Last Update On : 20 02 2018 08:12:00 PM

अस्पताल के लिए घर, जमीन और बीवी के गहने तक बेच दिए….

कोलकाता। तेरह—चौदह साल पहले अपनी बीमार बहन के इलाज के लिए एक भाई कोलकाता के अस्पतालों के चक्कर लगाता रहा, लेकिन किसी डॉक्टर ने उसकी बहन का इलाज नहीं किया। क्योंकि वह गरीब था और अस्पतालों की मोटी फीस नहीं भर सकता था, इलाज के अभाव में अंतत: उसकी बहन मारूफा की जान चली गयी।

बहन मारूफा खातून की मौत का उसके भाई सईदुल इस्लाम को भारी सदमा लगा और उसने अपने मन में गरीबों के इलाज के लिए अस्पताल बनवाने की ठान ली।

प्रभात खबर में छपी खबर के मुताबिक सहिदुल इस्लाम पश्चिम बंगाल के बारुईपुर का निवासी है और पेशे से टैक्सीचालक का काम करता है।

सईदुल कहता है, मुझे अपनी बहन की मौत बहुत सालती थी कि मैं उसे बचा नहीं पाया। मारूफा की मौत के बाद हमेशा यह बात कचोटती थी कि पूरी रात अस्पतालों के चक्कर लगाने के बाद भी इतने बड़े शहर में मेरी बहन को किसी अस्पताल ने एडमिट नहीं किया, क्योंकि हम गरीब थे और भारी भरकम बिल नहीं भर सकते थे। सरकारी अस्पतालों में भी तमाम कोशिशों के बाद मेरी बहन को भर्ती नहीं किया गया।

चेस्ट इंफेक्शन का इलाज न होने के चलते मारूफा की मौत हो गई। मेरी तरह न जाने कितने ऐसे अभागे होंगे जो अपने करीबियों का इलाज नहीं करा पाते होंगे। ऐसे कितने ही लोग छोटे शहरों व गांवों से कोलकाता इलाज के लिए आते होंगे और दर-दर भटकते हुए एक दिन अपने चहेते की लाश लेकर लौटते होंगे।

अपनी बहन को तो सईदुल नहीं बचा सका, लेकिन उसके जैसे इलाज के अभाव में मर रहे लोगों को बचाने का उसने प्रण कर लिया। अपनी बहन की याद में सईदुल ने मारुफा स्मृति फांउडेशन की स्थापना की। पिछले 14 सालों से सहिदुल टैक्सी चलाते-चलाते टैक्सी में बैठे यात्रियों को इस फाउंडेशन के बारे में बताते हुए चंदा मांगता था।

सबसे पहले अस्पताल बनाने के लिए उसने अपनी पत्नी के आभूषण और अपनी जमीन बेचकर दो बीघा जमीन खरीदी। चंदे में मिली राशि और इतने सालों में पाई—पाई जोड़कर बचाई रकम से उसने दक्षिण 24 परगना के बारुईपुर स्थित पुर्नी ग्राम में चारमंजिला अस्पताल का निर्माण कर लिया है। सहिदुल को संतुष्टि है कि इससे कुछ ऐसे लोगों की जान बच जाएगी जो इलाज के अभाव में दम तोड़ देते हैं।

अपनी की याद में बनाए गए अस्पताल का उदघाटन 17 फरवरी को किया गया। इसका उदघाटन करने के लिए किसी मंत्री, प्रशासनिक नौकरशाह को नहीं बुलाया गया, बल्कि उससे करवाया गया, जिस श्रीस्ठा घोष ने अपनी पहली सैलरी अस्पताल बनाने के लिए दे दान की थी।

इस अस्पताल को बनाने में कुल 36 लाख रुपए खर्च हुए हैं। अस्पताल में इलाज के लिए न्यूनतम 20 रुपये की राशि तय की गयी है, जिसे देने में गरीब—गुरबा इंसान भी सक्षम होगा। (प्रतीकात्मक फोटो)