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शायद हमारी सरकार के लिए मानसिक रोग कोई बीमारी ही नहीं है, जबकि मनोचिकित्सकों की कमी से देश भयानक तरीके से जूझ रहा है…

एक तरफ हमारे समाज में दिनोंदिन मानसिक दिवालियापन भयानक रूप से फैल रहा है, वहीं इसके लिए पर्याप्त तो छोड़िए अंगुलियों पर गिनने लायक मनोचिकित्सक भी मौजूद नहीं हैं।

यह बात किसी और ने नहीं बल्कि हमारी भारत सरकार ने कही है। कल 9 जनवरी को लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने यह जानकारी साझा की कि हमारे देश में तकरीबन 20,250 मनोचिकित्सकों की जरूरत है, मगर उपलब्धता सिर्फ 898 मनोचिकित्सकों की है।

आए दिन कई तरह के मानसिक विकृतियों के कारण होने वाली हिंसक वारदातों की खबरों से अखबार पटे रहते हैं, मगर सरकार इस दिशा में कड़ा कदम क्यों नहीं उठा रही है, यह सोचने वाली बात है। हालांकि जो मानसिक रोगी इन वारदातों को अंजाम देते हैं, उनकी तो गिनती भी कहीं नहीं होती। ऐसे लोगों को तो मानसिक विकृत की श्रेणी में रखा जाना शेष है।

6 महीने की बच्ची से लेकर 70 साल की बुढ़िया तक से बलात्कार करने वाले को मानसिक विक्षिप्तों की श्रेणी में नहीं डालेंगे तो क्या करेंगे, इसी तरह अगर एक पिता ही अपनी बेटी का लगातार रेप करता है तो उसे क्या कहेंगे। ये सब मानसिक रूप से विक्षिप्त लोग हैं। बलात्कार के अलावा समाज में अन्य जघन्य कांडों को अंजाम देने वाले 99 फीसदी लोग मानसिक रोगियों की श्रेणी में आते हैं, मगर अभी सिर्फ ऐसे लोग मानसिक रोगियों की श्रेणी में आते हैं जिनमें से ज्यादातर जन्म से ही मेंटली डिसआॅर्डर के शिकार हैं।

मगर सरकार इस दिशा में कितनी लापरवाह है यह आंकड़ों में साफ—साफ नजर आता है। शायद हमारी सरकार के लिए मानसिक रोग कोई बीमारी ही नहीं है, जबकि मनोचिकित्सकों की कमी से देश भयानक तरीके से जूझ रहा है।

स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्यमंत्री अनुप्रिया पटेल ने जानकारी साझा की कि जनवरी 2015 तक हमारे देश में 13,500 मनोचिकित्सकों की आवश्यकता थी, लेकिन उपलब्ध मनोचिकित्सकों की संख्या हजार से भी नीचे थी।

मनोरोगियों से जूझते हमारे देश में 20,250 मनोचिकित्सकों की सख्त जरूरत है, हालांकि वह भी बहुत कम हैं, मगर यहां उपलब्ध मनोचिकित्सक मात्र 898 हैं। अनुप्रिया पटेल ने बताया कि जहां देश में 37,000 मनोचिकित्सा सामाजिक कार्यकर्ताओं की जरूरत है, यह आंकड़ा भी हजार पार नहीं कर पाया है। पूरे भारत में मात्र 900 से भी कम मनोचिकित्सक सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद हैं।

वहीं जहां देश में तकरीबन 3,000 मनोचिकित्सा नर्सों की आवश्यकता है, लेकिन देशभर में मात्र 1,500 मनोचिकित्सक नर्स उपलब्ध हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 2011 में भारत में लगभग 7.22 से भी अधिक लोग ‘मानसिक बीमारी’ से ग्रसित पाए गए थे। ये आंकड़ा वह था जो सामने आ पाता है। यानी इतने लोग पूरी तरह से मानसिक संतुलन खो चुके थे, मगर असल आंकड़ा जिस दिन सामने आएगा वह और भी भयानक होगा। आज के हालातों को देखकर लगता है कि हर तीसरा आदमी का मानसिक संतुलन गड़बड़ाया हुआ है।

सरकारी रिकॉर्डों में ही 2011 में 15 लाख से अधिक लोगों में ‘बौद्धिक अक्षमता’ पाई गई थी। उत्तर प्रदेश में जहां 76,603 लोग किसी न किसी प्रकार के मनोरोग से ग्रसित थे, वहीं पश्चिम बंगाल में 71,515, केरल में 66,915 और महाराष्ट्र में 58,753 लोग मानसिक बीमारी ग्रस्त हैं।

हालातों को देखते हुए देश में ज्‍यादा से ज्‍यादा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जरूरत है, मगर जो आंकड़ा सामने आ रहा है उससे लगता है कि सरकार इस दिशा में आंखें बंद करके बैठी हुई है। मानसिक दिवालियापन उसके लिए कोई मायने नहीं रखता।

इससे उलट समाज का एक सच यह भी है कि हम किसी को तब तक मानसिक रोगी घोषित नहीं घोषित करते, जब तक कि उसकी दिमागी हालत बहुत ज्यादा न गड़बड़ा जाए। यानी जो आंकड़े सामने रखे गए हैं वो पूरी तरह मानसिक संतुलन खो चुके लोगों का है।

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक कई प्रदेशों में तो 10 मनोचिकित्सक भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक अध्ययन के अनुसार 2015 में 5 करोड़ से भी ज्यादा भारतीय मानसिक अवसाद से पीड़ित पाए गए थे जबकि तीन करोड़ लोगों मानसिक रोगी दर्ज किए गए। देश में 2012 में सबसे ज्यादा सुसाइड के मामले सामने आए थे, बावजूद इसके मानसिक चिकित्सकों की यह अकाल चिंतित करने वाला है।