित वर श्रेष्ठ की उसे प्राप्ति हुई।

और आगे, जो पुरुष अपनी पत्नी की जीवन रक्षा के लिए रोदन तक करते हैं, उन्हें यज्ञादि सत्कर्मों में नियोनित करते हैं, गर्भाधानादि संस्कार से संतानोत्पादन करके पितृ यज्ञ में नियोजित करते हैं, उनकी स्त्रियां उन्हें सुख और सहयोग प्रदान करती हैं। पुनः, हे अश्विनकुमारों, मेरी इच्छा है क़ि पत्नी से प्रेम करने वाले स्वस्थ बलिष्ठ पति के गृह में पहुंचूं। साथ ही, हम अपने पति की प्रेमपात्र बनकर पति गृह को सुशोभित करें।

कन्या, शादी और कौमार्य
शादी कन्या की होती है और इसका संबंध कौमार्य से है। ऋग्वेद में अग्निदेव ‘कन्याओं का कौमार्य समाप्त करनेवाले और विवाहिता के पति’ हैं। कन्या अग्निदेव की परिक्रमा करने के बाद ही विवाहिता स्त्री बनती है, इसीलिए अग्निदेव को ‘कौमार्य हर्ता’ कहा गया है। स्त्रियां पति के साथ नित्य ही गार्हपत्य अग्नि का पूजन करती हैं, इस दृष्टि से उन्हें विवाहिता का पति कहा गया है। इस नाते अग्निदेव स्त्री के ‘प्रथम पति’ कहे जाते हैं। महाभारत में कथा है कि द्रौपदी को प्रत्येक पाण्डु-पुत्र से शादी के पहले कौमार्य प्रदान किया गया।

सम्मान का हकदार ‘वृद्धावस्था’
वृद्धावस्था को ऋग्वैदिक काल से ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता रहा है। ऋग्वेद के एक मन्त्र में इंद्र को कहा गया है क़ि आप सोम रस पीने के लिये देवताओं में सर्वश्रेष्ठ होने के लिये तत्काल वृद्ध रूप हो जाते हैं। ऋग्वेद के 27वें सूक्त में लिखा है क़ि अपने से बड़ों के सम्मान में हमारे द्वारा कोई त्रुटि न हो। तो आइए वृद्धों का सम्मान कर हम वैदिक संस्कृति की रक्षा करें।

जुआ खेलने का प्रभाव—कुप्रभाव बहुत स्पष्ट
जुआ ऋग्वैदिक समाज का काफी महत्वपूर्ण खेल है। ‘ऋग्वेद’ में कहा गया है कि ‘सोम पीने से जैसी प्रसन्नता होती है, वैसे ही पांसे उन्मत्त कर देते हैं’। किन्तु लोग इसे बुराई मानना भी शुरू कर चुके थे। आर्य परिवार को इसके प्रभाव-कुप्रभाव का काफी अनुभव है। लिखा है, ‘विजयी जुआरी के लिए पांसे पुत्रजन्म के समान हर्षदायक होते हैं, लेकिन पराजित जुआरी को तो मार ही डालते हैं।’

दशम मंडल का सूक्त 34 जुआ खेलने को दोष मानता है। इसलिए जुआ खेलने वाले की समाज में प्रतिष्ठा नहीं रह जाती। ‘जैसे बूढ़े घोड़े की कोई कीमत नहीं रहती, वैसे ही जुआरी भी अपनी प्रतिष्ठा खो देता है।’ जुआ खेलने वाले व्यक्ति को उसकी सास कोसती है और उसकी सुंदर पत्नी उसका परित्याग तक कर देती है। इस खेल से पारिवारिक संबंध प्रभावित होने लगे हैं।

एक स्थल पर कहा गया है कि ‘मेरी यह सुंदर, सुशीला पत्नी मुझसे कभी भी असंतुष्ट नहीं होती, वह हमेशा मेरी और मेरे पारिवारिक परिजनों, मित्रों की अथक सेवा करती रही है। मात्र इस अक्षक्रीड़ा (जुआ के खेल) ने ही मुझसे अति स्नेहमयी पत्नी को छीन लिया।’ लेकिन जिसे इसकी लत लग चुकी है वह ‘कुलटा स्त्री’ की भांति बार-बार पांसे के पास चला जाता है।