मोदी की मजबूरी है कि उन्हें आजादी के आंदोलन से जुड़े कांग्रेसी नेताओं गांधी, पटेल या सुभाष चंद्र बोस के प्रतीकों को इस्तेमाल कर ही नेहरू-गांधी परिवार के वंशवाद का विरोध करना पड़ रहा है, क्योंकि उनके अपने मातृ संगठन आरएसएस के प्रतीकों हेडगेवार, सावरकर या गोलवलकर जनता को कभी स्वीकार्य नहीं होंगे…

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता संदीप पाण्डेय का विश्लेषण

अनुपम खेर ने अपनी हाल ही में बनी फिल्म में डॉ. मनमोहन सिंह को धोखे से बना प्रधानमंत्री बताया है, जबकि हकीकत यह है कि यदि कांग्रेस दोबारा चुनाव जीत कर आती है तो मनमोहन सिंह पुनः प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं। उनको चुनौती देकर जीतकर आए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से इतनी तेजी से जनता का मोहभंग हुआ है कि शायद अगले चुनाव में जनता उनको एक और मौका देने का खतरा न उठाए। जैसे अगले आम चुनाव नजदीक आ रहे हैं हमें इन दोनों के बीच अंतर को समझना होगा।

मनमोहन सिंह सरकार ने देश को सूचना का अधिकार, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा, अनुसूचित जनजाति व अन्य पारम्परिक वनजीवी (वन अधिकार को मान्यता), उचित मुआवजा व भू अधिग्रहण, पुर्नवास में पारदर्शिता के अधिकार, निर्भया, शिक्षा का अधिकार, पथ विक्रेता (आजीविका का संरक्षण व पथ विक्रय का विनिमयन), मैला ढोने के रोजगार पर प्रतिबंध व उनके पुर्नवास सम्बंधी अधिनियम दिए, जिनमें से पहले उल्लिखित कुछ का लाभ जनता को मिला एवं बाद में उल्लिखित का लाभ मिलना बाकी है।

नरेन्द्र मोदी सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया, जिससे आम इंसान को कुछ लाभ पहुंचा हो। मनमोहन सिंह की सरकार में जनता के बीच सूचना के अधिकार, मनरेगा, वन अधिकार कानून, आदि को लेकर उत्साह देखा जा सकता था, किंतु नरेन्द्र मोदी की सरकार में जन धन या उज्जवला योजना जनता के लिए कोई चर्चा का विषय नहीं है, सिवाय सरकार द्वारा प्रायोजित विज्ञापनों में।

नोटबंदी जो असल में नोटबदली था क्योंकि बड़े नोट वापस आ गए जिससे उसके मूल उद्देश्य भ्रष्टाचार को रोकने पर ही सवाल खड़ा होता है और ’उत्पाद एवं सेवा कर’ ने अर्थव्यवस्था की ऐसी कमर तोड़ी है कि अभी वह पूरी तरह से पटरी पर नहीं आ पाई है। एक ऐसी धारणा बन रही है कि नरेन्द्र मोदी व अरुण जेटली को अर्थव्यवस्था की कोई समझ नहीं है और वे आंकड़ों के साथ खेल कर अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का दावा करते हैं। ये दोनों रघुराम राजन व उर्जित पटेल जैसे विशेषज्ञों को भी साथ में नहीं रख पाए जो इस बात का प्रमाण है कि विशेषज्ञ उनके तरीकों से सहमत नहीं थे।

नरेन्द्र मोदी की सबसे बड़ी असफलता कानून व व्यवस्था के मोर्चे पर रही है। उनके राज में हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं को अपराध करने की खुली छूट मिली हुई है जिन्होंने समाज को आतंकित किया। भारतीय जनता पार्टी के सांसद राघव लखनपाल शर्मा ने अप्रैल 2017 में सहारनपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के आवास पर भीड़ के साथ हमला किया तो गौमांस खाने के शक पर या सिर्फ गायों को ले जाते हुए कई मुसलमानों को पीट पीटकर मार डाला गया। केन्द्रीय मंत्री जयंत सिन्हा ने झारखण्ड में ऐसे कुछ अपराधियों को माला भी पहनाई।

योगी आदित्यनाथ की सरकार में पचास के ज्यादा लोगों को मुठभेड़ में मार डाला गया तो भीड़ द्वारा पुलिस को मारने की भी घटनाएं हुईं। एक विधायक देश में असुरक्षित महसूस करने वालों को बम से उड़ाने की धमकी देते हैं, जिस धमकी के लिए किसी वामपंथी कार्यकर्ता को शहरी नक्सली बताकर जेल में डाल दिया जाता।

नरेन्द्र मोदी ने जितनी विदेश यात्राएं की हैं शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने की हो। मगर जहां जहां मोदी गए उनमें से ज्यादातर देशों के साथ, खासतौर पर पड़ोसी देशों के साथ, भारत के संबंध खराब ही हो गए। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने भारत से सिख श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर में गुरुद्वारा दरबार साहिब के दर्शन के लिए बिना पासपोर्ट-वीसा के रास्ता खोल भारत की तरफ मैत्री का हाथ बढ़ाया।

मोदी अपने दल की मुस्लिम विरोधी, पाकिस्तान विरोधी मानसिकता से उबर नहीं पा रहे हैं। पिछले आम चुनाव में अपने सीने का माप 56 इंच सार्वजनिक कर नरेन्द्र मोदी शायद दोस्ती के लिए उससे ज्यादा जो सीना चौड़ा करने की जरूरत है वह नहीं कर पा रहे। उनके बहुप्रचारित सर्जिकल स्ट्राइक से क्या हासिल हुआ मालूम नहीं, क्योंकि पाकिस्तान से आतंकवादियों की घुसपैठ तो पहले की तरह जारी है। मनमोहन सिंह की सरकार में पाकिस्तान के साथ रिश्तों में सुधार आया था। मुम्बई में आतंकी हमले के बावजूद भारत ने पाकिस्तान के साथ कभी बात न करने का हठ नहीं अपनाया।

नरेन्द्र मोदी की मजबूरी है कि उन्हें आजादी के आंदोलन से जुड़े कांग्रेसी नेताओं जैसे महात्मा गांधी, सरदार पटेल या सुभाष चंद्र बोस के प्रतीकों को इस्तेमाल कर ही नेहरू-गांधी परिवार के वंशवाद का विरोध करना पड़ रहा है क्योंकि उनके अपने मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतीकों जैसे हेडगेवार, सावरकर या गोलवलकर जनता को कभी भी स्वीकार्य नहीं होंगे।

ये लोग आजादी के आंदोलन के प्रति वफादार नहीं रहे। मात्र 31 प्रतिशत मतों के आधार पर, जो अभी तक लोकसभा में सबसे कम बहुमत का आंकड़ा है, सरकार बनाने के बाद नरेन्द्र मोदी ने अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए आरएसएस के कई मुद्दों जैसे आरक्षण का विरोध को छोड़ दिया है।

जैसे जैसे लोकसभा का चुनाव नजदीक आ रहा है अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा फिर उठने लगा है और ऐसा प्रस्तुत किया जा रहा है कि यह सभी हिन्दुओं का महत्वपूर्ण मुद्दा है। बिना देश की एक भी समस्या जैसे किसानों की आत्महत्या या बच्चों का कुपोषण, बेरोजगारी या शिक्षा-स्वास्थ्य की चरमराती व्यवस्था का कोई हल निकाले अब भाजपा भी मंदिर मुद्दे को हवा दे रही है।

भाजपा की सरकार बनने के बाद से कश्मीर और असम में लोग पहले से ज्यादा सरकार से नाराज़ हैं। भाजपा अपने को महिलाओं के अधिकारों का हितैषी बताकर तीन तलाक की व्यवस्था को गैर-कानूनी बनाना चाह रही है, लेकिन केरल के शबरीमाला मंदिर में बच्चा जनने वाली उम्र की महिलाओं के मंदिर प्रवेश का विरोध करती है। प्रधानमंत्री की पत्नी जशोदा बहन जिन्हें नरेन्द्र मोदी ने शादी के बाद ही छोड़ दिया था, का पासपोर्ट सरकार नहीं बनने दे रही ताकि वे अमेरिका जाकर मोदी की बदनामी न करें।

भाजपा ने अपने गौ प्रेम के चलते देश में एक नई समस्या खड़ी कर दी है, जैसे पहले से हमारे सामने कोई समस्याओं की कमी रही हो। आवारा पशु जो पहले पालतू थे किंतु अब उनका कोई खरीदार न होने की वजह से वे गांवों में खेत के खेत चर जा रहे हैं, से किसान परेशान है। सिर्फ यही एक मुद्दा भाजपा के लिए चुनाव में भारी पड़ सकता है।

उपरोक्त सभी बिन्दुओं से स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी की सरकार मनमोहन सिंह की तुलना में अकार्यकुशल रही है। नरेन्द्र मोदी ने 2002 में गुजरात साम्प्रदायिक हिंसा के द्वारा मतों का ध्रुवीकरण कर पहले गुजरात में व फिर पूरे देश में अपनी स्थिति मजबूत की। उन्होंने भ्रमित करने वाले वायदे कर समाज के कुछ तबकों का साथ लिया।

अंबानी—अडानी के धन से मोदी दूसरे दलों व अपने दल में दूसरे नेताओं पर भारी पड़े। इन सब वजहों से नरेन्द्र मोदी 2014 का चुनाव तो बड़ी आसानी से जीत गए, किंतु अब देश के लोगों को लग रहा है कि उनके साथ धोखा हुआ। इससे पहले भारत के किसी भी प्रधानमंत्री को झूठे वायदे करने के लिए इस तरह से मजाक का विषय नहीं बनाया गया अथवा किसी प्रधानमंत्री ने अपने पद की गरिमा इस तरह नहीं गिराई जैसे मोदी ने करोड़ों रुपए का वह कोट पहनकर जिस पर पट्टियों के रूप में उनका नाम अंकित था।


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