Last Update On : 31 10 2018 09:29:23 AM
प्रतीकात्मक फोटो

प्रियदर्शन अपनी पीढ़ी के उन समर्थ कथाकारों में हैं जिनमें एक चुस्त भाषा और शिल्प के साथ गहरी सामाजिक दृष्टि भी है। वे कहानी के अलावा कविता और आलोचना में भी पैठ रखते हैं, पर अपनी रचनाओं में बदलते हुए समय को हमेशा दर्ज करते हैं और एक जरूरी हस्तक्षेप भी करते हैं। समय—समय पर उनकी लिखी गयी टिप्पणियां इस बात की गवाह हैं। वे अपनी हर कहानी में एक नया विषय लेकर आते हैं और पिछले 25 वर्षों में विशेषकर नई आर्थिक नीति तथा सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के बाद आये परिवर्तनों को भी दर्ज करते हैं। उनकी नई कहानी ‘स्मार्टफोन’ इसी बात को रेखांकित करता है कि इस बदलाव से मध्यवर्ग की मनःस्थिति में क्या बदलाव आया है। कैसे इस परिवार में एक कहानी घटित होती है। तीन दशक पहले राजेश जोशी ने एक गैस चूल्हे के निम्न मध्यवर्गीय परिवार में आने पर घटित स्थितियों का जायजा लिया था। शेखर जोशी ने वीडियो के आने पर बिडउआ कहानी में इसी बदलाव को दर्ज किया था। प्रियदर्शन स्मार्टफोन के जरिये इस परिवर्तन को एक कहानी में ढाल रहे हैं, पर इसी समाज में एक ऐसा वर्ग भी है जिसे दो समय की रोटी भी नसीब नहीं और वह मोबाइल के बावजूद बेरोजगार है। आइए पढ़ते हैं वरिष्ठ पत्रकार और कहानीकार प्रियदर्शन की कहानी —विमल कुमार, वरिष्ठ पत्रकार और कवि

स्मार्टफोन

प्रियदर्शन

‘तुम ये स्मार्टफोन ऑन कर सकते हो?’

उनके झुर्रियाए हाथों में एक नया मोबाइल सेट दमक रहा था। उनकी आंखों में ख़ुशी कम, एक लाचारी ज़्यादा झलक रही थी।

मैं उन्हें एकटक देख रहा था। पूरे 25 साल बाद हम मिल रहे थे। तब वे 50 साल के एक रौबीले शख़्स हुआ करते थे- अफ़सरी के आत्मविश्वास से युक्त। पैसे और सफलता की चमक उनके चेहरे पर दिखती थी।

मुझे उनसे उनकी बेटी सुषमा ने मिलाया था, वह मेरे साथ एमए में पढ़ा करती थी, ‘सुशांत, तुमसे स्मार्ट हैं मेरे पापा।’

मुझसे स्मार्ट उसके पापा की निगाहें एक मामूली सी कमीज़ और पतलून और उससे भी मामूली चप्पलें पहने एक लड़के को- जो मैं था- तौल रही थी। उन्होंने बड़प्पन दिखाया था-‘अपने फ्रेंड को ऐसे ही भेज दोगी? अरे इसे कुछ खिलाओ-पिलाओ, मम्मी को बोलो कुछ पका दें।’

वे हाथ हिलाते हुए निकल गए थे और यह सबको समझ में आ गया था कि उनकी शालीन मुद्राओं में जो सलाह हुआ करती है वह असल में आदेश होती है।

उनकी पत्नी- यानी सुषमा की मां- और सुषमा के दोनों भाई- शिखर और समर्थ- किसी डर से नहीं, अपने पिता के सम्मान में उनकी खींची लकीर पार नहीं कर सकते थे। तो उस दिन मैंने चाय पी,  आंटी- यानी सुषमा की मां के तले पकौड़े खाए, दोनों भाइयों से बात की, जो अपनी उम्र के लिहाज से बेहद शार्प थे- अपने-अपने कॉलेज और स्कूल के टॉपर बच्चे, और फिर इस संपन्न-संभ्रांत परिवार में अपने विपुल आतिथ्य पर कुछ सकुचाया हुआ सा लौटा। अगले साल भर तक उस घर में मेरा ख़ूब आना-जाना रहा।

वह 1991 का साल था, जब मनमोहन सिंह देश का दरवाज़ा खोल ही रहे थे और तब तक हिंदुस्तान के छोटे-छोटे शहर ऐसे फूले-बेतरतीब, बेढब और घुटते हुए गैस-चैंबरों में नहीं बदले थे। रांची एक ख़ूबसूरत शहर था जो शुरू होते ही अपने अलग-अलग सिरों पर किसी आदिवासी गांव की पगडंडी में गुम हो जाता था। मोरहाबादी के तब बहुत खुले से और ख़ाली से मैदान को पार करके, रामकृष्ण मिशन की लाइब्रेरी से  पहले एक गली बाएं घूमती थी और उसी गली पर आगे बढ़ते हुए बिल्कुल गांव की खुली सरहद पर एक भव्य कोठी सुषमा का घर थी। तब शहर के सिमटे हुए भूगोल के मुताबिक ये जगह काफ़ी किनारे लगती थी- लेकिन बेहद खुली और सुंदर थी। साल भर बाद यहां आने-जाने का सिलसिला तब टूटा,जब सुषमा अमेरिका चली गई और मैं दिल्ली चला आया। 

बीच के बरस पानी या चट्टान की तरह गुज़रते-बीतते रहे। दुनिया लैंडलाइन फोन से आगे बढ़ती हुई मोबाइल और स्मार्टफोन तक चली आई, घर दुकानों में, दुकानें मॉलों में, सिनेमाघर मल्टीप्लेक्स में बदलते चले गए। लड़के रांची से दिल्ली और दिल्ली से अमेरिका जा रहे थे। सैलरियां तीन हज़ार से बढ़ती हुई कब तीन लाख छूने लगी थीं- किसी को पता भी नहीं चला। रेलवे की स्लीपर बोगियों में सफ़र करना किसी और ज़माने और किसी और तबके की बात होती चली गई और मध्यवर्ग एसी-2 से होता हुआ विमानों के इकोनॉमिक क्लास की सीटें पहचानने लगा।

मोहल्लों को फोड़कर अचानक नए-नए अपार्टमेंट निकलने लगे और उनके धूल से गलियां भरी दिखने लगीं। सड़कों पर जितने लोग नहीं होते थे, जितने स्कूटर नहीं होते थे, उससे ज़्यादा कारें नजर आने लगीं और हर सड़क छोटी पड़ने लगी।

सामाजिक संबंधों का दायरा सोशल साइट्स तक चला आया और लोग फेसबुक के ज़रिए  पुरानी पहचानें ढूढ़ने और नई पहचानें बनाने लगे। इसी फेसबुक पर एक दिन कैलिफोर्निया में बैठी सुषमा ने दिल्ली में बैठे सुशांत को- यानी मुझे- खोज निकाला। मैं हैरान था- अपनी एक पुरानी दोस्त के मिलने से कुछ पुलकित भी।

वह अब कितनी मोटी लग रही है- बिल्कुल अपनी मम्मी जैसी। मुझे ख़याल आया, वह भी शायद मेरी तस्वीर देखकर यही सोच रही हो। हम सब अपनी युवावस्था के खंडहर हो रहे हैं। लेकिन इन खंडहरों को पुरानी इमारतें, पुराने नक्शे,पुराने पते याद थे। हमने बहुत बात की। सुषमा ने बताया कि बरसों से वह भारत नहीं आई है। उसके दोनों भाई भी अमेरिका में सेटल हो चुके हैं- ‘तुम्हें समर्थ याद है? वो न्यूयॉर्क में है। और छोटा वाला शिखर टेक्सास में।’

मैंने मम्मी-पापा के बारे में पूछा तो वह कुछ उदास हो गई- ‘देखो न, वे रांची में बहुत अकेले हैं। हम लोग कोई जा नहीं पाते। मां के घुटनों में दर्द रहता है। उनको कई बार यहां बुलाया, लेकिन आने को तैयार नहीं होते। रांची का इतना बड़ा मकान छोड़कर आना संभव नहीं है। कई बार बोलते हैं कि घर भुतहा लगता है, लेकिन क्या कहूं?’

सुषमा की बात से कुछ उदासी मेरे भीतर भी पैदा हुई। मुझे खयाल आया कि अगर छोटे भाई ने बड़े करिअर के लोभ में कोई बड़ा शहर चुन लिया होता तो मेरे मां-पिता की भी हालत यही होती और वे भी लगभग वही तकलीफ झेलते जो सुषमा के मां-पिता झेल रहे हैं।

मुझे अपने वे दोस्त याद आए जिनके मां-पिता दोनों अपने-अपने बड़े घरों में अकेले हैं और बेटों-पोतों की राह देखा करते हैं। तभी सुषमा से बातचीत में मैंने बताया था कि मैं सितंबर में रांची जा रहा हूं। अचानक वह एक बुजुर्ग महिला से छोटी सी बच्ची हो गई। उसने लगभग ज़िद पकड़ ली कि मैं रांची में उसके मम्मी-पापा से मिलूं। उसने पुरानी दोस्ती का हवाला दिया। याद दिलाया कि उसकी मम्मी मुझे कितना मानती थी। उसके पापा मेरा कितना ख़याल रखते थे। 

सुषमा का मन रखने भर के लिए नहीं, बल्कि 25 वर्षों के अंतराल पर एक सुखी-समृद्ध घर की आत्मीय यात्राओं की स्मृति को पुनर्जीवित करने की अपनी धुंधली सी इच्छा के साथ मैंने तय किया कि उसके घर जाऊंगा, उसके मम्मी-पापा से मिल लूंगा। इन तमाम वर्षों में मैं रांची जाता रहा था, शहर की बदलती फिजा और भीड़भाड़ को देखकर कोफ़्त से भी भरता रहा था, लेकिन मोरहाबादी के उस हिस्से में कभी जाने का अवकाश नहीं मिला जहां मेरी कुछ स्निग्ध स्मृतियों का बसेरा था।

हालांकि उसका घर जाते-जाते मेरी समझ में आया कि मैं एक बिल्कुल अनजान इलाके से गुजर रहा हूं। यह मेरा शहर नहीं है, यह मेरा देखा हुआ जाना-पहचाना वह शांत मोहल्ला नहीं है जिसकी सड़कों पर मेरा स्कूटर अपने-आप चलता हुआ उसके घर तक पहुंच जाता था। अब मेरे पास कार थी और उस मोहल्ले की सारी सड़कें जैसे गाड़ियों से पटी प़डी थीं। इसके अलावा कभी जो खुले इलाके थे वहां बड़े-बड़े अपार्टमेंट खड़े हो चुके थे। मैंने सोचा नहीं था कि मोरहाबादी की गलियों में भी मैं रास्ता भटक सकता हूं। लेकिन मैं भटक चुका था। मैंने सुषमा को कैलिफोर्निया फोन मिलाया- उससे पता लिया और लोगों से पूछता हुआ किसी तरह नियत जगह पहुंचा।

मगर सुषमा की जानी-पहचानी कोठी तब भी नहीं दिख रही थी। मेरे सामने एक बनती हुई इमारत थी जो तब तक अंधेरी हो चुकी शाम में कुछ भूतहा भर लग रही थी। बगल से एक संकरी सी गली थी- इतनी संकरी कि उससे लोग ही गुज़र सकते थे, गाड़ियां नहीं। अंततः मैंने गाड़ी सड़क के एक किनारे लगाई और घर तलाशने का फ़ैसला किया। फिर उस संकरी सी गली में दाखिल हुआ। अचानक मेरी समझ में आया कि यह संकरी सी गली दरअसल सुषमा की कोठी के फाटक के पास खुलती है। मैं स्तब्ध था। जो कभी दूर से दिखने वाली शानदार कोठी हुआ करती थी, अब वह एक दबे हुए से मकान में बदल चुकी थी। मकान का भी पेंट पुराना हो चुका था और उस पर उपेक्षा के निशान अपनी छाप छोड़ रहे थे।

मैं असमंजस में गेट पर ख़ड़ा रहा। फिर मैंने घंटी बजाई। करीब सोलह सत्रह साल की एक आदिवासी लड़की निकली और मैंने पूछा, अंकल हैं।

अंकल थे। उन्हें मालूम हो चुका था कि मैं आ रहा हूं। सुषमा ने कुछ ही देर पहले फोन किया था। मगर यह वे रौबदार अफ़सरी वाले अंकल नहीं थे। उनके बाल ख़ासे सफ़ेद हो चुके थे, कुछ खिचड़ी दाढ़ी के साथ वे कुछ कमज़ोर लग रहे थे। उनकी आवाज़ में मृदुता थी, मगर हल्का सा कंपन भी था। उन्होंने मुझे बिठाया था। मेरा हालचाल पूछा, मेरी नौकरी के बारे में पूछा और फिर कुछ खामोश से हो गए।

तब तक आंटी निकल आईं। ‘कैसे हो सुशांत बेटा,’ यह थकी हुई सी आवाज़ बता रही थी कि उम्र और अकेलेपन ने उन पर कितना असर डाला है। ‘कैसे चले आए तुम। अब तो कोई आता भी नहीं। एक समय शिखर और सार्थक के दोस्त पूरे घर में शोर मचाते रहते थे। अब सब चले गए।’

उन्होंने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया था और उनकी आंखों की कोरें भीगी हुई थीं। मैंने उनका हाथ सहलाते हुए झूठ बोला, ‘बरसों बाद आया हूं आंटी। सोचा, आप लोगों से मिले बिना कैसे लौटूंगा।’

उसके बाद आंटी देर तक बोलती रहीं। उन्हीं से पता चला कि अब ऊपर की मंज़िल पर उन्होंने एक किरायेदार रख लिया है जो उन दोनों को बूढ़ा और अकेला जानकर उनकी बिल्कुल परवाह नहीं करता है, कि अब घर के सारे काम सुनीता करती है- यानी वह आदिवासी लड़की जिसने दरवाज़ा खोला था, वह न रहे तो उन दोनों को खाना क्या, पानी भी नसीब न हो, कि बेटे फोन तो रोज़ करते हैं, उनको आने की फुरसत नहीं होती, बहुएं दोनों अच्छी हैं, मगर सुषमा की तरह खयाल नहीं रख सकतीं, कि सुषमा बार-बार अमेरिका बुलाती है, लेकिन जाना संभव थोड़े है, कि उनको घुटनों में बहुत दर्द रहता है और डॉक्टर घुटने बदलवाने की सलाह दे रहा है, लेकिन वे डरती हैं कि इसके बाद खड़ी भी हो पाएंगी या नहीं, कि घर अब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।

‘अच्छा हुआ तुम आ गए बेटा’, कहते-कहते वे रोने लगीं।

अंकल चुप बैठे उन्हें देख रहे थे। अच्छा-बुरा कोई भाव उनके चेहरे पर नहीं था। सुनीता चाय के साथ बिस्किट ले आई थी। मेरा दिल बुरी तरह हलक में अटका हुआ था। मुझे खयाल आया, सुषमा ने हिचकते हुए बताया था- जानते हो सुशांत, कभी-कभी लगता है, मम्मी डिप्रेशन में हैं। चुप रहती हैं तो चुप रहती हैं। बोलती हैं तो फिर बोलती चली जाती हैं। यह सुनना जितना आसान था, देखना उससे कई गुना ज़्यादा मुश्किल था।

कभी वे कितनी भव्य हुआ करती थीं- अपने बेटों-बेटी की हर समस्या दूर करने को तैयार। एक बार सुषमा इम्तिहानों से पहले परेशान हो गई कि उसे पूरे नोट्स नहीं मिल रहे तो आंटी ने मुझे फोन किया था- अरे भाई, अपनी दोस्त को तुम नोट्स नहीं दोगे। रो रही है सुषमा। जब उसका पासपोर्ट अटका हुआ था तो आंटी के कहने पर ही मैंने उसके लिए भागदौड़ की थी।  लेकिन अब सब चुप थे। मैंने अंकल से शिखर और समर्थ के बारे में पूछा था और वे बताने लगे थे कि दोनों करिअरवाइज़ बहुत आगे जा चुके हैं।

शिखर का बस एक बेटा है, जबकि समर्थ के दो बच्चे हैं- एक बेटा और एक बेटी। बेटी को तो अभी तक उन्होंने सामने से देखा नहीं है। और इसी के बाद वह घड़ी आई जब वे अचानक उठे और एक स्मार्टफोन उठा लाए थे।

‘तुम ये स्मार्टफोन ऑन कर सकते हो?’ मैं कुछ जवाब देता उसके पहले उन्होंने साफ़ कर दिया था, ‘दरअसल यह शिखर ने भेजा है। वह भी वहां परेशान रहता है कि पापा-मां यहां अकेले कैसे रहेंगे। यहां हज़ार काम होते हैं- बिजली बिल, टेलीफोन बिल, सौदा-सब्ज़ी- किसी न किसी को तो करना ही पड़ेगा न। शिखर कहता है, अब सारे काम स्मार्टफोन से हो सकते हैं।’

मैंने फोन अपने हाथ में ले लिया, मगर मेरा ध्यान फोन पर नहीं, एक लाचार पिता के चेहरे पर था। शायद अचानक उन्हें यह भान हो गया। फीकी हंसी हंसते हुए बोले- ‘अरे, अब यह सब सीखना होगा भाई, बेटे पास नहीं हैं तो स्मार्टफोन ही सही। उनको समय नहीं है तो वो अकेले रहने का रास्ता बता रहे हैं।’

आंटी को अंकल का यह वाक्य अपने बेटों की तौहीन लगा। उनके भीतर की मां जाग उठी-‘अरे इसमें उनका क्या कसूर है? हम ही लोगों ने उन्हें पढ़ाया-लिखाया, बाहर जाने को तैयार किया। शिखर तो जाना भी नहीं चाहता था। आपने लगभग ज़िद करके भेजा। और कितनी बड़ी पार्टी की थी अमेरिका में उसकी नौकरी पर। याद है?’

अंकल को याद था। एक चमक सी उनके चेहरे पर कौंधी लेकिन देर तक नहीं टिकी। वर्तमान की बोझिल उदासी उन पर हावी थी। मैंने स्मार्टफोन को ऑन किया। सारे आइकन चमकने लगे। ‘अंकल, आपको ऐप्स का आइडिया है?’

‘नहीं भाई, मैं तो इस पुराने फोन से नंबर मिला लेता हूं और कभी-कभी एसएमएस देख लेता हूं। बाकी चीज़ें नहीं जानता।’

‘अरे वह सब बहुत पुराना हो गया। अब ये फोन आपके हाथ में है तो दुनिया आपकी मुट्ठी में है। बिजली-पानी के बिल ही नहीं, ट्रेन और प्लेन के टिकट तक आप इसी पर कटाइए। और अपने पुराने दोस्तों को खोजिए।’

मैं अपने भीतर अचानक उग आई एक मायूसी को अपनी आवाज़ के उत्साह से ढंकने की कोशिश कर रहा था।

अंकल फिर फीकी हंसी हंसने लगे। ‘पुराने दोस्तों को खोजने के लिए तो अब ऊपर जाना होगा बेटा। लेकिन तुम समझाओ, ये कैसे काम करता है?’

अगले एक घंटे हम फोन से जूझते रहे। मैंने उन्हें फेसबुक, वाट्सऐप, ट्विटर- सब समझाने की कोशिश की। अपनी फेसबुक आईडी के जरिए मैं सुषमा की वॉल तक पहुंचा और फोटो में जाकर उन्हें उनके नाती-पोतो के फोटो दिखाने लगा। एक-दो वीडियो भी मिल गए। अंकल- आंटी दोनों उत्साहित हो गए। समर्थ के बच्चों से तो वे अब तक मिले नहीं थे। उनके जन्म के समय की तस्वीर देखी थीं। लेकिन इन तस्वीरों ने उनको जैसे आत्मिक तृप्ति दी।

वे फोन पर हाथ फेरकर जैसे अपने पोतों को निहार-छू रहे थे। आंटी की आंखें अचानक बहुत कोमल सी हो उठी थीं। दोनों एक-एक तस्वीर देखते रहे- देखो, न्यूयॉर्क में कितना बड़ा है उसका घर।

अरे, ये यूरोप का टुअर है? याद है आपको, हम लोग जब यूरोप गए थे? हूं, ये लोग ऑस्ट्रेलिया भी घूम आए हैं।’

अचानक एक घंटे बाद अंकल ने मोबाइल से निगाह हटा ली- ‘सारी दुनिया घूमने का समय इनके पास है, इंडिया नहीं आ सकते।’

‘अरे, बीवी-बच्चों का भी ख़याल रखना पड़ता है,’ मां ने फिर बेटों की ओर से मोर्चा संभाला।

‘दोनों हमारा कितना ख़याल रखते हैं। अब भी तो रोज़ फोन करते हैं। आप सीख लीजिए स्मार्टफोन तो फिर वे दूर कहां रह जाएंगे?’

इस दौरान वाकई शिखर का फोन आ गया। उसे अंकल ने बताया कि सुशांत आए हैं- ‘सुशांत, यानी सुषमा के दोस्त, हां-हां वही, दाढ़ी वाले, याद आया? लो बात करो।’

अंकल ने फोन मेरी ओर बढ़ा दिया था। शिखर वाकई भावुक हो उठा था। वह मेरा बार-बार धन्यवाद कर रहा था- ‘भइया, आप वाकई बहुत अच्छे हैं। अच्छा किया, चले आए। पापा-मम्मी कुछ ख़ुश हो जाएंगे।’

फिर उसने कुछ हिचक कर पूछा था, ‘भइया, आप एक और मदद कर देंगे? पापा-मम्मी की कुछ रेग्युलर मेडिसिन हैं। किसी शॉप से लाकर रख देंगे?’ मैंने वादा किया कि रख दूंगा और फिर उससे पूछ लिया कि वह एकाध बार इंडिया क्यों नहीं आ जाता। वह अचानक बुझ सा गया था।

कुछ अटकते हुए उसने बताया था कि वह प्लान कर रहा है, जल्द ही ट्रैवेल करेगा। ‘सुषमा दीदी भी अगले महीने जाएंगी’ यह बात वह जैसे किसी माफ़ी की तरह बता रहा था।

मुझे अचानक लगा कि मां-पिता और बेटा-बेटी सब ज़ख़्मी हैं। ज़िंदगी के जिस चक्के में अचानक वे जुत गए हैं, वह बहुत रास नहीं आ रहा है। बहुत सारी चमकीली दिखने वाली उपलब्धियों के पीछे अंधेरे, घुटन और कसक की एक अंतहीन छटपटाहट है। इसे हम तरह- तरह से भर रहे हैं। कुछ दिल्ली के छूटे हुए घरों में, कुछ न्यूयॉर्क के बनते हुए मकानों में।

लेकिन अब काफ़ी समय हो गया था। मैंने फिर अंकल से आग्रह किया कि वे स्मार्टफोन के कुछ इस्तेमाल सीख लें। फेसबुक-ट्विटर, वाट्सऐप का क्रैश कोर्स उनके लिए कुछ भारी पड़ रहा था। फिर भी वे बहुत धीरज से एक-एक बात समझने की कोशिश कर रहे थे। मैंने उनके कुछ अकाउंट बना भी दिए। कुछ फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज भी दी। सुषमा ने फौरन ऐक्सेप्ट किया और अपनी नई तस्वीर भेजी। एक लम्हे को फिर दोनों बूढे खुश हो गए।

लेकिन स्मार्टफोन का यह खेल भारी पड़ रहा था। तरह-तरह के ऐप्स के बीच कभी उनका सब्र जवाब दे जा रहा था और कभी उनकी स्मृति धोखा दे जा रही थी। मैंने उनको सलाह दी कि वे एक डायरी लाकर सारे आइडी और पासवर्ड लिख लें। डायरी कलम लेकर वे बैठे और एक-एक कर नोट करने लगे। लेकिन फिर से प्रैक्टिस करने की कोशिश की तो गड़बड़ा गए।

उन्हें यह गड़बड़झाला समझ में नहीं आ रहा था। अब उनके चेहरे पर तनाव बढ़ता जा रहाथा। उनकी पत्नी का सब्र भी जवाब देता लग रहा था। अंत में उसने कुछ तुनकते हुए कहा, ‘अब आप से कुछ होता ही नहीं। आप बार-बार सबकुछ भूल जाते हैं।’

अचानक अंकल फट पड़े- हां भूल जाता हूं सबकुछ। सबको भूल जाऊंगा। मेरी मेमोरी चली जाए- सबसे अच्छा हो। वे कांपने से लगे। तुम्हारे बच्चों को तुम्हारी परवाह है? मैं हूं जो खयाल रखता हूं। जब बाथरूम में गिर गई तो किसने तुम्हें संभाला था? बच्चे बस फोन पर सलाह लेते रहे थे- यह कर लो वह कर लो। याद है। स्मार्टफोन भेजा है उसने। बहुत स्मार्ट बनता है। सोचता है, सारी जरूरतें इसी से पूरी हो जाएंगी। घर बैठे हो जाएगा सार काम। लेकिन यह घर कहां है?’

अचानक उन्होंने मेरे हाथ से स्मार्टफोन छीना और सामने सोफे पर फेंक दिया। आंटी उन्हें विस्फारित नेत्रों से देखती बिल्कुल थरथराने लगी थीं। उनकी डरी हुई आंखों में आंसू नहीं दिख रहे थे, लेकिन उनके गले से जो घुटी-घुटी चीख़ निकलती लग रही थी, वह मेरे लिए एक मां की रुलाई का सबसे मार्मिक रूप थी।

फिर अचानक एक और गले से वैसी ही आवाज निकलने लगी। ये अंकल रो रहे थे। अब वे एक दूसरे को संभालने में लगे थे।
सबसे अजीब स्थिति मेरी थी। मैं दोनों को संभालना चाह रहा था। अंकल प्लीज, आंटी प्लीज, सुषमा को फोन करता हूं, वह आ रही है। शिखर ने अभी कहा है, वह भी प्लान कर रहा है। प्लीज़, प्लीज़।

मेरी मनुहार से ज़्यादा शायद अपनी नियति का यथार्थबोध था कि दोनों चुप हो गए। अब एक उदासी पसरी थी। फिर अंकल कोशिश करके उठे, सामने वाले सोफे पर फेंके गए स्मार्टफोन को उठाया और फिर फीकी मुस्कुराहट से बोले- ‘सीख लूंगा बेटा, इसे भी सीख लूंगा। ज़िंदगी में इतना कुछ सीखा है। अब इसी स्मार्टफोन से नाता बना लूंगा।’

उन्होंने कहा कि बहुत रात हो गई है, मैं निकल जाऊं- ‘अब सड़क पर सारी रात गाड़ियां गुजरती हैं, लेकिन फिर भी क्या भरोसा।’

मैं उठ खड़ा हुआ, दोनों के पांव छूए, कहा, कोई काम हो तो जरूर बताएं, इस हफ्ते मैं रांची में हूं। आंटी ने कहा, हो सके तो एक बार और आना, और अंकल ने झिड़का, अरे इसे बहुत सारे लोगों से मिलना होगा, क्यों बुलाती हो फिर।
लेकिन मैंने कहा कि मैं जरूर आऊंगा। बाहर निकल कर मैंने ज़ोर की सांस ली, लगा कि मुझे कुछ अतिरिक्त हवा की जरूरत है।

अगले हफ्ते मैं दिल्ली लौट आया। अचानक एक दिन फेसबुक का नोटिफिकेशन चमका। मैंने देखा, एक फ्रेंड रिक्वेस्ट थी- किसी अभयकांत शर्मा की। अचानक मैंने तस्वीर देखी और चौंक गया।

सुषमा के पापा स्मार्टफोन से नाता बना चुके थे।