हाईकोर्ट ने कहा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना सामूहिक अपराध, जिसमें आक्रमण राजनेताओं के इशारे पर होता और क़ानून को लागू करने वाली एजेंसियाँ करती हैं इसमें मदद

सिख विरोधी दंगे में सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिलने पर वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का विश्लेषण

जनज्वार। सिख विरोधी दंगे के मामले में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने 1993 के मुंबई दंगे, 2002 के गुजरात दंगे तथा 2008 में ओडिशा में, 2013 में मुजफ्फरनगर में ऐसे ही दंगों का उल्लेख किया। कहा कि ऐसे मामलों के लिए देश के आपराधिक कानून में बदलाव की जरूरत है।

हाईकोर्ट ने कहा कि मानवता के खिलाफ अपराध और नरसंहार जैसे इन मामलों से निपटने के लिए अलग से कानून की जरूरत है। कानून में लूपहोल के चलते ऐसे नरसंहार के अपराधी केस चलने और सजा मिलने से बच निकलते हैं।

जस्टिस एस. मुरलीधर और विनोद गोयल की पीठ ने कांग्रेस लीडर सज्जन कुमार को दोषी करार देते हुए कहा कि ऐसे मामलों के लिए अलग से कोई कानूनी एजेंसी न होने का ही अपराधियों को फायदा मिला और वे दशकों तक बचे रहे। सज्जन कुमार को हत्या और साजिश रचने का दोषी करार देते हुए पीठ ने कहा कि ऐसे मामलों को सामूहिक अपराध के बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इसके लिए अलग नजरिये की जरूरत है। ट्रायल कोर्ट ने 2013 में सज्जन कुमार को बरी कर दिया था।

दंगों मे अल्पसंख्यक बनते हैं निशाना
फैसले के पैरा 367.6 में कहा गया है कि भारत में, नवंबर 1984 में हुए दंगों में दिल्ली 2733 और देश भर में 3350 सिखों का कत्लेआम हुआ। यह न तो अपनी तरह का पहला कत्लेआम था और दुर्भाग्य से न ही आखिरी। 1947 के बंटवारे के बाद से भारत ऐसे कत्लेआमों से अंजान नहीं रहा है।

दिल्ली, पंजाब में बंटवारे के दौरान दंगों में हुए कत्लेआम की यादें अब भी ताजा हैं। 84 के दंगों में भी ऐसा ही कुछ हुआ था। 1993 में मुंबई में भी ऐसे दंगे देखने को मिले थे। 2002 में गुजरात में, 2008 में ओडिशा में, 2013 में मुजफ्फरनगर में ऐसे ही दंगे हुए हैं। इन सभी मामलों में एक चीज बिल्कुल समान है कि सभी में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया है और हमला करने वाली वर्चस्वशाली राजनीतिक ताकतों को कानून लागू करने वाली एजेंसियों का खुला सहयोग और समर्थन मिला है। जनसंहार के लिए दोषी अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था और वो सजा से खुद को बचाने में सफल रहे।

निचली अदालत के बरी करने का आदेश अवैध
निचली अदालत द्वारा सज्जन कुमार को बरी करने पर पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने 2013 के अपने आदेश में सज्जन कुमार को निर्दोष पाया था, जो अवैध था क्योंकि इसमें गवाहों को दूसरे आरोपियों के लिए विश्वसनीय माना गया लेकिन कुमार ने लिए नहीं। पीठ ने कहा कि दूसरे आरोपियों की संलिप्तता के संदर्भ में गवाहों की गवाही को स्वीकार किया गया। लेकिन जब कुमार की संलिप्तता की बात आई तो गवाहों के बयानों पर विश्वास को लेकर ट्रायल कोर्ट ने ‘पूरी तरह से यू-टर्न लिया’ था।

ऐसा लगता है कि ट्रायल कोर्ट ने अपराध के बड़े पहलू को ‘दरकिनार’ किया, क्योंकि वह सीबीआई द्वारा विस्तार से दलील रखे जाने के तथ्य के बावजूद साजिश रचने के आरोपों पर सही से फैसला करने में नाकाम रहा। अभियोजन की तरफ से पेश किए गए ‘संदेह से परे’ थे, जिससे साबित होता है कि कुमार ‘भीड़ के अगुआ’ थे और निर्दोष सिखों की हत्या के लिए भीड़ को ‘सक्रिय रूप से उकसा’ रहे थे।

क्रूर हत्याओं में दिल्ली पुलिस की सक्रिय भागीदारी
दिल्ली पुलिस की भूमिका पर पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी में 1984 के दंगों के दौरान 2,700 से ज्यादा सिखों की हत्या अविश्वसनीयता की हद तक नरसंहार था। दिल्ली पुलिस ने उस वक्त बेरुखी का प्रदर्शन किया और इन क्रूर हत्याओं में उसकी सक्रिय भागीदारी दिखी। पुलिस ने वास्तव में आंखें बंद कर ली थीं और दंगाई भीड़ के अपराध को उकसाया’। उनके द्वारा मामलों की कई गई जांच तो मजाक थी। पीठ ने कहा कि कि 1 नवंबर 1984 से लेकर अगले 4 दिनों में सिर्फ दिल्ली कैंट इलाके में 341 मौत होने के बावजूद, केवल 21 एफआईआर दर्ज की गई, इनमें से 15 मौत या हत्या से जुड़ी थी। पीठ ने कहा कि लॉ ऐंड ऑर्डर मशीनरी पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी और पूरी तरह अराजक स्थिति थी।

नरसंहार के मामलों के लिए अलग कानून की जरूरत
पीठ ने कहा ऐसे मामलों के लिए अलग से कोई कानूनी एजेंसी न होने का ही अपराधियों को फायदा मिला और वे दशकों तक बचे रहे। ऐसे मामलों को मास क्राइम के बड़े परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए। इसके लिए अलग ही अप्रोच की जरूरत है। फैसले के पैरा 152 में पीठ ने कहा कि प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जो मौत का तांडव हुआ वह अविश्वसनीय था। इसमें 2,700 से अधिक सिखों की हत्या हुई। क़ानून और व्यवस्था पूरी तरह टूट चुकी थी और सब अपनी मनमर्ज़ी कर रहे थे।

पैरा 367.6 में पीठ ने कहा कि अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना सामूहिक अपराध है, जिसमें आक्रमण राजनीतिक नेताओं के इशारे पर होता है और क़ानून को लागू करने वाली एजेंसियाँ इसमें मदद करती हैं। सामूहिक अपराध के लिए ज़िम्मेदार अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण मिलता रहा है और वे सज़ा से बचते रहे हैं।

इस तरह के अपराधियों को क़ानून के हवाले करना हमारी क़ानून व्यवस्था के लिए चुनौती रही है। दशकों गुज़र गए, इनको सज़ा नहीं मिली। इसे देखते हुए क़ानून व्यवस्था को मज़बूत करने की आवश्यकता है। ना तो मानवता के ख़िलाफ़ अपराध और न ही नरसंहार ही अपराध संबंधी हमारे देशी क़ानून के तहत आता है। इस कमी को शीघ्र दूर करने की ज़रूरत है।

सज्जन के शहर से बाहर जाने पर भी रोक
हाईकोर्ट ने 74 वर्षीय सज्जन कुमार को 1984 में सिख विरोधी दंगे के दौरान दिल्ली के राज नगर इलाके में एक परिवार के पांच लोगों की हत्या करने के लिए दोषी ठहराया है। सज्जन कुमार को निचली अदालत ने इस मामले में बरी कर दिया था, जिसके खिलाफ पीड़ित पक्ष और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने हाईकोर्ट में अपील की थी। अदालत ने सज्जन कुमार को 31 दिसंबर तक आत्मसमर्पण करने को कहा है और शहर से बाहर जाने पर भी रोक लगा दी है।