Begin typing your search above and press return to search.
समाज

माहवारी में होने वाले धार्मिक अपराध पर नेपाल ने लगाई रोक, मगर भारत में इन नारकीय स्थितियों पर चुप्पी कायम

Prema Negi
15 Jun 2019 6:01 AM GMT
माहवारी में होने वाले धार्मिक अपराध पर नेपाल ने लगाई रोक, मगर भारत में इन नारकीय स्थितियों पर चुप्पी कायम
x

हमारा राष्ट्रवाद कभी जेंडर संवेदी और बराबरी के व्यवहार वाला भी बनने की कोशिश करेगा या हम केवल गर्व से हिंदू होने भर की बात करेंगे...

​महिला अपराधों और माहवारी के दौरान महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव पर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी डिपार्टमेंट में प्रोफेसर सुधा सिंह की तल्ख टिप्पणी

नेपाल में पिछले दिनों माहवारी के दौरान किशोरियां और औरतों को घर से बाहर बनी झोपड़ी में रखे जाने की प्रथा के कारण हुई मौतों का संज्ञान लेते हुए वहां अब नया क़ानून लाया गया है और माहवारी के दौरान रजस्वला के अलग रखें जाने और उसके साथ छुआछूत का व्यवहार किए जाने को ग़ैरक़ानूनी करार दिया गया है।

माहवारी के आधार पर स्त्रियों के साथ भेदभाव न किए जाने का क़ानून पहले भी था, लेकिन अब उसे नये क़ानून के जरिए कठोरता से लागू किया गया है। माहवारी के दौरान किशोरियां और औरतों को घर के बाहर अलग झोपड़ी में रखे जाने, जहां बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव होता है, और उसके साथ अमानवीय व्यवहार को बंद करने का प्रयास किया गया है। यह संभव हुआ है नेपाल में स्त्री अधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठनों और कार्यकर्ताओं के संघर्ष के द्वारा।

भारत में क़ानून की नजर में बड़ी बड़ी आपराधिक घटनाएं ही आती हैं, स्त्री जीवन के बड़े हिस्से से जुड़े, इस तरह के छुआछूत और भेदभाव, अपराध की कोटि में आते ही नहीं। स्वयं स्त्रियां इसे धर्म और परंपरा के नाम पर जायज मानती हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी एक स्त्री की प्रेरणा से दूसरी स्त्री भी इन सड़ी-गली परंपराओं को ढोने के लिए सहर्ष और स्वेच्छया तैयार की जाती है। पुरूष इसे अपनी मांओं, दादियों को मानते मनवाते देखता है और अपनी पत्नी से अपेक्षा रखता है कि वह भी स्वयं इसका पालन करेगी और सास के रूप में अपनी बहू बेटियों से करवाएगी।

आज जबकि यह जाहिर है कि ऐसी अवस्था में स्त्री को विशेष देखभाल और आराम की जरूरत होती है, इस स्थिति में स्वास्थ्य संबंधी सफाई का विशेष ध्यान रखना होता है, उसे घर में मौजूद आराम और सफाई की (कम या ज्यादा) जो भी सुविधा उपलब्ध हो, उससे भी वंचित कर अलग थलग रहने- खाने, उठने - बैठने को बाध्य करना, निहायत अमानवीय कृत्य है। ऐसा कभी घर में विराजमान ठाकुर जी के नाम पर तो कभी बड़े- बूढ़ों के नाम पर किया जाता है।

स्त्री अगर माहवारी से गुजर रही है तो वह पूजाघर की तरफ न जाए, पूजा आदि के काम को न करें, इसके पीछे कोई वैज्ञानिक तर्क नहीं, लेकिन अगर स्त्री का धार्मिक आस्तिक मन न माने तो वह ठाकुर जी से दूर रह सकती है। हालांकि यह भी स्वयं को अछूत माना लेना ही हुआ और एक तरह का स्वयं निर्धारित भेदभाव स्वयं के साथ हुआ, जिसकी कंडीशनिंग स्त्री होने के नाते की गई है। लेकिन जमीन में कंबल पर सोना, अलग बर्तन में खाना, बर्तन को फिर आग से शुद्ध कर व्यवहार में लेना, यह सब ढकोसला और आडंबर है, जिसका शिकार स्त्रियां बनती हैं और अपने पर ही अत्याचार करती हैं।

यह वैज्ञानिक तौर पर सिद्ध हो चुका है कि रजस्वला स्त्री के छू लेने से अचार (pickles) खराब नहीं होते। कई प्रयोगों द्वारा इस धारणा को ग़लत साबित किया जा चुका है, लेकिन यह मिथ्या प्रचार पीढ़ी दर पीढ़ी, पढ़ी लिखी और अनपढ़, हर भारतीय महिला के जेहन में उतार दिया गया है। इतनी मेहनत से बनाए गये अचार को, जिसे महिलाएं सामूहिक तौर पर अपने अवकाश के क्षणों की क़ीमत पर तैयार करती हैं, कौन दांव पर लगाए! तो महिलाएं इन दिनों में अपनी जीभ को नियंत्रित कर लें, उसी में उन्हें निस्तार दिखता है।

उत्तर भारत समेत हिंदी पट्टी और बंगाल आदि प्रदेशों में माहवारी के दौरान महिलाओं को अलग से घर के बाहर झोपड़ी में तो नहीं रहना पड़ता, लेकिन घर ही में उनकी अलग थलग व्यवस्था उन्हें उन दिनों में घर के भीतर भेदभाव का शिकार बनाती है। बच्चा होने की स्थिति में तो अलग से सूतक घर ही होता है, जो घर का सबसे खराब और असुविधाओं वाला कमरा होता है, वह जच्चाघर की तरह इस्तेमाल होता है। गर्भवती महिला वहां अपने सूतक काटती है। वह भी लगभग महीना भर!

दिलचस्प है कि हमसे बहुत छोटे और कम आबादी तथा संसाधन वाले देश नेपाल ने तो महिलाओं के साथ होने वाले इस भेदभाव को अमानवीय और आपराधिक प्रकृति का माना, लेकिन भारत में इन नारकीय स्थितियों पर लगभग चुप्पी है! हमारा राष्ट्रवाद कभी जेंडर संवेदी और बराबरी के व्यवहार वाला भी बनने की कोशिश करेगा, या हम केवल गर्व से हिंदू होने भर की बात करेंगे?

Next Story

विविध