Last Update On : 10 09 2018 07:48:57 PM

मोदी के हनुमान चाहे जितना उनकी जय जयकार कर लें, वह इस बात को नकार नहीं सकते की सभी मानकों में मनमोहन सिंह मोदी से बहुत आगे हैं। इसलिए मोदी को चुनौती राहुल से नहीं मनमोहन से मिलने जा रही है….

विष्‍णु शर्मा का विश्लेषण

जैसे जैसे लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं नरेन्‍द्र मोदी के विकल्‍प पर चर्चा भी तेज होने लगी है। मजेदार बार यह है कि सबसे अधिक भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे को उठा रही है। उसका पूरा जोर विपक्ष को विकल्‍पहीन साबित करने का है। कल सम्‍पन्‍न राष्‍ट्रीय कार्यकारणी की दो दिवसीय बैठक में बीजेपी ने बार बार विपक्ष पर विकल्‍पहीन होने का आरोप लगाया।

बीजेपी को लगता है, और एक हद तक सही भी है कि विपक्ष की यह कमजोरी उसके लिए सबसे बड़ा चुनावी अस्‍त्र है। लेकिन इस बीच राजनीतिक अखाड़े में कुछ ऐसा हो रहा है, जो बीजेपी के इस दांव को खोखला कर सकता है।

बात दरअसल ये है कि मनमोहन सिंह तेजी से राजनीतिक विमर्श के केन्‍द्र में आते जा रहे हैं। नोटबंदी और जीएसटी जैसे मामलों में उनकी भविष्‍यवाणी सार्थक हुई हैं और उनकी बातों को नजरअंदाज करना स्‍वयं सत्‍ताधारी पार्टी के लिए भी मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में यदि वह विपक्ष उन्‍हें विकल्‍प के रूप में सामने लाता है तो हैरानी नहीं होगी।

आर्थिक विचार
पिछले साढे़ चार साल में राहुल गांधी निस्संदेह राजनीतिक रूप से अधिक परिपक्‍व हुए हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी के अध्‍यक्ष के रूप में उनकी उपलब्धि खासी नहीं है। गुजरात और कर्नाटक चुनाव में उनकी भूमिका प्रशंसनीय तो है लेकिन इससे उनके नेतृत्‍व की सफलता साबित नहीं होती। बीते दिनों में राहुल गांधी ने एक कॉरपोरेट विरोधी के रूप में अपनी छवि का निर्माण किया है। यह छवि गरीबों और किसानों को आकर्षित करती है, लेकिन धनाढ्यों और मध्‍य वर्ग को इसने सशंकित किया है।

भारत का महत्‍वाकांक्षी मध्‍यवर्ग किसी भी स्थिति में 1990 पूर्व के भारत को आदर्श नहीं मान सकता। ऐसी स्थिति में मध्‍यवर्ग और पूंजीपति वर्ग राहुल पर अपना दांव नहीं लगाएगा। आज की परिस्थितियों में पूंजीपति वर्ग के उदार सहयोग के बिना चुनावी सफलता असंभव है।

गठबंधन की विवशता
घटक दलों के लिए भी मनमोहन सिंह राहुल गांधी से अधिक स्‍वीकार्य नेता हैं। घटक दल कभी यह भूलना नहीं चाहेंगे कि लालू यादव को जेल भेजने में बीजेपी से अधिक राहुल गांधी का हाथ है, जिन्‍होंने सोशल मीडिया के दवाब में सबसे भरोसेमंद साथी का साथ छोड़ दिया था।

इसके विपरीत डॉ सिंह ने घटक दलों को काम करने का पूरा अवसर दिया। हालांकि टू-जी और कोयला आवंटन मामले में बदनामी के छींटे मनमोहन के दामन में पड़े, लेकिन वह अंत तक घटकों को साथ लेकर चल सके।

पी चिदंबरम और शशि थरूर
कांग्रेस पार्टी पी चिदंबरम और शशि थरूर को प्रधानमंत्री के उम्‍मीदवार के रूप में पेश कर सकती थी, लेकिन दोनों ही नेताओं का राजनीति इतिहास गलतियों से भरा पड़ा है। चिदंबरम और शशि बौद्धिक घमण्‍ड के लिए जाने जाते हैं। दिग्विजय सिंह ने तो मीडिया के सामने चिंदबरम पर यह आरोप लगाया था। इसके अलावा चिदंबरम पर मुद्राशोधन संबंधी मामला भी चल रहा है।

चिदंबरम एक बार कांग्रेस पार्टी से अलग भी हो चुके हैं। ये सारी बातें उनके खिलाफ जाती हैं। दूसरी ओर शशि थरूर को महत्‍वाकांक्षी स्‍वभाव का आदमी माना जाता है और उनमें राजनीतिक परिपक्‍वता का अभाव है। पिछले साढ़े चार साल में कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं को लगातार दवाब में रहना पड़ा है, लेकिन थरूर के अलावा किसी ने भी बचने के लिए मोदी को खुश करने की कोशिश नहीं की।

थरूर ने शुरू में ही मोदी का विश्‍वास जीतने की भरसक कोशिश की। मोदी 2.0 जैसे लेख लिखने के बाद पार्टी के अंदर उनके प्रति शक पैदा हुआ और इससे पहले भी कैटल क्‍लास जैसे मुहावरों का इस्‍तेमाल कर बदनाम हो चुके हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की भी सार्वजनिक रूप से निंदा कर चुके हैं। इसलिए कांग्रेस प्रधानमंत्री के रूप में दोनों को आगे करने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी।

ऐसे में डॉ सिंह ही कांग्रेस पार्टी के लिए आज सबसे अच्‍छा दांव साबित हो सकते हैं। पिछले दिनों मोदी सरकार की सबसे असरदार आलोचना उन्‍होंने ही की है। नोटबंदी को डॉ सिंह ने संगठित लूट और कानूनी डकैती कह कर परिभाषित किया था, जिसे आज लगभग सभी स्‍वीकार कर रहे हैं।

उपलब्‍धियों के आइने में डॉ मनमोहन सिंह
उपलब्धियां के मामले में डॉ सिंह शायद नेहरू के बाद सबसे सफल नेता हैं। पी.वी. नरसिंम्हा राव सरकार के वित्‍त मंत्री के रूप में डॉ सिंह ने भारत के अर्थतंत्र को गति दी। उनकी नीतियों के कारण भारत हिन्‍दू रेट ऑफ ग्रोथ से आर्थिक रूप से तेजी से विकास करने वाला देश बना। भारत की दूरसंचार क्रांति, मनरेगा, आरटीआई, किसान कर्ज माफी, छात्रवृत्ति का विस्‍तार जैसी उपलब्धियां उनके ही कार्यकाल में हुई। वह भी ऐसे समय में जब दुनियाभर के विकसित देश आर्थिक मंदी का शिकार थे।

विदेशी संबंधों के लिए भी मनमोहन का कार्यकाल स्‍वर्णकाल ही माना जाएगा। श्रीलंका, बंगलादेश, पाकिस्‍तान, नेपाल, आसिआन मुल्‍कों में भारत की स्थिति मजबूती बनी। अमेरिका, ईरान, चीन, इजरायल, फिलीस्‍तीन और रूस जैसे परस्‍पर विरोधी देशों के साथ भारत समन्‍वय बनाने में सफल रहा। उनके कार्यकाल में भारत के प्रभाव का विस्तार अफ्रीका में हुआ।

वहीं नरेन्‍द्र मोदी के राज में एकाध अपवाद को छोड़ दें तो इन सभी देशों से भारत के संबंध खराब हुए हैं। नेपाल की बात करें तो मनमोहन सिंह ने लोकतांत्रिक आंदोलन को समर्थन देकर वहां के माओवादियों के साथ विश्वसनीय संबंध कायम किए, जबकि नरेन्‍द्र मोदी के नाकाबंदी और नोटबंदी जैसे कामों ने नेपाल के लोगों को नाराज कर दिया।

मोदी के कार्यकाल में श्री लंका में चीन का प्रभाव बढ़ा ही है। एनसीआर और रोहिंग्‍या संकट ने बंगलादेश को भारत के प्रति शंकास्‍पद किया है। डोकलाम मामले में हस्‍तक्षेप के बाद भारत के प्रति भूटान का भरोसा कम हुआ है। अमेरिका के प्रति मोदी का एकतरफा प्रेम ने र्इरान, चीन और रूस को भारत से दूर कर दिया है। क्षेत्रीय संगठन सार्क को मोदी सरकार ने अपने राजनीति हित के लिए बली चढ़ा दिया। इस तरह देखें तो समझ आता है कि क्षेत्रीय स्‍तर पर नरेन्‍द्र मोदी सरकार ने भारत के प्रभाव को संकुचित किया है।

2014 के अपने एक साक्षात्कार में मनमोहन सिंह ने कहा था कि इतिहास उनका मूल्यांकन उदारता से करेगा। महज चार साल में ही उनकी यह भविष्‍यवाणी सही साबित होने जा रही है। मोदी के हनुमान चाहे जितना उनकी जय जयकार कर लें, वह इस बात को नकार नहीं सकते की सभी मानकों में मनमोहन सिंह मोदी से बहुत आगे हैं। इसलिए मोदी को चुनौती राहुल से नहीं मनमोहन से मिलने जा रही है।

फिलहाल इस चुनौती का कोई जवाब मोदी एण्‍ड कंपनी के पास नहीं है। आगे फैसला कांग्रेस को करना है।