Last Update On : 01 09 2018 05:23:45 PM

उन लोगों को जेल की सलाखों के पीछे धकेला जा रहा है जिन्होंने दलित अधिकारों के लिए हमेशा आवाज़ बुलंद की है। यह लोकतंत्र पर खुला हमला है। प्रदर्शनकारियों ने इसकी भर्त्सना करते हुए इन सजग नागरिकों पर लगाए गए झूठे आरोपों को वापस लेने की पुरजोर मांग की….

इंदौर से ब्रजेश कानूनगो की रिपोर्ट

इंदौर। सीपीआई, सीपीआई (एम), एसयूसीआई (सी), प्रगतिशील लेखक संघ, भारतीय महिला फेडरेशन, पीयूसीएल, इप्टा, संदर्भ केन्द्र, एटक, सीटू, किसान सभा, दलित एवं अम्बेडकरवादी संगठन, आम आदमी पार्टी, सफाई कामगार संगठन, संविधान बचाओ मोर्चा एवं कई सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों ने देश के मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों, वकीलों, विचारकों को गिरफ्तार करने और प्रबुद्ध लोगों में भय का वातावरण निर्मित करने के लिए की जा रही सरकारी कार्रवाइयों के विरोध में मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में रीगल चौराहे पर 30 अगस्त को शाम 5 बजे से 7 बजे तक प्रदर्शन किया।

प्रदर्शन में बड़ी संख्या में महिलाओं, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं, श्रमिकों, लेखकों आदि ने हिस्सा लिया। प्रदर्शकारियों का ये मानना था कि वंचितों और शोषितों की आवाज़ उठाने वाले इन लेखकों, वकीलों, पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे और गिरफ्तारियाँ देश की मूल समस्याओं से आम लोगों का ध्यान भटकाने और विरोध के स्वरों को दबाने के इरादे से की गईं हैं।

वक्ताओं ने कहा कि पहली जनवरी को हुई भीमा-कोरेगांव की भयावह दलित-विरोधी हिंसा के बाद से पुणे पुलिस असली गुनहगारों को पकड़ने के बजाए लगातार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को निशाना बना रही है। उसने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और संस्कृतिकर्मियों को ‘टॉप अर्बन माओइस्ट ऑपरेटिव्स’ बताकर गिरफ़्तार किया और यह दावा किया कि भीमा-कोरेगांव की हिंसा के पीछे उनकी भूमिका थी।

देश के अलग-अलग भागों में महत्त्वपूर्ण बुद्धिजीवियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घरों पर छापे मारे गए। दिल्ली में गौतम नवलखा, हैदराबाद में वरवर राव, फ़रीदाबाद में सुधा भारद्वाज, मुंबई में वर्नन गोंसाल्विस और अरुण फ़रेरा, रांची में स्टेन स्वामी और गोवा में आनंद तेलतुम्बड़े के घर पर नियमों का उल्लंघन करके पुलिस ने छापे मारे।

वक्ताओं ने कहा कि इस छापेमारी और गिरफ़्तारी की हम कठोर शब्दों में निंदा करते हैं। विरोध और आलोचना की हर आवाज़ को खामोश कर देने की सरकार की यह शर्मनाक कोशिश है। भीमा-कोरेगांव में दलितों पर जानलेवा हमले करनेवाले और उस हमले की योजना बनानेवाले बेख़ौफ़ घूम रहे हैं। उन्हें राज्य और केंद्र की सरकारों का वरदहस्त मिला हुआ है।

दूसरी तरफ़, उन लोगों को जेल की सलाखों के पीछे धकेला जा रहा है जिन्होंने दलित अधिकारों के लिए हमेशा आवाज़ बुलंद की है। यह लोकतंत्र पर खुला हमला है। प्रदर्शनकारियों ने इसकी भर्त्सना करते हुए इन सजग नागरिकों पर लगाए गए झूठे आरोपों को वापस लेने की पुरजोर मांग की।

शहर की आम जनता भले ही इन गिरफ्तार किए पाँच लोगों को न जानती हो लेकिन सरकार की जनविरोधी नीतियों के कारण लोगों में सरकार के प्रति बहुत गुस्सा है और साधारण जनता का यह गुस्सा इस विरोध प्रदर्शन के दौरान देखने को मिला।

भीमा कोरेगाँव में दलितों पर हुई हिंसा के तुरन्त बाद दलित और अम्बेडकरवादी संगठन से जुड़े लोग घटनास्थल पर पहुँचे ही नहीं बल्कि 6-7 दिन घटना का पूरा मुआयना किया और जो इस घटना के चश्मदीद गवाह थे उनसे जो जानकारी हासिल की उसे उपस्थित लोगों के सामने रखा।

प्रदर्शन के बाद हुई सभा में पूर्व सांसद कल्याण जैन ने कहा कि ये सरकार भारत के सेक्युलर ताने-बाने को और संविधान को नष्ट करना चाहती है इसके खिलाफ एकजुट कार्यवाही जरूरी है कि हम इसे उखाड़ फेंकें।

सी.पी.एम. के राज्य सचिव मण्डल सदस्य कैलाश लिम्बोदिया ने कहा कि जातियों ओर धर्मों के नाम पर लोगों को आपस में दुश्मन बनाने की भाजपा सरकार की ये कोशिशें कामयाब नहीं होने वालीं।

किसान सभा के अरुण चौहान ने कहा कि दलितों, आदिवासियों और किसानों के हक छीनने वाली उस सरकार का विरोध हर गाँव और खेत से होगा और हम अपने साथियों को सरकारी दमन का शिकार नहीं होने देंगे।

सीपीआई के रुद्रपाल यादव ने मौजूदा वख्त में किसानों, आदिवासियों, मजदूरों, दलितों की एकता की जरूरत पर जोर दिया। आम आदमी पार्टी की ओर से लक्ष्मी ने कहा कि फासीवाद और तानाशाही हमारे लोकतंत्र और संविधान को खत्म करना चाहते हैं, हम ऐसा हरगिज नहीं होने देंगे।

भारतीय महिला फेडरेशन की सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि ये सरकार दलितों और अदिवासियों की हितैषी होने का ढोंग करती है लेकिन उन्हें ही अपने ज़्जलम का शिकार बनाती है। इसे उखाड़ फेंकना ही हम सभी इंसाफपसंद लोगों का पहला कर्त्तव्य है।

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने कहा कि ये सरकार एक एक करके अनेक समुदायों को एक दूसरे का दुश्मन बनाना चाहती है। नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी संगठनों ने मुसलमानों को आतंकवादी बताने की कोशिश की और दलितों को नक्सलवादी, और जो इन के पक्ष में और सच्चाई के पक्ष में बात करे उन सबको भी देशद्रोही सबित करना चाहते हैं।