Last Update On : 31 03 2018 04:42:00 PM

भारत में वैज्ञानिक शोध की स्थिति काफी कमजोर, दुनियाभर में भारत के शोध पर दस्तावेज तो प्रसारित, मगर दोयम दर्जे के…

कालू राम शर्मा, विज्ञान मामलों के विशेषज्ञ

‘साइंस एंड टेक्नाॅलाजी रिचींग द अनरिच्ड थीम’ पर आयोजित 105वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री के इस वक्तव्य का स्वागत करना चाहिए कि उन्होंने छात्रों में विज्ञान को बढ़ावा देने की जरूरत पर बल दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का उदघाटन करते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने उद्बोधन में कहा कि युवाओं में वैज्ञानिक चिंतन को बढ़ावा देने की जरूरत है। स्कूली बच्चों के लिए विज्ञान के संस्थान व प्रयोगशालाएं खोलने का आह्वान करते हुए महसूसते हैं कि बच्चों के साथ संवाद कायम करने की जरूरत है।

इस कार्यक्रम में देश-विदेश के वैज्ञानिक, विद्वान और कॉरपोरेट अधिकारियों सहित करीब 5,000 प्रतिनिधि शामिल हुए। खास बात यह है कि 5,000 प्रतिनिधियों में से 2,000 वैज्ञानिक थे।

वैज्ञानिकों से इस अवसर पर वे कहते हैं कि वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाज तक पहुंचाया जाए। प्रधानमंत्री यह भी कहते हैं कि आम लोगों के फायदे के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान करें व रिसर्च एंड डिवेलपमेंट (आर एंड डी) को राष्ट्र के विकास के लिए पुनः परिभाषित करें।

उल्लेखनीय है कि विज्ञान कांग्रेस का आयोजन प्रतिवर्ष जनवरी में होता रहा है। विज्ञान कांग्रेस के इतिहास में यह पहली घटना है जब 3 से 5 जनवरी 2018 के दरमियान इस आयोजन को ओस्मानिया यूनिवर्सिटी हैदराबाद के वाइसं चांसलर ने कैंसिल कर दिया। ओस्मानिया यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर के अनुसार तीन दिसंबर 2017 को एमएससी भौतिकी के छात्र मुरली ने कैंपस में खुदकुशी कर ली थी और तभी से यूनिवर्सिटी की ओर से प्रशासन को धमकियां मिल रही थी। यही एक कारण है कि विज्ञान कांग्रेस का यूनिवर्सिटी का फैसला टालना पड़ा।

इसके बाद विज्ञान कांग्रेस का पांच दिवसीय आयोजन 16—20 मार्च तक पूर्वोत्तर में मणिपुर विश्वविद्यालय में आयोजित किया गया, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री ने भातर के महान वैज्ञानिकों पद्म विभूषण प्रो. यशपाल, पद्म विभूषण डॉ. यू. आर. राव तथा पद्मश्री डॉ. बलदेव राज को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए की, जिनका कुछ ही समय पहले निधन हुआ है। उनके साथ ही प्रधानमंत्री ने महान भौतिकी विज्ञानी स्टीफन हॉकिंस को भी याद किया, जिनका इसी माह निधन हुआ था।

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यह सही है कि हमारे देश में विज्ञान शिक्षण की स्थिति भयावह कही जा सकती है। हालांकि स्थिति वैज्ञानिक शोधों की भी काफी दयनीय है। विश्वविद्यालयों में किए जा रहे वैज्ञानिक शोधों का स्तर काफी दोयम या तीसरे दर्जें का होता है। जहां पीएचडी की डिग्री पाना ही एक मात्र मकसद होता है।

सीएसआइआर व इससे जुड़ी वैज्ञानिक संस्थान जो कि वैज्ञानिक कार्य को बढ़ावा देते हैं, उनके बजट में सरकार ने 50 फीसदी तक कटौती कर दी गई। जानी-मानी पत्रिका नेचर के अनुसार भारत में वैज्ञानिक शोध की स्थिति काफी कमजोर है। दुनियाभर में भारत के शोध पर दस्तावेज तो प्रसारित होते हैं, मगर ये दोयम दर्जे के हैं।

यह भी जगजाहिर है कि हमारे यहां के शोध संस्थान ब्यूरोक्रेसी के शिकार हैं। विश्वविद्यालयों में जो शोध हो रहे हैं वे मात्र डिग्री पाना मकसद है जो प्रमोशन और पद के लिए की जाती है। शोध वेतन बढ़ोतरी का एक प्रमुख आधार बन जाता है।

प्रधानमंत्री ने ये दो अलग-अलग चीज़ें कहीं, मगर इनका एक दूसरे से काफी गहरा रिश्ता है। देश में वैज्ञानिक शोधों की स्थिति के लिए यह यह सच है कि हमें वैज्ञानिक संस्थानों को दुरस्त करना होगा। साथ ही उन्हें पर्याप्त फंड उपलब्ध कराना होगा। लिहाजा, यह भी विचारणीय है कि आखिर वैज्ञानिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों में जो युवा प्रवेश पाते हैं वे स्कूलों से विज्ञान की बुनियादी समझ किस प्रकार की लेकर जाते हैं।

स्कूली विज्ञान शिक्षा का हाल कुछ इस प्रकार का है कि बच्चे विज्ञान रटने को मजबूर है। स्कूली स्तर पर बच्चों को अधिक से जांच-पड़ताल के पर्याप्त अवसर मुहैया कराए जाने चाहिए ताकि उनमें खोजी प्रवृति और रचनात्मकता का भाव पनपे।

स्कूली विज्ञान शिक्षा इन दिनों बुनियादी समस्याओं से ग्रसित है। अधिकांश स्कूलों में विज्ञान का शिक्षण करने वाले शिक्षक विज्ञान संकाय के नहीं हैं। ऊपर से स्कूलों में विज्ञान पढ़ाने वाले शिक्षकों की तैयारी विज्ञान के मान्य सिद्धांतों से मेल नहीं खाती। शिक्षा जगत में शिक्षकों की विज्ञान के मान्य सिद्धांतों के अनुरूप सतत् उन्मुखीकरण को लेकर सोच और मंचों का अभाव है।

भारत में यह तस्वीर आमतौर पर देखी जा सकती है। जहां बच्चों के हाथों में माइक्रोस्कोप होना चाहिए वहां उनके हाथों में जानकारी से लदी हुई बेजान, नीरस सी पाठ्य पुस्तक है। हमारे यहां स्कूली विज्ञान शिक्षा अलग-थलग पड़ी हुई है। इसे विश्वविद्यालय और वैज्ञानिक संस्थानों के समर्थन की आवश्यकता है।

विज्ञान शिक्षा को एक साधन के रूप में अपनाते हुए समाज में वैज्ञानिक नजरिए को पोषित करने का जो सपना आजाद भारत ने देखा था वह आज भी क्रियान्वयन की बाट जोह रहा है। सोचा यह गया था कि विषमताएं चाहे वह जाति, धर्म और जेंडर की हो या अंधविश्वासों के अंधकार की, इन्हें दूर करने में विज्ञान को एक साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाएगा, यह पहल कोरी विज्ञान शिक्षा के दस्तावेजों में दबी पड़ी है।

चुनौतियां दो स्तर पर हैं एक यह कि विज्ञान शिक्षा उन प्रथम पीढ़ी के समाज तक पहुंचाने की जरूरत है जो विषमताओं से दबा हुआ है। दूसरी चुनौती यह कि विज्ञान शिक्षण की डिग्री पाने वाले बुरी तरह से अंधविश्वासों में जकड़े हुए हैं।

स्कूली विज्ञान शिक्षा एक ऐसा जरिया हो सकता है जो समाज में वैज्ञानिक नज़रिए को फलने-फूलने के अवसर उपलब्ध करा सकता है। स्कूलों के जरिए हमें कल के नागरिकों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो वैज्ञानिक मानसिकता की वाहक होगी। यहीं से तमात विषमताओं से छुटकारा पाने की एक बेहतर शुरूआत हो सकती है।

105 वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री की यह चिंता जायज तो लगती है, मगर उनके ही केंद्रीय मंत्री विज्ञान के विरूद्ध वक्तव्य देने से नहीं थकते। मानव संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल ने हाल ही में जो बयान दिया वह हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के खिलाफ है।

चूंकि प्रधानमंत्री को विज्ञान और वैज्ञानिक मानसिकता पर सकारात्मक कहना था, इसलिए उन्होंने कहा। एक तरफ अपने ही मंत्रिमंडल के कथित जिम्मेदार मंत्री के बयान पर चुप्पी साधे रहते हैं, वहीं मंच से वे विज्ञान की चिंता जाहिर करते दिखते हैं जो एक दिखावा से अधिक नहीं। हमारे देश में विज्ञान शिक्षण की हालत का जायजा मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल के बयान से लगाया जा सकता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में जिसका संविधान वैज्ञानिक नजरिए को पोषित करने की बात करता है मगर तस्वीर का दूसरा पहलू यह कि शिक्षा के जरिए संवैधानिक मूल्यों को स्थापित करने वाले लोग ही वैज्ञानिक मान्यताओं की सरेआम धज्जियां उड़ाते दिखते हैं।

मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के ठीक सवा महीने पहले कहा कि स्कूलों और काॅलेजों के पाठ्यक्रम में डार्विन के सिद्धांत में परिवर्तन की जरूरत है। उन्होंने डार्विन के विकासवाद को गलत ठहराते हुए कहा कि हमारे पूर्वज हमेशा से ही मानव थे। इंसान जब से पृथ्वी पर देखा गया है तब से वह इंसान ही है। अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन में उन्होंने कहा “इंसान जब से पृथ्वी पर देखा गया है, हमेशा इंसान ही रहा है।

एक और बयान नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल के सदस्य का देखिए जो विज्ञान कांग्रेस के अवसर पर गैर वैज्ञानिक बयान देने से नहीं चूकते। हाल ही में महान वैज्ञानिक स्टीफन हाकिंग का निधन हुआ। इसी दौरान विज्ञान और प्रोद्योगिकी मंत्री हर्षवर्धन ने बिन सिर-पैर का बयान दे डाला। हर्षवर्धन ने दावा किया कि स्टीफन हाकिंग ने कहा था कि वेदों में निहित सूत्र अल्बर्ट आइंस्टीन के E=mc2 के सापेक्षता सिद्धांत से भी बेहतर है।

उल्लेखनीय है कि हाकिंग का इसी दौरान देहावसान हुआ था और आम समाज तक के लोग उनके वैज्ञानिक विचारों का बखान करते हुए आंसू बहा रहे थे, वहीं भारत जैसे लोकतांत्रिक देश के विज्ञान व प्रौद्योगिकी मंत्री दकियानूसी बात कह रहे थे। हालांकि उनसे जब पूछा गया कि इस जानकारी का स्रोत क्या है, इसे उन्होंने टालने की कोशिश की।

अगर बागड़ ही खेत को चरने लगे तो फिर क्या बचता है। विज्ञान कांग्रेस का आयोजन चूंकि एक प्रथा बन चुका है, इसलिए उस मंच से प्रधानमंत्री के औपचारिक बयान को हर्षवर्धन का औपचारिक बयान धत्ता बताता है। सच पूछा जाए तो यह उस प्रोटोकाॅल के भी खिलाफ है। इसे एक और कोण से भी देखने की जरूरत है कि सत्ताधारी सरकार वैज्ञानिक सिद्धांतों व सोच को ही नकारने में लगे हुए हैं और देश को अंधविश्वास व दकियानुसी सोच से उबारने के बजाय इस खाई में धक्का देने की कोशिश में लगे हुए हैं जहां से हमें विज्ञान ने उबारने में अहम भूमिका अदा की है।

प्रधानमंत्री की विज्ञान कांग्रेस में कही गई बातों को ज़मीं पर उतारने की सख्त जरूरत है। अगर हम आखिरी इंसान तक विज्ञान का पहुंचाना चाहते हैं, तो स्कूली विज्ञान शिक्षा में जान फूंकने की जरूरत है, काश की मोदी का मंत्रिमंडल इसे समझे और विज्ञान की हंसी न उड़ा इन बातों पर विचार करता।

(कालू राम शर्मा पिछले दो दशक से विज्ञान और सामाजिक चेतना पर लिखते हैं।)