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मोदी जी का मिशन डिजिटल इंडिया और कितना सताएगा गरीबों को, अब तक हो चुकी हैं कई मौतें, अस्पताल ने दर्द से कराहती गर्भवती को आधार के बिना भर्ती करने से किया इंकार, डरा—धमकाकर निकाल बाहर….

जनज्वार, वाराणसी। प्रधानमंत्री मोदी का मिशन डिजिटल इंडिया गरीबों के लिए अभिशाप बनता जा रहा है। हर चीज को आधार कार्ड से लिंक करना तो जैसे गरीबों—अनपढ़ों के लिए काल बन गया है। मोदी जी डिजिटल इंडिया के सपने साकार कर रहे हैं तो गरीब आधार कार्ड के चलते जान तक गंवा चुके हैं। देशभर में अब तक आधार कार्ड न होने के चलते कई लोग अपनी जान से हाथ धो बैठे हैं।

हालिया घटना में एक गर्भवती को आधार कार्ड न होने की कीमत चुकानी पड़ी। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के शाहगंज के सरकारी अस्पताल ने गर्भवती महिला को इसलिए एडमिट नहीं किया क्योंकि उसके पास आधार कार्ड और अपना बैंक खाता नहीं था।

प्रभात खबर में छपी एक खबर के मुताबिक गर्भवती महिला प्रसव के दर्द से कराह रही थी और अस्पताल प्रशासन आधार जमा करवाने पर अड़ा हुआ था। महिला का पति गर्भवती की बिगड़ती हालत देखकर डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन के सामने उसके इलाज के लिए गिड़गिड़ाता रहा, मगर किसी ने उसकी एक न सुनी। उल्टा डरा—धमकाकर और डांटकर गर्भवती महिला समेत उसके परिजनों को अस्पताल से बाहर निकाल दिया गया।

घटनाक्रम के मुताबिक बहुत ही गरीबी में गुजर—बसर कर रही चंदा गर्भवती थी, वह शाहगंज जनपद में फैजाबाद जाने वाली सड़क के किनारे अस्थायी झोपड़ी में अपने परिवार के साथ खानाबदोश जिंदगी गुजार रही थी। जब 24 वर्षीय चंदा को लेबर पेन शुरू हुआ तो उसका पति अजय नट कल 29 जनवरी की शाम को उसे शाहगंज स्थित राजकीय अस्पताल में लाया।

अस्पताल में पहुंचते ही ड्यूटी पर तैनात महिला चिकित्सक शोभना दूबे ने गर्भवती महिला का आधार कार्ड और बैंक खाते की फोटोकॉपी जमा करने को कहा। कहा कि बिना इसके इलाज संभव नहीं है। जब चंदा के परिजनों ने कहा कि उसका आधार कार्ड और बैंक खाता नहीं है तो डॉक्टरों और अस्पताल प्रशासन ने उसका इलाज करने से मना कर दिया और वहां से डांट—फटकार कर बाहर निकाल दिया।

जब चंदा को डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन बाहर निकाल रहे थे, वह प्रसव के दर्द से बुरी तरह तड़प रही थी। मगर डॉक्टरों ने अपना धर्म निभाने के बजाय आधार कार्ड और बैंक खाता न होने का बहाना कर उसे बाहर निकाल दिया।

चंदा अस्पताल के गेट पर दर्द के कारण गिर पड़ी और वहीं पर उसकी डिलीवरी हो गई। आसपास मौजूद लोगों ने जब अस्पताल प्रशासन की असहिष्णुता और असंवेदनशीलता देखी तो खूब हो—हंगामा किया, तब जाकर दबाव में उसे अस्पताल में ले जाया गया। हालांकि जच्चा—बच्चा दोनों की हालत अब ठीक है, मगर सिर्फ आधार न होने पर किसी को अस्पताल में भर्ती न करना कहां की मानवता है।

क्या मिशन डिजिटल इंडिया इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि कोई हमारी आंखों के सामने दम तोड़ दे और हम तमाशबीन बने देखते रहें। कम से कम जिस तरह की घटनाएं आधार कार्ड के अभाव में हो रही हैं, उससे तो यही लगता है।

इस घटना से लोगों में अस्पताल प्रशासन और संबंधित डॉक्टरों के प्रति भारी रोष था। महिला चिकित्सक शोभना दूबे और बाल रोग विशेषज्ञ एमके गुप्ता ने जनदबाव को देखते हुए जच्चा—बच्चा को एडमिट कर इलाज शुरू किया, मगर अगर इस घटना में मां—बच्चे की जान चली जाती तो आखिर कौन होता इसके लिए जिम्मेदार।