Last Update On : 27 10 2018 12:14:26 AM

2014 के लोकसभा चुनाव में 1352 करोड़ रुपये सिर्फ प्रचार पर उड़ाने वाली राजनीति 2019 में कितने हजार करोड़ प्रचार में उड़ायेगी, जिससे हर नागरिक के जेहन में ये बस जाये कि लोकतंत्र का मतलब है राजनीति-सियासत-सत्ता पाने की होड़…

वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी का विश्लेषण

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश की राजनीति का सच तो यही है कि सत्ता पाने के लिये नागरिकों को वोटरों में तब्दील किया जाता है। फिर वोटरों को जाति-धर्म-सोशल इंजीनियरिंग के जरीये अलग अलग खांचे में बांट जाता है। पारंपरिक तौर पर किसान-मजदूर, महिला, दलित, युवा और प्रोफेशनल्स व कारपोरेट तक को सपने और लुभावने वादों की पोटली दिखायी जाती है और सत्ता पाने के बाद समूचे सिस्टम को ही सत्ता बनाये रखने के लिये काम पर लगाते हुये जनता की चुनी हुई सरकार के नाम पर हर वह काम करा जाता है, जो अंसवैधानिक हो।

फिर इसके समानांतर में अपने पारंपरिक चुनिंदा वोटरों के लिये कल्याण योजनाओं का ऐलान करते रहना। यानी चाहे अनचाहे लोकतंत्रिक देश का राजनीतिक मिजाज ही लोकतंत्र को हड़प रहा है। खामोशी से वोटरो में बंटा समाज राजनीतिक दलों में अपनी सहुलियत अपनी मुश्किलों को देखकर हर पांच बरस में राजनीतिक लोकतंत्र को जीने का इतना अभ्यस्त हो चला है कि उसे इस बात का एहसास तक नहीं है कि उसके पड़ोस में रहने वाला शख्स कितना जिन्दा है, कितना मर चुका है।

ये अपने तरह का अनूठा या कहे सबसे त्रासदीदायक दौर है कि देश का 17 करोड़ 22 लाख मुसलमान [2011 के सेंसस के मुताबिक] नागरिक हैं भी कि नहीं इसका कोई एहसास सत्ता को नहीं है। और मुसलमान भी इतनी खामोशी ओढ़ चुका कि उसे खुद के होने का एहसास 2019 के चुनाव की छांव में जा छुपा है। लग ऐसा रहा है कि 2019 के चुनाव देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को जीने के लिये नहीं, बल्कि आजादी मिलने के एहसास पर जा टिकी है।

इसी एहसास का दूसरा चेहरा देश के 20 करोड 14 लाख दलितों [2011 के सेंसस के मुताबिक] में है, जो डरा हुआ है। सहमा है। लेकिन वह भी खुद को 2019 के चुनाव तले अपनी खामोश और आक्रोश की जिन्दगी को टाल रहा है। यानी 2014 के चुनाव परिणाम के बाद जिस तरह समूचा सिस्टम और सिस्टम को चलाने वाले तमाम संस्थान ही सत्तानुकुल हो गये, उसमें पहले दो बरस काग्रेस की त्रासदी को याद कर नयी सत्ता के हर कार्य को लेकर उम्मीद और सपनों को जीने का स्वाद था।

लेकिन उसके बाद सत्ता की छांव तले भीड़तंत्र के न्याय ने कानून के राज को जिस तरह हवा कर दिया उसने 37 करोड की आबादी के सामने ये सवाल तो खड़ा कर ही दिया कि उसकी हैसियत सिवाय वोटर की नहीं। यानी संविधान के जरिये मिलने वाले अधिकार भी मायने नहीं रखते हैं और कानून का राज भी सिमट कर सत्ता की हथेली पर नाचने वाले या कहे सुविधा पाने वाले तबके में जा सिमटा है।

वाकई ये लकीर बेहद महीन है, पर सच यही है कि दलितों के खिलाफ औसतन हर बरस 36 हजार से ज्यादा उत्पीड़न के मामले दर्ज होते रहे। मुस्लिमों को वोट बैंक के दायरे में इतना डराया या बहलाया गया कि उसकी हैसियत सत्ता की तरफ ताकने के अलावे बची ही नहीं। एक तरफ यूपी में 20 करोड़ की आबादी में से करीब 4 करोड़ मुस्लिम कैसे सांस ले रहा है, ये जानने की कोशिश कोई नहीं करता।

हर हर सांस थम जाये इसका वातावरण मुस्लिम बहुसंख्यक इलाकों में जाकर समझा जा सकता है। बुलंदशहर में हाजी अलीम के माथे पर दो गोली मारी जाती है। पुलिस किसी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं करती। उल्टे ये कहने से नहीं चूकती कि ये तो खुदकुशी लगती है। यानी खुद ही कनपटी पर पिस्तौल रख हाजी अलीम पहले एक गोली चलाता है फिर दूसरी।

मुस्लिम समाज के भीतर सांस थामने वाली सिस्टम की ऐसी बहुतेरी किस्सागोई मिल जाती है। दो दर्जन इनकाउंटर उसका सबूत हैं, तो जिन्दगी के लिये सत्ता की रहम-करम। तो दूसरी तरफ पं. बंगाल में करीब ढाई करोड़ बंगाली मुस्लिम भी सत्ता की रियायत पर ही जिन्दगी जी सकता है। रियायत की एवज में लोकतंत्र के उस राग को जिन्दा रखना है जहां दिल्ली या कहे बीजेपी की सत्ता का विरोध करती टीएमसी यानी ममता बनर्जी की सत्ता बनी रहे।

तो सत्ता को कहीं बतौर नागरिक भी मुस्लिम बर्दाश्त नहीं तो कही वोटर होकर ही जिन्दा रह सकता है। इस दायरे की सबसे त्रासदीदायक परिस्थितियां मुस्लिम समाज के भीतर जमा होते उस मवाद की है, जिसमें सवा चार करोड़ मुस्लिमों की जिन्दगी प्रतिदिन 28 से 33 रुपये पर कटती है। 42 फीसदी बच्चे कुपोषित पैदा होते हैं। एक हजार बच्चों में से कोई एक बच्चा ही तकनीकी शिक्षा पाने की स्थिति में होता है।

जो क्लर्क या प्रोफेशनल्स की नौकरी में हैं उनकी संख्या भी एक फीसदी से आगे की नहीं है। यानी किस तरह का समाज या देश गढा जा रहा है जो सिर्फ राजनीतिक सत्ता ही देखता है और इसमें दलित को काट दीजियेगा तो हालात बद से बदतर हो जायेंगे क्योंकि देश में 6 करोड़ दलित 28 से 33 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से जीते हैं।

करीब 48 फिसदी दलित बच्चे कुपोषित ही होते हैं। शिक्षा या उच्च शिक्षा या तकनीकी शिक्षा के मामले में इनका हाल मुस्लिम को ही पछाड़ता है और वह भी उन आंकड़ों के साथ जिसका मुकाबला युगांडा या अफगानिस्तान से हो सकता हो, क्योंकि दो फीसदी से आगे के सामने किताब होती नहीं और दशमलव एक फीसदी उच्च शिक्षा के दायरे में पहुंच पाता है, पर इनका संकट दोहरा है। उनके नाम पर सत्ता आंखें बंद नहीं करती बल्कि सुविधा देने के नाम पर हर सत्ता इन्हें अपने साथ जोड़ने की जो भी पहल करती है, वह सिवाय भीख देने के आगे बढ नहीं पाती । यानी राजनीतिक लोकतंत्र के दायरे में इनकी पहचान सिवाय वोट देने के वक्त ईवीएम पर दबाये जाते एक बटन से ज्यादा नहीं होती। कीमत हर कोई लगाता है।

पर इसका ये मतलब कतई नहीं है कि दलित मुस्लिम के अलावा देश में हर कोई नागरिक के हक को जी रहा है। व्यवसाय या रोजगार के दायरे में या फिर महिला या युवा होने का दर्द भी राजनीति सत्ता के लोकतंत्र तले क्या हो सकता है, ये किसान की खुदकुशी और मनरेगा से भी कम आय पाने वाले देश के 25 करोड किसान-मजदूर को देखकर या फिर सरकारी आंकड़ों से ही जाना जा सकता है। इसी कतार में साढ़े चार करोड़ रजिस्टर्ड बेरोजगारों को खड़ा कर अंतरराष्टरीय तौर पर जब आकलन कीजियेगा तो पता चलेगा भारत दुनिया का अव्वल देश हो चला है, जहां सबसे ज्यादा बेरोजगार हैं।

सीएमआईए के मुताबिक साढे आठ करोड़ बेरोजगारों को ढोते भारत का अनूठा सच ये भी है कि राजनीतिक दलों के जरिये चुनाव के वक्त लोकतंत्र का डंडा उठाने वाले बेरोजगार युवाओं की तादाद साढ़े छह करोड़ हो चुकी है। तो कौन कैसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को देखे और चुनाव के तले ही लोकतंत्र को माना जाये या उससे हटकर भारतीय समाज के उस सच को उभारा जाये जिसे जबाने का प्रयास लोकतंत्र के नाम पर राजनीति ही करती है। क्योंकि विकास उस सुराख वाले झोले में तब्दील हो चुका है जिसमें नेहरु से लेकर मोदी तक खूब रुपया डालते हैं, पर जनता उसका उपभोग कर नहीं पाती।

राजनीति-राजनेता-सियासत-सत्ता इतनी रईस हो जाती है कि जब सरकारी आंकड़े ही ये जानकारी देते हैं कि देश की दस फीसदी आबादी 80 फीसदी संसाधनों का उपभोग कर रही है और उसके दस फीसदी के भीतर एक फीसदी का वही समाज है जो राजनीति में लिप्त है या पिर राजनीति के दायरे में खुद को लाकर धंधा करने में मशगूल है जिसे क्रोनी कैपटलिज्म कहा जाता है। इस एक फीसदी के पास देश का साठ फीसदी संसाधन है तो फिर लोकतंत्र या कानून का राज शब्द कितने बड़े लग सकते हैं ये सिर्फ सोचा जा सकता है।

संविधान नहीं तो कानून का राज भी नहीं और उसी का एक चेहरा देश में 14 लाख सरकारी पुलिस बल के समानातंर 70 लाख निजी सुरक्षाकर्मियों के नौकरी करने का है। राजनीतिक लोकतंत्र की बड़ी लकीर खींचनी है तो फिर आखिर में दो सच को निगलना आना चाहिये। पहला ये व्यवस्था चलती रहे इसके लिये देश के संसाधनों से ही सत्ता की शह पर कमाई करने वाले कॉरपोरेट एक हजार करोड़ से ज्यादा का चंदा सत्ता को दे देते हैं।

दूसरा जनता में ये एहसास बने रहे कि उसकी भागीदारी जारी है तो कल्याण या दूसरे नामों से सेस लगाकर 2014 से 2017 तक चार लाख करोड़ से ज्यादा जनता से ही वसूला जाता है, जिसमें से सवाल लाख करोड़ रुपये सरकार खुद डकार लेती है। यानी जनता के पैसे से जो सुविधा जनता को देनी है, उस सुविधा को भी सत्ता हड़प लेती है।

इस कड़ी में राजनीतिक लोकतंत्र का समूचा हंगामा इंतजार कर रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में 1352 करोड़ रुपये सिर्फ प्रचार पर उड़ाने वाली राजनीति 2019 में कितने हजार करोड़ प्रचार में उड़ायेगी, जिससे हर नागरिक के जेहन में ये बस जाये कि लोकतंत्र का मतलब है राजनीति-सियासत-सत्ता पाने की होड़।