अब पुलिस की फाइल में आरोपितों की फेहरिस्त में बजरंग दल का योगेश राज हो या बीजेपी का सचिन, या गौरक्षा के नाम पर गले में भगवा लपेटे खुद को हिन्दूवादी कहने वाला राजकुमार, मुकेश, देवेन्द्र, चमन, राजकुमार, टिंकू या विनीत का नाम है, इनको सत्ताधारी होने की पहचान बुलंदशहर में मिल गई है….

वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी की तल्ख टिप्पणी….

एनकाउंटर हर किसी का होगा, जो सत्ता के खिलाफ होगा! कल तक पुलिस, सत्ता विरोधियों को निशाने पर ले रही थी तो अब पुलिसवाले का ही एन्काउंटर हो गया, क्योंकि वह सत्ता की धारा के विपरीत जा रहा था।

बुलंदशहर की हिंसा के बाद उभरे हालात ने एक साथ कई सवालों को जन्म दे दिया है। मसलन, कानून का राज खत्म होता है तो कानून के रखवाले भी निशाने पर आ सकते हैं। सिस्टम जब सत्ता की हथेलियों पर नाचने लगता है तो फिर सिस्टम किसी के लिए नहीं होता। संवैधानिक संस्थाओ के बेअसर होने का यह कतई मतलब नहीं होगा कि संवैधानिक संस्थाओं के रखवाले बच जायेंगे। और आखरी सवाल कि क्या राजनीतिक सत्ता वाकई इतनी ताकतवर हो चुकी है कि कल तक जिस पुलिस को ढाल बनाया आज उसी ढाल को निशाने पर ले रही है?

यानी लोकतंत्र को धमकाते भीड़तंत्र के पीछे लोकतंत्र के नाम पर सत्ता पाने वाले ही हैं। इन सारे सवालों के अक्स में बुलंदशहर में पुलिस इंस्पेक्टर को मारने के आरोपितों की कतार में सत्ताधारी राजनीतिक दल से जुड़ा होना भर है या सत्ता के अनुकुल विचार को अपने तरीके से प्रचारित-प्रसारित करने वाले हिन्दुवादी संगठनों की सोच है।

जो बेखौफ हैं और ये मान कर सक्रिय हैं कि उनके अपराध को अपराध माना नहीं जायेगा। यानी अब वह बारीक सियासत नहीं रही जब सत्ताधारी के लिये कानून बदल जाता था। सत्ताधारियों के करीबियों के लिये कानून का काम करना ढीला पड़ जाता था। या सत्ता के तंत्र महज एक फोन पर उनके लिए खुद को लचर बना लेता था। अब तो लकीर मोटी हो चली है।

सत्ता कोई फोन नहीं करती। कानून ढीला नहीं पड़ता। कानून को बदला भी नहीं जाता। बल्कि सत्तानुकुल भीड़तंत्र ही लोकतंत्र हो जाता है। सत्ता के रंग में रंगी भीड़ ही कानून मान ली जाती है और सिस्टम के लिये सीधा संवाद सियासत खुद की हरकतों से ही बना देती है कि उसे कानून का राज को बरकरार रखने के लिए नहीं बल्कि सत्ता बरकरार रखने वालों के इशारे पर काम करना है।

ये इशारा बीजेपी के एक अदने से कार्यकर्ता का हो सकता है। संघ के संगठन विहिप या बंजरंग दल का हो सकता है। गौरक्षकों के नाम पर दिन के उजाले में खुद को पुलिस से ताकतवर मानने वाले भीड़तंत्र का हो सकता है।

जाहिर है, बुलंदशहर को लेकर पुलिस रिपोर्ट तो यही बताती है कि पुलिसकर्मी सुबोध कुमार सिंह की हत्या के पीछे अकलाख़ की हत्या की जांच को सत्तानुकुल न करने की सुबोध कुमार सिंह की हिम्मत रही। जो पुलिस यूपी में कल तक 29 एनकाउंटर कर चुकी थी और हर एन्काउंटर के बाद योगी सत्ता ने ताली पीटी जिससे एनकाउंटर करती पुलिसकर्मी को आपराधिक नैतिक बल, सत्ता से मिलता रहा।

जब उसके सामने उसके अपने ही सहयोगी निडर पुलिसकर्मी सुबोध कुमार सिंह आ गये तो सत्ता की ताली पर तमगा बटोरती पुलिस को भी सुबोध की हत्या में कोई गलती दिखायी नहीं दी। पुलिसकर्मियों का इंस्पेक्टर सुबोध को मरने के लिये छोड़ देना बताता है कि पुलिस को कानून के राज की रक्षा नहीं करनी है बल्कि सत्तानुकुल भीड़तंत्र को ही सहेजना है।

ये कोई खास बात नहीं कि अब पुलिस की फाइल में आरोपितों की फेहरिस्त में बजरंग दल का योगेश राज हो या बीजेपी का सचिन, या फिर गौरक्षा के नाम पर गले में भगवा लपेटे खुद को हिन्दूवादी कहने वाला राजकुमार, मुकेश, देवेन्द्र, चमन, राजकुमार, टिंकू या विनीत का नाम है, क्योंकि इन नामों को अब सत्ताधारी होने की पहचान बुलंदशहर में मिल गई है।

जिस मोटी लकीर का जिक्र शुरू में किया गया है, वह कैसे अब और मोटी की जा रही है इसे समझने के लिये तीन स्तर पर जाना होगा। पहला, पुलिस के लिये आरोपी वीआईपी अपराधी है। दूसरा वीआईपी आरोपी अपराधी की पहचान अब विहिप, बजंरग दल, गोरक्षा समिति या बीजेपी के कार्यकर्ता भर की नहीं रही, उसका कद सत्ता बनाये रखने के औजार बनने का हो गया।

तीसरा, जब पुलिस के लिये सत्तानुकुल होकर अपराध करने की छूट है तब न्यायालय के सामने भी सवाल है कि वह जाँच के सबूतों के आधार पर फैसला दे, जिस जाँच को पुलिस ही करती है। किस तरह इन तीन स्तरों को मजबूत किया गया उसके भी तीन उदाहरण हैं।

पहला तो सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हुये जस्टिस जोसेफ के इस बयान से समझा जा सकता है, जब वह कहते हैं कि पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त ऊपर से निर्देश दिये जा रहे थे। रोटी—पानी के लिये कैसे वह समझौता कर सकते हैं। यानी सुप्रीम कोर्ट की कारर्वाई को भी अगर जस्टिस जोसेफ के नजरिये से समझें तो सत्ता सुप्रीम कोर्ट को भी अपने खिलाफ जाने देना नहीं चाहती और दूसरा, न्याय की खरीद फरोख्त सत्ता के जरिये भी हो रही है।

यानी जो बिकना चाहता है वह बिक सकता है। लेकिन इसके व्यापक दायरे को समझें तो सत्ता कोई कारपोरेट संस्था नहीं है। बल्कि सत्ता तो लोकतंत्र की पहचान है। संविधान के हक में खड़ी संस्था है। लेकिन जिस अंदाज में सत्ता काम कर रही है उसमें सत्तानुकुल होना ही अगर सबसे बडा विचार है या फिर जनता द्वारा चुनी हुई सत्ता लोकतंत्र को प्रभावित करने के लिये आपराधिक कार्यों में संलिप्त हो जाये, या आपराधिक कार्यों से खुद को बरकरार रखने की दिशा में बढ़ जाये तो क्या होगा? जाहिर है इसके बाद कोई भी संवैधानिक संस्था या कानून का राज बचेगा कैसे?

दरअसल इस पूरी प्रक्रिया में नया सवाल ये भी है कि क्या चुनाव अलोकतांत्रिक होते माहौल में एक सेफ्टी वाल्व है? और अभी तक ये माना जाता रहा कि चुनाव में सत्ता परिवर्तन कर जनता अलोकतांत्रिक होती सत्ता के खिलाफ अपना सारा गुस्सा निकाल देती है। लेकिन इस प्रक्रिया में जब पहली बार ये सवाल सामने आया है कि चुनावी लोकतंत्र की परिभाषा को ही अलोकतांत्रिक मूल्यों को परोस कर बदल दिया जाये।

यानी पुलिस, कोर्ट, मीडिया, जांच एजेंसी, सभी अलोकतांत्रिक पहल को सत्ता के डर से लोकतांत्रिक बताने लगें, तो फिर चुनाव सेफ्टी वाल्व के तौर पर भी कैसे बचेगा? क्योंकि हालात तो पहले भी बिगडे़ लेकिन तब भी संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका को जायज माना गया। जब लोकतंत्र का हर स्तम्भ सत्ता बरकरार रखने के लिये काम करने लगेगा और देशहित या राष्ट्रभक्ति भी सत्तानुकुल होने में ही दिखायी देगी तो फिर बुलंदशहर में मारे गये पुलिसकर्मी सुबोध कुमार सिंह के हत्यारे भी हत्यारे नहीं कहलायेंगे। बल्कि आने वाले वक्त में संसद में बैठे 212 दागी सांसदों और देशभर की विधानसभाओं में बैठे 1284 दागी विधायकों में से ही एक होंगे।

तो इंतज़ार कीजिए, आरोपियों के जनता के नुमाइंदे होकर विशेषाधिकार पाने तक का!

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