Last Update On : 03 12 2018 02:02:14 PM

जो कारपोरेट आज मीडिया हाउस के जरिए मोदी सरकार के अनुकुल ये सोच कर बने हैं कि कल सत्ता बदलने पर वह दूसरी सत्ता के साथ भी सौदेबाजी कर सकते हैं, तो उनके लिये ये खतरे की घंटी है….

पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ टीवी पत्रकार

क्या पत्रकारिता की धार भोथरी हो चली है। क्या मीडिया – सत्ता गठजोड ने पत्रकारिता को कुंद कर दिया है। क्या मेनस्ट्रीम मीडिया की चमक खत्म हो चली है। क्या टैक्नोलॉजी की धार ने मेनस्ट्रीम मीडिया में पत्रकारों की जरूरतों को सीमित कर दिया है। क्या राजनीतिक सत्ता ने पूर्ण शक्ति पाने या वर्चस्व के लिये मीडिया को ही खत्म करना शुरू कर दिया है।

जाहिर है ये ऐसे सवाल हैं जो बीते चार बरस में धीऱे धीरे ही सही लेकिन कहीं तेजी से उभरे हैं। खासकर जिस अंदाज में न्यूज चैनलों के स्क्रिन पर रेंगते मुद्दे का कोई सरोकार न होना। मुद्दों पर बहस असल मुद्दों से भटकाव हो और चुनाव के वक्त में भी रिपोर्टिंग या कोई राजनीतिक कार्यक्रम भी इवेंट से आगे निकल नहीं पाये।

या कहें सत्ता के अनुकूल लगने की जद्दोजहद में जिस तरह मीडिया खोता जा रहा है उसमें मीडिया के भविष्य को लेकर भी कई आंशकायें उभर रही है। आशंकाएं इसलिये क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया के समानातांर डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया अपने आप ही खबरों को लेकर मेनस्ट्रीम मीडिया को चुनौती देने लगा है और ये चुनौती भी दोतरफा है।

एक तरफ मीडिया-सत्ता गठजोड ने काबिल पत्रकारों को मेनस्ट्रीम से अलग किया तो उन्होंने अपनी उपयोगिता डिजिटल या सोशल मीडिया में बनायी तो दूसरी तरफ मेनस्ट्रीम मीडिया में जिन खबरों को देखने की इच्छा दर्शकों में थी अगर वही गायब होने लगी तो बड़ी तादाद में गैर पत्रकार भी सोशल मीडिया या डिजिटल माध्यम से अलग अलग मुद्दों को उठाते हुये पत्रकार लगने लगे।

मसलन ध्रुव राठी कोई पत्रकार नहीं है। आईआईटी से निकले 26 बरस के युवा हैं, लेकिन उनकी क्षमता है कि किसी भी मुद्दे या घटना को लेकर आलोचनात्मक तरीके से तकनीकी जानकारी के जरिये डिजिटल मीडिया पर हफ्ते में दो 10 -10 मिनट के दो कैप्सूल बना दें, तो उन्हें देखने वालों की तादाद इतनी ज्यादा हो गई कि मेनस्ट्रीम अंग्रेजी मीडिया का न्यूज चैनल रिपब्लिक या टाइम्स नाउ या इंडिया टुडे भी उससे पिछड़ गया, लेकिन यहां सवाल देखने वालों की तादाद का नहीं बल्कि मेनस्ट्रीम मीडिया की कुंद पड़ती धार का है।

जिस तरह मीडिया का विस्तार सत्ता के कब्जे के दायरे में करने के लिये मीडिया संस्थानों का नतमस्तक होना है, उसका भी है और ये सवाल सिर्फ कन्टेट को लेकर ही नहीं है बल्कि यही सवाल डिस्ट्रीब्यूशन से भी जुड़ जाता है। ध्यान दें तो मोदी सत्ता के विस्तार या उसकी ताकत के पीछे उसके मित्र कारपोरेट की पूंजी की बड़ी भूमिका रही है। मीडिया संस्थानों की फेहरिस्त में बार बार ये सवाल उठता है कि मुकेश अंबानी ने मुख्यधारा के 70 फीसदी मीडिया हाउस पर लगभग कब्जा कर लिया है।

हिन्दी में सिर्फ आजतक और एबीपी न्यूज चैनल को छोड़ दें तो कमोवेश हर चैनल में दायें-बायें या सीधे पूंजी अंबानी की ही लगी हुई है। यानी शेयर उसी के हैं। पर ये भी महत्वपूर्ण है कि अंबानी का मीडिया प्रेम यूं ही नहीं जागा है और मोदी सरकार नहीं चाहती तो जागता भी नहीं ये भी सच है, क्योंकि धीरूभाई अंबानी के दौर में मीडिया में आब्जर्वर ग्रुप के जरिये सीधी पहल जरूर हुई थी, लेकिन तब कोई सफलता नहीं मिली।

तब सत्ता की जरूरत भी अंबानी के मीडिया की जरूरत से कोई लाभ लेने वाली नहीं थी तो मीडिया कोई लाभ का धंधा तो है नहीं। लेकिन सत्ता जब मीडिया पर अपने लिये नकेल कस लें तो मीडिया से लाभ किसी भी धंधे से ज्यादा लाभ देने लगती है। सच ये भी है, क्योंकि सिर्फ विज्ञापनों से न्यूज चैनलों का पेट कितना भरता होगा, ये दो हजार करोड़ के विज्ञापन से समझा जा सकता है, जो टीआरपी के आधार पर चैनलों में बंटते-खपते हैं।

राजनीतिक विज्ञापनों का आंकड़ा जब बीते चार बरस में बढ़ते—बढ़ते 22 से 30 हजार करोड़ तक जा पहुंचा है तो फिर मीडिया अगर सिर्फ धंधा है तो कोई भी मुनाफा कमाने में ही जुटा हुआ नजर आयेगा। जो सत्ता से लड़ेगा उसकी साख जरूर मजबूत होगी, लेकिन मुनाफा सिर्फ चैनल चलाने तक ही सीमित रह जायेगा और कैसे सत्ता कारपोरेट का खेल मीडिया को हडपता है इसकी मिसाल एनडीटीवी पर कब्जे की कहानी है।

जो मोदी सरकार के दौर में राजनीतिक तौर पर उभरी और मोदी सत्ता ही उन तमाम कारपोरेट प्लेयर को तलाशती रही कि वह एनडीटीवी पर कब्जा करें, उसने एक तरफ अगर सत्ता की मीडिया को अपने कब्जे में लेने की मानसिकता को उभार दिया। उसका दूसरा सच यह भी है कि मीडिया चलाते हुये चाहे जितना घाटा हो जाये, लेकिन मीडिया पर कब्जा कर अगर उसे मोदी सत्ता के अनुकुल बना दिया जाये तो मोदी सत्ता ही दूसरे माध्यमों से मीडिया पर कब्जा जमाये कारपोरेट को ज्यादा लाभ दिला सकती है।

यहां ये भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहले सहारनपुर के गुप्ता बंधुओं जिनका वर्चस्व दक्षिण अफ्रीका में राबर्ट मोगाबे के राष्ट्रपति होने के दौर में रहा उनको एनडीटीवी पर कब्जे का आफर मोदी सत्ता की तरफ से दिया गया। लेकिन एनडीटीवी की बुक घाटे वाली लगी तो गुप्ता बंधु ने एनडीटीवी पर कब्जे से इंकार कर दिया। चूंकि गुप्ता बंधुओं का कोई बिजनेस भारत में नहीं है तो उन्हें घाटे का मीडिया सौदा करने के बावजूद भी राजनीतिक सत्ता से मिलने वाले ज्यादा लाभ की जानकारी नहीं रही।

भारत में काम कर रहे कारपोरेट के लिये ये सौदा आसान रहा, तो अंबानी ग्रुप इसमें शामिल हो गया और माना जाता है कि आज नहीं तो कल एनडीटीवी के शेयर भी ट्रांसफर हो ही जायेंगे। इसी कड़ी में अगर जी ग्रुप को बेचने और खरीदने की खबरों पर ध्यान दें तो ये बात भी खुलकर उभरी कि आने वाले वक्त में जी ग्रुप को भी अंबानी खरीद रहे हैं।

मीडिया पर कारपोरेट के कब्जे के समानांतर ये भी सवाल उभरा कि कहीं मीडिया कारपोरेशन बनाने की स्थिति तो नहीं बन रही है। यानी कारपोरेट का कब्जा हर मीडिया हाउस पर हो और कारपोरेट सीधे सीधे सत्ता से समझौता कर ले। कई मीडिया हाउसों को मिलाकर बना कारपोरेशन सत्तानुकुल हो जाये और सत्ता इसकी एवज में कारपोरेट को तमाम लाभ दूसरे धंधों में देने लगे। फिर कमोवेश किसी तरह का कंपीटिशन भी चैनलों में नहीं रहेगा और खर्चे भी सीमित होंगे, जो सामान्य स्थिति में खबरों को जमा करने और डिस्ट्रीब्यूशन के खर्चे से बढ़ जाते हैं वह भी सीमित हो जायेंगे, क्योंकि कारपोरेट अगर मीडिया हाउस पर कब्जा कर रहा है।

फिर जनता तक जिस माध्यम से खबरें पहुंचती हैं, वह केवल सिस्टम हो या डीटीएच, दोनों पर ही वही कॉरपोरेट कब्जा करने की दिशा में बढेगी ही, जिसने मीडिया हाउस को खरीदा। ध्यान दें तो यही हो रहा है यानी न्यूज चैनलों में क्या दिखाया जाये और किन माध्यमों से जनता तक पहुंचाया जाये जब इस पूरे बिजनेस को ही सत्ता के लिये चलाने की स्थिति बन जायेगी तो फिर मुनाफा के तौर तरीके भी बदल जायेंगे।

तब ये सवाल भी होगा कि सत्ता लोकतांत्रिक देश को चलाने के लिये सीमित प्लेयर बना रही है। सीमित प्लेयर उसकी हथेली पर रहे तो उसे कोई परेशानी भी नहीं होगी। एक ही क्षेत्र में अलग अलग प्लेयर से सौदेबाजी करनी नहीं होगी। दरअसल, भारत का मीडिया इस दिशा में चला जाये इसके प्रयास तो खूब हो रहे हैं लेकिन क्या ये संभव है या फिर जिस तर्ज पर रसिया हुआ करता था या अभी कुछ हद तक चीन में सत्ता व्यवस्था है उसमें तो ये संभव है, लेकिन भारत में कैसे संभव है ये मुश्किल सवाल जरूर है।

राजनीतिक तौर पर एकाधिकार की स्थिति में राजनीतिक सत्ता हमेशा आना चाहती रही है। ये अलग बात है कि मोदी सत्ता इसके चरम पर है, लेकिन ऐसे हालात होंगे तो खतरा तो ये भी होगा कि मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी उपयोगिता या आवश्यकता को ही खो देगा, क्योंकि जनता से जुड़े मुद्दे अगर सत्ता के लिये दरकिनार होते हैं तो फिर हालात ये भी बन सकते हैं कि मेनस्ट्रीम मीडिया तो होगा लेकिन उसे देखने वाला कोई नहीं होगा।

तब सवाल सिर्फ सत्ता का नहीं बल्कि कारपोरेट के मुनाफे का भी होगा। क्योंकि आज के हालात में ही जब मेनस्ट्रीम मीडिया अपनी उपयोगिता सत्ता के दबाब में धीरे धीरे खो रहा है तो फिर धीरे धीरे ये बिजनेस माडल भी भरभरा कर गिरेगा, क्योंकि सत्ता भी तभी तक मीडिया हाउस पर कब्जा जमाये कारपोरेट को लाभ दे सकता है जब तक वह जनता में प्रभाव डालने की स्थिति में हो।

सबसे बडा सच तो ये भी है कि जब मेनस्ट्रीम मीडिया ही सत्ता को अपने सवालों या रिपोर्ट से पालिश करने की स्थिति में नहीं होगी तो फिर सत्ता की चमक भी धीरे धीरे लुप्त होगी। उसकी समझ भी खुद की असफलता की कहानियों को सफल बताने वालों के ही इर्द-गिर्द घुमड़ेगी। उस परिस्थिति में मेनस्ट्रीम मीडिया की परिभाषा भी बदल जायेगी और उसके तौर तरीके भी बदल जायेंगे क्योंकि तब एक सुर में सत्ता के लिये गीत गाने वाले मीडिया कारपोरेशन में ढहाने के लिये ऐसे कोई भी पत्रकारीय बोल मायने रखेंगे जो जनता के शब्दों को जुबां दे सके। तब सत्ता भी ढहेगी और मीडिया पर कब्जा जमाये कारपोरेट भी ढहेंगे, क्योंकि तब घाटा सिर्फ पूंजी का नहीं होगा बल्कि साख का होगा।

अंबानी समूह चाहे अभी सचेत न हो लेकिन जिस दिशा में देश को सियासत ले जा रही है और पहली बार ग्रामीण भारत के मुद्दे राष्ट्रीय फलक पर चुनावी जीत-हार की दिशा में ले जा रहे हैं, उससे पहली बार संकेत यही उभर रहे हैं कि सत्ता के बदलने पर देश का इकॉनोमिक मॉडल भी बदलना होगा। यानी सिर्फ सत्ता का बदलना भर अब लोकतंत्र का खेल नहीं होगा बल्कि बदली हुई सत्ता को कामकाज के तरीके भी बदलने होंगे।

जो कारपोरेट आज मीडिया हाउस के जरिए मोदी सरकार के अनुकुल ये सोच कर बने हैं कि कल सत्ता बदलने पर वह दूसरी सत्ता के साथ भी सौदेबाजी कर सकते हैं, तो उनके लिये ये खतरे की घंटी है।